मैं हूँ: परमेश्वर का नाम
अधिकाँश मानवजाति एक व्यक्तित्वहीन, नैतिकता विहीन अलौकिक शक्ति में विश्वास करती है, जो प्रकृति के एक बल के समान कार्य करती है। क्योंकि इस हस्ती में नैतिकता का कोई मानक नहीं है, इसलिए यह सृजे हुओं पर उन्हें लागू नहीं कर सकती है, इसलिए इस दृष्टिकोण का पालन करने वाले बिना किसी प्रतिबन्ध के हैं, और चाहे जैसा जीवन व्यतीत करने की स्वतंत्रता को व्यक्त करते हैं। लेकिन, सत्य तो यह है कि इन लोगों ने स्वयं को पाप और अविश्वास का गुलाम बना लिया है, और स्वयँ पर से पाप के दण्ड से छुटकारे की सारी आशा को उतार कर फेंक दिया है। निर्गमन 3 में प्रभु द्वारा “मैं जो हूँ सो हूँ” का प्रकटीकरण, एक व्यक्तिगत, नैतिक परमेश्वर का प्रकटीकरण है, जो उन उच्च स्तरों को दिखाता है, परमेश्वर जिनकी अपेक्षा अपनी सृष्टि से रखता है, किन्तु साथ ही यह उद्धार और छुटकारे की एक आशा भी देता है, जो प्रचलित वर्तमान विकल्प में नहीं है।