मैं हूँ: परमेश्वर की हस्ती

 

मनुष्यों को स्वायत्त होने का विचार पसंद है। ऐसा प्रतीत होता है कि मानवजाति की सम्पूर्ण दुर्दशा का सार, जैसे कि धर्मनिरपेक्ष संसार द्वारा प्रदर्शित किया जाता है, किसी भी प्रकार से कहीं भी उत्तरदायी होने से स्वतंत्र रहने की खोज करते रहना है। यह धारणा वास्तविकता के विरुद्ध जाती है, और इस तरह के अस्तित्व की लालसा ने ही, अदन की वाटिका में, मानवजाति को पाप में ढकेल दिया। सृजे हुए होने के नाते, मनुष्य परमेश्वर पर अपने अस्तित्व तथा अपने बने रहने के लिए निर्भर हैं। इससे परमेश्वर के लोगों के हृदय में अत्यन्त आनन्द जागृत होना चाहिए, क्योंकि अपरिवर्तनीय, प्रेमी, और सर्वज्ञानी परमेश्वर न केवल अपने हाथों में हमारे अस्तित्व को सुरक्षित रखता है, वरन् निश्चय ही, जो उससे प्रेम करते हैं, उनके लिए सभी बातों के द्वारा भलाई ही उत्पन्न करता है।