मैं हूँ: परमेश्वर की स्वयंभूति
सृष्टि के आरम्भ के लिए वैज्ञानिक अध्ययन के क्षेत्रों में, स्वाभाविक जनन की धारणा प्रचलित है। इस धारणा के अनुसार, जब कुछ भी नहीं था, तो वहाँ पर स्वतः ही कुछ, विदित सृष्टि के नवजात रूप में उत्पन्न हो गया। यह धारणा मूर्खता से भरी हुई है, और कभी-कभी मसीहियों को हैरान करने वाली और अविश्वसनीय लगती है। कोई इस सिद्धान्त को भला कैसे स्वीकार कर सकता है? लेकिन इस हास्यास्पद अविश्वास से हमें चकित नहीं होना चाहिए। पौलुस हमें रोमियों 1 अध्याय में कहता है “यद्यपि वे परमेश्वर को जानते थे, फिर भी उन्होंने उसे न तो परमेश्वर के उपयुक्त सम्मान, और न ही धन्यवाद दिया; वरन् वे अनर्थ कल्पनाएं करने लगे, और उनका निर्बुद्धि मन अन्धकारमय हो गया” (रोमियों 1:21)। हमारी अपेक्षा होनी चाहिए कि अविश्वासी लोग सत्य को अस्वीकार ही करेंगे, और इस कारण हमें अपने प्रभु का धन्यवाद करना चाहिए कि उसने हमारे अंधियारे हृदय में, जब हम भी अविश्वास में थे, अपना प्रकाश चमकाया।