धर्मीकरण का रोमन कैथोलिक दृष्टिकोण (भाग 1)
आज की प्रोटेस्टेन्ट कलीसिया के बहुत से सदस्य अपने मूल तथा उनके पूर्वजों द्वारा रोमन कैथोलिक चर्च के विरुद्ध किए गए “विरोध” के वास्तविक स्वरूप को ठीक प्रकार से नहीं समझते। जब उनसे इन भेदों के विषय में पूछा जाता है, तो वे प्रायः कुछ रूढ़िगत उत्तर देते हैं, जैसे, “मैं मरियम की उपासना नहीं करता,” “मैं कर्मों से नहीं, बल्कि विश्वास द्वारा धर्मी ठहराए जाने पर विश्वास करता हूँ,” या “प्रभु-भोज की रोटी और दाखरस वास्तव में यीशु की देह में परिवर्तित नहीं होते।”
इस पाठ में, डॉ. स्प्रॉल मार्टिन लूथर के समय तथा धर्म-सुधार आन्दोलन के दौरान विवाद में रहे वास्तविक और गम्भीर ईश्वरवैज्ञानिक सिद्धान्तों को विस्तार से समझाते हैं। विशेष रूप से, वे धर्मी ठहराए जाने के सिद्धान्त और रोमन कैथोलिक विचारधारा में उसके स्थान पर ध्यान केन्द्रित करते हैं।