The Holy of Holies

परम पवित्र स्थान

18 जून 2026
The Holy of Holies

परम पवित्र स्थान

18 जून 2026

जब मैं फँसा हुआ अनुभव करता हूँ   

When I Feel Stuck

जब मैं बड़ा हो रहा था और आयरलैण्ड में रहता था, तब हमारे यहाँ बरसात भरे बुधवार की दोपहरें बहुत हुआ करती थीं। सप्ताहाँत के बीच फँसा हुआ, और संध्या भर का गृहकार्य सामने पड़ा हुआ, मुझे स्मरण है कि मैं विद्यालय से फुहारों के बीच  भीगता हुआ घर लौटता था। किताबों का बोझ उठाए हुए, जिनके पन्ने नमी से मुड़ गए होते थे, और मोज़े पानी से इतने भीग चुके होते थे कि टखनों से पानी अन्दर आता और पंजों से बाहर निकलता था। मैं उतना ही प्रसन्न था जितनी कोई बिल्ली नहाते समय होती है (यद्यपि  उतना क्रोधित नहीं)।

आत्मा भी अपने ऐसे ही बरसाती दोपहरों को जानती है। हम सब उड़ाऊ पुत्र के समान हैं, जो आदम के चुनाव से श्रापित इस संसार में घर लौट रहे हैं। पतन ने प्रत्येक आनन्द को फीका कर दिया है। दोषबोध, लज्जा और पछतावे से भारी बोझ हमारे कन्धों को दबाते हैं। भीतर के भय और बाहर की विपत्तियाँ काले बादलों की भाँति मँडराती हैं। हम उस स्वागत करने वाले पिता के दौड़ते हुए कदमों की आहट सुनने की लालसा रखते हैं—उसकी सुदृढ़ भुजाएँ  हमें घेरे हुए हों, और उसके आँसू हमारे गालों पर गर्म और नमकीन प्रतीत हों। परन्तु अधूरी लालसाएँ हमारे साथ निरन्तर चलती रहती हैं। हमारे सर्वोत्तम क्षण भी बाधित हो जाते हैं, और जैसे सप्ताह के बीच के विद्यार्थी को सप्ताहाँत बहुत दूर लगता है, वैसे ही स्वर्ग भी इतना कभी-कभी इतना दूर लगता है मानो वह कभी आएगा ही नहीं।

इनमें सबसे कठिन समय वे होते हैं जिनका कोई स्पष्ट कारण दिखाई नहीं देता। कोई विशेष पाप, असफलता या त्रुटि दिखाई नहीं देती जिसे दोषी ठहराया जा सके। हम स्वयं को निरुत्साहित और शिथिल अनुभव करते हैं, परन्तु कारण नहीं जानते (भजन संहिता 42:5)। ऐसी स्थिति में हम भावनाओं पर आधारित एक अन्धकारमय ईश्वरविज्ञान के शिकार बन जाते हैं। इसके पश्चात् एक निराशाजनक स्थिति आ जाती है: हमें ऐसा आभास नहीं होता कि परमेश्वर हमसे बात कर रहा है, इसलिए हम अपनी बाइबल पढ़ना बन्द कर देते हैं। हमें ऐसा अनुभव नहीं होता कि परमेश्वर हमारी सुन रहा है, इसलिए हम प्रार्थना करना छोड़ देते हैं। यह जड़ता सब कुछ मन्द कर देती है; हम कहीं आगे नहीं बढ़ते। तब हम यह प्रश्न करते हैं कि अब हम क्या करें? 

सबसे पहले, यह स्मरण रखिए: आप अकेले नहीं हैं। परमेश्वर की सभी सन्तानें पहले भी इन मार्गों पर चल चुके हैं। अनेकों बार भजनकारों ने अपने आप को त्यागा हुआ अनुभव किया, फिर भी वे गीतों में परमेश्वर की ओर बढ़ते रहे। दाऊद ने पुकारकर कहा: “हे यहोवा, कब तक? क्या तू सदा मुझे भूला रहेगा?” (भजन 13:1)। कोरह के पुत्रों ने पूछा: “हे मेरे प्राण, तू निराश क्यों है?, और भीतर ही भीतर तू व्याकुल क्यों?” (भजन 42:5)। ये पवित्रजन प्रभु के सामने आकर पूछ रहे थे कि वह कब तक अपना मुख उनसे छिपाए रखेगा। यहाँ हमारे लिए एक शिक्षा है: अच्छे लोग कई बार अपनी वास्तविक स्थिति से भी अधिक बुरा अनुभव करते हैं। ये लोग गहरे निराशा के क्षण से आरम्भ करते हैं, पर वहीं समाप्त नहीं होते। जैसे जैसे भजनकार व्याकुल होते हैं, उनके हृदय से पवित्रशात्र के वचन फूट पड़ते हैं। अन्धकार में, त्यागे जाने की भावना के नीचे भी, परमेश्वर उपस्थित रहता है। वह उन्हें वचन देता है, अपनी ओर खींचता है, और बाइबल की प्रेरणा देता है। यहोवा सर्वदा हमारी अनुभूति से अधिक निकट रहता है।

दूसरी बात, परमेश्वर से प्रार्थना कीजिए कि वह आपके भीतर किसी भी “दुःखदायी” मार्ग को प्रकट करे जो उसके साथ आपकी सहभागिता में बाधा बन रहा हो (भजन 139:24)। “दुःख” की जड़ आदम के उस कटु निर्णय तक पहुँचती है (“दुःख,” “परिश्रम,” और “पीड़ा” इब्रानी भाषा में परस्पर सम्बन्धित शब्द हैं; उत्पत्ति 3:16–17)। अदन की वाटिका में हमारे आदि पिता ने परमेश्वर से अलग, एक उत्तम जीवन की खोज करने की एक पारिवारिक परम्परा का आरम्भ किया था। कब्रों से भरा संसार उसकी सफलता की कहानी का वर्णन करती है। परन्तु निराश न हो: उत्तम वैद्य इसलिये मरा कि ऐसे परमेश्वर रहित चुनावों की “इच्छा” और “क्रियान्वयन” दोनों को आपसे दूर कर दे (फिलिप्पियों 2:12–13)।

पाप के अतिरिक्त, हमें अपने हृदय में उगने वाले उन झाड़ियों को भी पहचानना चाहिए, वे विषैली इच्छाएँ जो आत्मा के जीवन को घोंट देती हैं। यीशु बोने वाले के दृष्टान्त में ऐसी तीन बातों की पहचान करते हैं: जीवन की चिंताएँ, धन का धोखा, और अन्य वस्तुओं का लोभ (मरकुस 4:19)। जब ये झाड़ियाँ बढ़ती रहती हैं, तब हम कभी वास्तव में स्वस्थ अनुभव नहीं करेंगे। इन्हें नष्ट करने के लिए पवित्र आत्मा स्वर्गीय खरपतवार-नाशक अर्थात् उत्तम जीवन के विषय में उच्च और पवित्र विचार हमारे भीतर उत्पन्न करने के लिए तैयार खड़ा है (रोमियों 8:5; फिलिप्पियों 4:8; कुलुस्सियों 3:1–4)। ख्रीष्ट से जुड़े होने के कारण हम जीवन की नई चाल में चलते हैं (रोमियों 6:1–14)।

तीसरा, अपने आप को परखिए: क्या आप ईश्वरीय- प्रावधान के साथ शान्ति में हैं? उस परमेश्वर के निकट आना कठिन होता है जिसके प्रति भीतर ही भीतर आपके मन में रोष छिपा हुआ हो। अवांछित बोझ हमारी प्रार्थना के साथी बन सकते हैं; वे हमारी अभिलाषाओं को जगाते हैं और हमें परमेश्वर के निकट ले आते हैं (भजन 55:22)। परन्तु यदि हम उन बोझों को पकड़े रहना ही पसन्द करें, तो वे प्रार्थना के स्थान को कई अनकहे संघर्षों से भर देते हैं और परमेश्वर के निकट जाने की हमारी इच्छा को मन्द कर देते हैं। परमेश्वर के सामने ईमानदार बने; वह प्रत्येक उस बोझ को उठा सकता है जिसे आप उसे सौंपना चाहते हैं।

जब हम स्वीकार करते हैं कि हर पीड़ा के पीछे परमेश्वर ही प्रथम कारण है, तब हमें बड़ी शान्ति मिलती है। जो लहरें हमें डुबोती प्रतीत होती हैं, वे भी उसी की हैं (भजन 42:7)। प्रत्येक कठिनाई में वही मुख्य कार्यकर्ता है (भजन 66:10–12)। फिर भी, इन सब में परमेश्वर हमारे पक्ष में है। अपने आप का इन्कार करना और परमेश्वर की इच्छा के अधीन होना विश्वास के जीवन के पहले और अन्तिम सीख हैं। परन्तु जॉन न्यूटन का कथन सत्य है—बहुत कम लोग “निराशा के विद्यालय” में कुछ समय प्रशिक्षित हुए बिना ये पाठ सीखने को तैयार होते हैं।

क्या होगा यदि अन्धकार कभी समाप्त ही न हो? प्राय: ऊपर उठने का सबसे उत्तम मार्ग केवल विश्वास और आज्ञाकारिता है। अय्यूब के धैर्य पर ध्यान दीजिए (अय्यूब 23:8–12)। घोर अन्धकार और विरोध के बीच देखिए कि वह कैसे भ्रम (पद 8–9) से विश्वासपूर्ण दृढ़ता (पद 10) और फिर समर्पण (पद 11–12) की ओर बढ़ता है। इस पतित संसार में अय्यूब जानता है कि वह जितना अनुभव कर सकता है, उससे कहीं अधिक ईश्वरविज्ञान जानता है। विश्वास उस खाई को पाट देता है और उसे उस क्षेत्र तक ले जाता है जहाँ भावनाओं का हाथ सर्वदा पहुँच नहीं पाता (इब्रानियों 11:1)। 

“वह मेरा चाल-चलन जानता है; जब वह मुझे परख चुकेगा, मैं सोने के समान निकलूँगा।” (अय्यूब 23:10)। विश्वास के पास इस यात्रा के लिए ऐसा आश्वासन है जो हमारे सबसे बड़े भय से भी अधिक सच्चा है। इसलिए हम परमेश्वर में बने रहते हैं, क्योंकि वह हमसे लगा रहता है (पद 11–12)। जैसे कोई टेरियर नस्ल का कुत्ता अपने खिलौने को मजबूती से पकड़े रहता है, वैसे ही अय्यूब इस सत्य को  पूरे सामर्थ से थामे रहता है। उसे आभास नहीं होता कि वह परमेश्वर को पकड़े हुए है, परन्तु विश्वास एक और भी सामर्थी हाथ को देखता है जो उसे थामे हुए है—ऐसा हाथ जो उसे कभी नहीं छोड़ेगा।

अन्त में, बरसाती और उदास बुधवार की दोपहरों में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं है, “मैं क्या अनुभव कर रहा हूँ?” किन्तु यह है, “मैं क्या जानता हूँ?”

 यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

नील स्टीवर्ट

नील स्टीवर्ट

डॉ. नील स्टीवर्ट दक्षिण कैरोलिना के कोलंबिया में स्थित फर्स्ट प्रेस्बिटेरियन चर्च के वरिष्ठ पादरी हैं।