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अपनी पुस्तक द हंगर फॉर सिग्निफिकेन्स (The Hunger for Significance) में मैंने उस इच्छा का अध्ययन किया था जो प्रायः हम सब में पाई जाती है — अर्थात्, अपने जीवनों में गरिमा, मूल्य और महत्व का कोई आधार खोजने की इच्छा। उस समय मैंने लिखा था: “आधुनिक मनुष्य के भीतर एक कष्टदायी खालीपन है। जिस शून्यता का हम अनुभव करते हैं, उसे न तो एक नई गाड़ी, न ही एक बेहतर नौकरी, और न ही कोई बड़ा घर भर सकता है। वह केवल इस समझ से ही भरी जा सकती है कि प्रत्येक मानव जीवन महत्त्वपूर्ण है। हमारे जीवनों को अर्थहीन नहीं ठहराया जा सकता।”
महत्त्व और मानवीय गरिमा की आधुनिक खोज प्रायः उस निराशा के भारी वातावरण के कारण उत्पन्न होती है, जो हमारे उस सांस्कृतिक दृष्टिकोण में व्याप्त है जिसमें हम जीते हैं। हमें बार-बार यह बताया जाता है कि हम तो केवल विश्वव्यापी संयोग मात्र हैं, जो किसी प्रकार आकस्मिक रूप से आदिम कीचड़ से उत्पन्न हो गए। हमारी उत्पत्ति अर्थहीन है, और हमारा अन्तिम परिणाम विनाश है। फिर भी, निराशा के इन दो ध्रुवों के बीच में भी, महत्त्व और गरिमा की खोज एक ऐसी खोज है, जो प्रायः अत्यन्त तीव्र आकांक्षा के साथ की जाती है।
टेबलटॉक के इस अंक में हम उत्कृष्टता की खोज पर विचार कर रहे हैं, जो अनेक स्थितियों में हमारे महत्त्वपूर्ण होने की मूलभूत अभिलाषा से गहराई से जुड़ी हुई है। उत्कृष्टता की खोज के लिए भिन्न-भिन्न, और कभी-कभी परस्पर विरोधी प्रेरणाएँ हो सकती हैं । यह खोज केवल किसी कार्य में श्रेष्ठ बनने की इच्छा पर आधारित हो सकती है। एक ओर, इस प्रकार की उत्कृष्टता की प्रेरणा प्रतिस्पर्धात्मक प्रभुत्व की इच्छा से भी उत्पन्न हो सकती है। ऐतिहासिक रूप से, हमने अपनी मनुष्यता को होमो सेपियन्स शब्द के द्वारा परिभाषित किया है। उन्नीसवीं शताब्दी का शून्यवादी दार्शनिक फ़्रीडरिख़ नीत्शे ने यह तर्क दिया कि मानव अस्तित्व को सबसे अधिक परिभाषित करने वाली वस्तु हमारी बुद्धि (सेपियन्स) नहीं है, किन्तु हमारी सामर्थ्य प्राप्त करने की इच्छा, हमारी विजय प्राप्त करने की इच्छा है। सामर्थ्य की वह लालसा जो अत्याचारियों और तानाशाहों को संचालित करती है, उसे हम सामान्यतः बुराई के रूप में देखते हैं, परन्तु नीत्शे उसे सद्गुण मानता था। उसके लिए, अधिमानव (ऊबरमेन्श) वह है जो सबसे बढ़कर विजेता हो। वह ऐसा व्यक्ति है जो अपनी अन्तर्निहित सामर्थ्य प्राप्त करने की इच्छा को न केवल बिना किसी अंकुश के बढ़ने देता है, वरन् उपलब्ध प्रत्येक साधन के द्वारा उसे और अधिक पोषित करता है। जिस संसार में हम रहते हैं, उसमें सामर्थ्य प्राप्त करने की इच्छा प्रायः कंपनी की सीढ़ी पर ऊपर चढ़ने की चाह के रूप में, अधिकार और सामर्थ्य के शिखर तक पहुँचने की चाह के रूप में देखी जाती है, जिससे कि हम अन्य लोगों पर प्रभुत्व जमा सकें। इस दृष्टि से, दूसरों पर प्रभुत्व जमाने और दुर्बल लोगों पर अपनी प्रभुसत्ता स्थापित करने की प्रतिस्पर्धात्मक लालसा हमारी वास्तविक मनुष्यता की अभिव्यक्ति नहीं है, वरन् हमारी पतित मानवीय अवस्था की अभिव्यक्ति है। यह उस गहरे भ्रष्टाचार का प्रकटीकरण है जो हममें से प्रत्येक के हृदय में छिपा हुआ है।
दूसरी ओर, उत्कृष्ट बनने की प्रबल इच्छा उपलब्धि के लक्ष्यों तक पहुँचने की प्रेरणा से भी उत्पन्न हो सकती है। महत्त्वपूर्ण होने की की जो आकांक्षा प्रत्येक मनुष्य में स्वाभाविक रूप से पाई जाती है, वह अपने आप में कोई पापपूर्ण अभिलाषा नहीं है। मेरा विश्वास है कि महत्त्व की यह आकांक्षा हमारे सृष्टिकर्ता द्वारा हमें प्रदान की गई है। उसकी छवि में सृजे गए प्राणियों के रूप में हम जानते हैं कि जो गरिमा हमें प्राप्त है, वह हमारी अपनी स्वाभाविक या अन्तर्निहित गरिमा नहीं है, वरन हमें प्रदान की गई गरिमा है। अर्थात्, यह वह गरिमा है जो परमेश्वर ने हमें प्रदान की है। हमारा मूल्य और महत्त्व इसलिए है क्योंकि परमेश्वर हमें मूल्यवान घोषित करता है। परमेश्वर ही हमें अपनी सामर्थ्य के अनुसार सर्वोच्च स्तर की उत्कृष्टता और उपलब्धि के लिए परिश्रम करने के लिए बुलाता है। उसी के हाथ से हमें वे वरदान प्राप्त होते हैं जिनका उपयोग हमें इस संसार में करना है। उन्हीं वरदानों का विश्वासयोग्य उपयोग हमारी उत्कृष्टता की अभिलाषा का प्रेरक होना चाहिए। महत्त्वपूर्ण होने की आकांक्षा अपने आप में कोई बुरी बात नहीं है, किन्तु वास्तव में, मानव हृदय में धड़कने वाली ऐसी उत्तम इच्छाएँ अनियन्त्रित भी हो सकती हैं। ईश्वरीय नैतिकता द्वारा उन्हें संयमित न किया जाए, तो महत्त्व की आकांक्षा सरलता से नीत्शेवादी सामर्थ्य प्राप्त करने की इच्छा में परिवर्तित हो सकती है।
उत्कृष्टता की वैध प्रेरणा यह है कि हम उपलब्धि की खोज परमेश्वर की महिमा के लिए करें। यही वह प्रधान उद्देश्य है जिसके लिए हमारी सृष्टि हुई है—अर्थात् कि हम उसकी महिमा की साक्षी दें। एक बात जो परमेश्वर की महिमा की साक्षी नहीं देती, वह है मध्यमता से चिपके रहने की मानवीय प्रवृत्ति, अर्थात् वर्तमान स्थिति के प्रति आत्म-सन्तुष्ट बने रहना। इसके विपरीत, पवित्रशास्त्र हमें एक उच्च बुलाहट की खोज करने के लिए बुलाता है — अर्थात् उस उच्च बुलाहट की जो हमें ख्रीष्ट यीशु में प्राप्त हुई है। ऐसी उच्च बुलाहट तब पूरी नहीं हो सकती, जब हम आलस्य में डूबे रहें। आलस्य और सुस्ती दो ऐसी जुड़वाँ दुर्गुण हैं, जिनकी पवित्रशास्त्र में पूर्ण और कठोर निन्दा की गई है। उत्कृष्टता को प्राप्त करने में हमारे विफल होने का सबसे बड़ा कारण यह है कि हम उस सीमा तक परिश्रम करने के लिए तैयार नहीं हैं जिस सीमा तक परिश्रम करने पर ही उत्कृष्टता प्राप्त की जा सकती है। कठिन परिश्रम और अनुशासित श्रम के बिना किसी भी उत्तम कार्य में कोई भी उत्कृष्टता प्राप्त नहीं कर सकता। इस अर्थ में, उपलब्धि का शत्रु आलस्य है। दूसरी ओर, चाहे किसी का हृदय कितना ही पवित्र क्यों न हो, उत्कृष्टता की खोज में अभिमान का भ्रष्ट तत्व किसी-न-किसी रूप में सम्मिलित हो ही जाता है। यदि हम इस संसार के सम्भव उच्चतम लक्ष्यों को भी प्राप्त कर लें, और मानवीय उपलब्धि की ऊँचाइयों पर अभूतपूर्व ढंग से चढ़ जाएँ, तब भी हम अधिक से अधिक ऐसे दास बने रहेंगे जिन्होंने केवल अपना कर्तव्य पूरा किया है, जिन्हें परमेश्वर की महिमा और ख्रीष्ट यीशु में मिले हुए बहुमूल्य छुटकारे को छोड़ और किसी भी बात पर घमण्ड करने का अधिकार नहीं है।
अतः हम उत्कृष्टता प्राप्त करने का प्रयत्न करें, अपने आप को धैर्य और सहनशीलता की चरम सीमा तक ले जाएँ, जिससे कि जो कुछ हम करें उसमें उत्कृष्टता का उच्चतम सम्भव स्तर प्राप्त कर सकें; और साथ ही साथ, हमें निरन्तर सावधान भी रहना चाहिए कि कहीं अभिमान की बुरी प्रवृत्ति हमारे श्रम के मूल्य को नष्ट न कर दे। आइए, हम कठिन परिश्रम करें, परमेश्वर की महिमा के लिए हम उत्कृष्ट बनें। सोली देओ ग्लोरिया— केवल परमेश्वर को ही महिमा मिले ।
यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

