
अनुग्रह के साथ मातृत्व की चुनौतियों का सामना करना
22 सितम्बर 2026मसीही परिपक्वता क्या है?
हमारे बगीचे में सेब का एक छोटा-सा पेड़ है। प्रत्येक वर्ष वह थोड़ा और बढ़ता है, और उसमें पहले की अपेक्षा फल भी कुछ अधिक लगते हैं। वर्षों के साथ वह परिपक्व हुआ है, और उसकी इस परिपक्वता के भरपूर फल से लाभ पाना हमारे लिए एक आशीष रहा है।
अनेक दृष्टियों से यह उस जीवन का चित्र प्रस्तुत करता है जिसके लिए हमें मसीही जीवन में बुलाया गया है—ऐसा जीवन जिसमें निरन्तर बढ़ती हुई फलवन्तता दिखाई देती है। इसलिए हम पढ़ते हैं, “इसलिए आओ… सिद्धता की ओर बढ़ते जाएँ” (इब्रानियों 6:1)।
परिपक्वता का आदर्श
मसीही परिपक्वता का सर्वोच्च उदाहरण हमारे लिए प्रभु यीशु में चित्रित की गई है । उसी के स्वरूप के अनुरूप बनाए जाने के द्वारा हम भी परिपक्व और फलवन्त बनते हैं।
प्रायः प्रभु यीशु के मानवीय जीवन की वास्तविकता को कम करके आँकने की प्रवृत्ति होती है। किन्तु ख्रीष्ट के मानवीय जीवन में वास्तव में परिपक्वता की वृद्धि हुई। वह एक सिद्ध शिशु, सिद्ध बालक और सिद्ध वयस्क था। उसने अपने जीवन के प्रत्येक चरण में बिना पाप किए परिपक्वता प्राप्त की।
लूका 2:40 में हम पढ़ते हैं, “बालक बढ़ता और बलवन्त होता गया, और बुद्धि से परिपूर्ण था; और परमेश्वर का अनुग्रह उस पर था।” जैसा कि कैल्विन टिप्पणी करते हैं , “ख्रीष्ट को वास्तव में मनुष्य बनाया गया… उसने स्वेच्छा से वह सब कुछ ग्रहण किया जो मानवीय स्वभाव से अविभाज्य है।” इसमें परिपक्वता में बढ़ना भी सम्मिलित है।
ख्रीष्ट परिपक्व हुआ जब उसके पिता ने उसे वचन की शिक्षा दी:
“प्रतिदिन भोर को वह मुझे जगाता है;
और मेरा कान खोलता है कि मैं शिष्य के समान सुनूँ।”
(यशायाह 50:4)
वह पतित संसार के दुःखों और परीक्षाओं के बीच से होकर भी परिपक्व हुआ। इब्रानियों का लेखक कहता है, “उसने दुख सह सह कर आज्ञा पालन करना सीखा।” (इब्रानियों 5:8)। यीशु की आज्ञाकारिता प्रत्येक चरण में सिद्ध थी, परन्तु उसके दुःखों ने उसे और भी गहरी आज्ञाकारिता तथा परिपक्वता की ओर अग्रसर किया।
परिपक्वता के साधन
ख्रीष्ट केवल परिपक्वता का आदर्श ही नहीं है; वही मसीही परिपक्वता का साधन भी है। फल तभी बढ़ता और फलता-फूलता है जब वह वृक्ष से जुड़ा रहता है। जॉन ब्राउन ऑफ़ वैम्प्रे कहते हैं ,
प्रभु यीशु से मिलने वाले किसी भी अनुग्रहकारी प्रभाव का लाभ उठाकर भ्रष्टताओं को मार डालना और नए मनुष्य को बढ़ाना तब तक सम्भव नहीं है, जब तक कि हम ख्रीष्ट के साथ एक न हो जाएँ और विश्वास के द्वारा उसके साथ एक न बनाए जाएँ।
परिपक्वता “उसी में” विकसित होती है।
यह परिपक्वता उन साधनों के द्वारा विकसित होती है जिन्हें स्वयं ख्रीष्ट ने ठहराया है। इफिसियों 4 में पौलुस कहता है कि ख्रीष्ट ने कलीसिया को “चरवाहे और शिक्षक” दिए हैं, जिससे कि वे हमें “पूर्ण मनुष्य बनने तक, अर्थात् ख्रीष्ट की परिपूर्णता के डील-डौल तक पहुँचाएँ” (इफिसियों 4:11, 13)। जब हम उन पास्टरों की सेवकाई से लाभ उठाते हैं जिन्हें परमेश्वर ने अपनी कलीसिया को दिया है, तब “हम आगे को बालक न रहें जो मनुष्यों की ठग-विद्या, धूर्तता, भ्रम की युक्ति और सिद्धान्त-रूपी हवा के हर एक झोंके से उछाले और इधर-उधर घुमाए जाते हों। वरन् प्रेम में सच्चाई से चलते हुए सब बातों में उसमें बढ़ते जाएँ जो सिर है, अर्थात् ख्रीष्ट में” (इफिसियों 4:14–15)। वचन की शिक्षा पर ध्यान देने से हम धर्मसिद्धान्त में स्थिर होते हैं और झूठी शिक्षाओं के कारण सत्य के मार्ग से भटकने से बचे रहते हैं। इस प्रकार हम अपने सिर, अर्थात् ख्रीष्ट के समान बनने में बढ़ते जाते हैं। यही मसीही परिपक्वता है। अपने सुनने वालों में इस परिपक्वता को देखना प्रचारकों का लक्ष्य है: “हम उसी का प्रचार करते हैं, और हर एक मनुष्य को चिताते और समस्त ज्ञान से सिखाते हैं, जिससे कि प्रत्येक व्यक्ति को ख्रीष्ट में सिद्ध करके उपस्थित कर सकें” (कुलुस्सियों 1:28)।
ख्रीष्ट-सदृश परिपक्वता संसार में दुःखों का अनुभव करने से भी आती है। रोमियों 5:3–4 कहता है, “हम अपने क्लेशों में भी आनन्दित होते हैं, क्योंकि यह जानते हैं कि क्लेश में धैर्य उत्पन्न होता है, तथा धैर्य से खरा चरित्र, और खरे चरित्र से आशा उत्पन्न होती है” पतित संसार के दुःख और कठिनाइयाँ हमारे भीतर ख्रीष्ट के समान चरित्र का निर्माण करती हैं।
जब हम वचन की शिक्षा द्वारा आशीषित होते हैं, और जीवन की परीक्षाओं के द्वारा पवित्र किए जाते हैं, तब हमारी परिपक्वता में वृद्धि होती है। नीतिवचन कहता है, “बुद्धिमान को शिक्षा दे, और वह और भी बुद्धिमान होगा” (नीतिवचन 9:9)। हमें यह भी बताया गया है कि दुःख “उन लोगों के लिए जो इसके द्वारा प्रशिक्षित हो चुके हैं,उन्हें बाद में धार्मिकता का शान्तिदायक फल प्राप्त, धर्म का शान्तिमय फल उत्पन्न करता है” (इब्रानियों 12:11)।
अपरिपक्वता के प्रमाण
परिपक्वता का अर्थ है ख्रीष्ट के समान होना। परन्तु हम उसके विपरीत अर्थात् अपरिपक्वता को देखकर भी समझ सकते हैं कि परिपक्वता क्या है। इब्रानियों 5:12–14 में अपरिपक्वता का विस्तृत वर्णन मिलता है। वहाँ बताया गया है कि वे विश्वासी “परमेश्वर के वचनों की आरम्भिक शिक्षाओं” से भी अनभिज्ञ थे, उन्हें “ठोस भोजन नहीं, परन्तु दूध” चाहिए था, और वे “भले और बुरे में भेद” करने में असमर्थ थे। दूध और बालपन का अपना उचित समय और स्थान है (1 पतरस 2:2; 1 कुरिन्थियों 13:11)। परन्तु मसीहियों को धर्मसिद्धान्त के विषय में अज्ञानी बने रहने या सही और गलत के विषय में नैतिक निश्चितता से रहित होने के लिए नहीं बुलाया गया है। इसके विपरीत, मसीही परिपक्वता इन सब बातों के विपरीत है।
अपरिपक्वता का एक और चिन्ह 1 कुरिन्थियों 3:1–3 में मिलता है। पौलुस कुरिन्थियों को “ख्रीष्ट में बालक” कहकर सम्बोधित करता है और कहता है, “तुम में डाह और झगड़े हैं।” व्यक्तियों के कारण कलीसिया में होने वाले विभाजन आत्मिक अपरिपक्वता को प्रकट करते हैं। इसके विपरीत, मसीही परिपक्वता विश्वासियों के बीच एकता के प्रति प्रेम उत्पन्न करती है।
निष्कर्ष
इस जीवन में कोई भी मसीही पूर्ण परिपक्वता प्राप्त नहीं करेगा। हमें निरन्तर बढ़ते रहना है। हमें यह बुलाहट मिली है कि “हमारे प्रभु और उद्धारकर्ता यीशु ख्रीष्ट के अनुग्रह और ज्ञान में बढ़ते जाओ” (2 पतरस 3:18)। हमारी पूर्ण परिपक्वता स्वर्ग में हमारी प्रतीक्षा कर रही है। जब हम उसे देखेंगे, तब हम उसके समान हो जाएँगे (1 यूहन्ना 3:2)। केवल उसी दिन परिपक्वता की सम्पूर्ण महिमा हमारी होगी। अभी तो हम “प्रभु के तेज का दर्शन करते हुए उसी तेजस्वी स्वरूप में बदलते जाते हैं, और यह महिमा के एक स्तर से दूसरे स्तर तक होता जाता है” (2 कुरिन्थियों 3:18)।
हमारी पूर्ण ख्रीष्ट-सदृश परिपक्वता का दिन निश्चित है। “जिन्हें उसने पहले से जान लिया, उन्हें पहले से ठहराया भी कि वे उसके पुत्र के स्वरूप में हो जाएँ” (रोमियों 8:29)। एक दिन हम ख्रीष्ट के समान पूर्णतः परिपक्व होंगे। यह कैसी महान् आशा है!
यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

