मूसा और जलती हुई झाड़ी
मूसा और जलती झाड़ी का परिचित वृतान्त अचरज और आदर तो उत्पन्न करता ही है, किन्तु क्या आप परमेश्वर द्वारा स्वयं को इस प्रकार से मूसा पर प्रकट करने के उद्देश्य को जानते हैं? इस श्रृंखला में, आर. सी. स्प्राउल ने बाइबल में दी गई, मूसा के जीवन को बदल देने वाली परमेश्वर के साथ हुई भेंट की व्याख्या की है। दस लैक्चरों के द्वारा, उन्होंने परमेश्वर के जलती हुई झाड़ी में प्रकट होने के तात्पर्य तथा मूसा से कहे गए शब्दों के महत्व को समझाया है। इसके अतिरिक्त, डॉ. स्प्राउल दिखाते हैं कि इस पवित्र भूमि पर मूसा और परमेश्वर की भेंट किस तरह से यीशु मसीह के आगमन का पूर्वाभास देती है।
परमेश्वर का अदृश्य हाथ
यूसुफ को मिस्र में एक दास के समान रहते हुए जिन कठिनाइयों और संघर्षों को सहना पड़ा, उनके बावजूद, वह यह पहचानने से नहीं चूका कि उसके जीवन की हर एक घटना में सर्व-प्रभुता सम्पन्न परमेश्वर का हाथ है। उसके भाइयों के पश्चाताप के प्रत्युत्तर में, यूसुफ की प्रतिक्रिया थी, “तुमने तो मेरे साथ बुराई करने की ठानी थी, परन्तु परमेश्वर ने उसी को भलाई के लिए ले लिया।”
जलती हुई झाड़ी
मूसा को जंगल के दृश्य उन दृश्यों से बहुत भिन्न लगते होंगे, जो दृश्य उसे मिस्र के शाही महल से दिखाई देते थे। अपने सम्पूर्ण बाहरी स्वरूप में, मूसा के सामर्थ्य और महत्व के स्थान से गिरकर, केवल मूक पशुओं पर अधिकार रखने के स्तर पर आ जाना, उसका बहुत बड़ा निरादर था। लेकिन फिर भी, मूसा के ये दोनों स्तर परमेश्वर के द्वारा ही निर्धारित किये हुए थे, और इन दोनों का उद्देश्य उसके जीवन में उन योग्यताओं और गुणों को विकसित करना था, जो उसके द्वारा परमेश्वर के लोगों को मिस्र की बंधुवाई से निकालने के लिए आवश्यक थे।
मैं हूँ: परमेश्वर की हस्ती
मनुष्यों को स्वायत्त होने का विचार पसंद है। ऐसा प्रतीत होता है कि मानवजाति की सम्पूर्ण दुर्दशा का सार, जैसे कि धर्मनिरपेक्ष सँसार द्वारा प्रदर्शित किया जाता है, किसी भी प्रकार से कहीं भी उत्तरदायी होने से स्वतंत्र रहने की खोज करते रहना है। यह धारणा वास्तविकता के विरुद्ध जाती है, और इस तरह के अस्तित्व की लालसा ने ही, अदन की वाटिका में, मानवजाति को पाप में ढकेल दिया।
मैं हूँ: परमेश्वर की स्वयंभूति
सृष्टि के आरम्भ के लिए वैज्ञानिक अध्ययन के क्षेत्रों में, स्वाभाविक जनन की धारणा प्रचलित है। इस धारणा के अनुसार, जब कुछ भी नहीं था, तो वहाँ पर स्वतः ही कुछ, विदित सृष्टि के नवजात रूप में उत्पन्न हो गया। यह धारणा मूर्खता से भरी हुई है, और कभी-कभी मसीहियों को हैरान करने वाली और अविश्वसनीय लगती है। कोई इस सिद्धान्त को भला कैसे स्वीकार कर सकता है?









