Exceptional Mediocrity

असाधारण मध्यमता

25 जून 2026
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क्योंकि परमेश्वर ने जगत् से इतना प्रेम किया

For God So Loved the World

प्रत्येक मसीही सीमित प्रायश्चित्त में विश्वास करता है। यह बात मेरे अरमिनियसवादी मित्रों को हास्यास्पद लग सकती है, क्योंकि लम्बे समय से यह माना जाता रहा है कि केवल कैल्विनवादी ही सीमित प्रायश्चित्त को स्वीकार करते हैं। परन्तु यदि यीशु ख्रीष्ट की मृत्यु को वास्तविक प्रायश्चित्त माना जाए, (और न कि केवल एक सम्भावित प्रायश्चित्त नहीं), तब उसकी सीमा के प्रश्न से बचा नहीं जा सकता — जब तक कि कोई सर्वमुक्तिवाद के भ्रम को न मान ले। 

यही सत्य कि ख्रीष्ट की मृत्यु ने वास्तव में पापों का प्रायश्चित्त किया, हमें उन अद्भुत पदों को समझने का मार्गदर्शन देता है जो उसके उद्धारकारी कार्य की व्यापकता का वर्णन करते हैं। उदाहरण के लिए, यूहन्ना लिखता है कि यीशु “हमारे पापों के लिए प्रायश्चित्त है, और केवल हमारे ही नहीं, वरन् सारे संसार के पापों के लिए भी” (1 यूहन्ना 2:2)। यहाँ विकल्प केवल कैल्विनवाद और अरमिनियसवाद के बीच नहीं हैं। किन्तु यह कैल्विनवाद और सर्वमुक्तिवाद के बीच है। यदि “संसार” का अर्थ “हर एक व्यक्ति जो कभी जीवित रहा है या भविष्य में जीवित होगा” है, तो प्रायश्चित्त के वस्तुनिष्ठ स्वरूप के कारण सभी लोग उद्धार पाएँगे। तब कोई भी पाप ऐसा न रहेगा जिसका दण्ड न चुका दिया गया हो — यहाँ तक कि अविश्वास का पाप भी नहीं।

जो कोई भी नरक और अन्तिम न्याय के विषय में बाइबल की शिक्षाओं को गंभीरता से लेता है, वह कभी भी सर्वमुक्तिवाद को स्वीकार नहीं करेगा। इसलिए यहाँ यूहन्ना द्वारा प्रयुक्त “संसार” शब्द का प्रयोग उस अर्थ में नहीं कर रहा है कि “अब तक जीवित रहे या आगे कभी जीवित होने वाले प्रत्येक व्यक्ति (जैसा कि वह अनेक अन्य स्थानों पर भी नहीं करता ; देखें यूहन्ना 14:19; 16:8; 18:20; 1 यूहन्ना 2:15)। यूहन्ना का उद्देश्य यह घोषित करना है कि यीशु ही समस्त संसार के एकमात्र उद्धारकर्ता है। उनकी मृत्यु केवल यहूदियों, अमेरिकियों, या किसी एक विशेष समूह के लोगों के लिए ही उद्धार का साधन नहीं बनी, परन्तु सम्पूर्ण संसार की सभी जातियों और लोगों में से एक प्रजा का उद्धार करती है। 

एक ओर, कैल्विनवाद सर्वमुक्तिवाद की विधर्मी शिक्षा से रक्षा करता है, और दूसरी ओर, वह  प्रायश्चित्त के वस्तुनिष्ठ स्वरूप को कम करके आँकने की त्रुटि से भी बचता है। कैल्विनवादी यह स्वीकार करता है कि यीशु की मृत्यु उन सभी को निश्चित रूप से उद्धार प्रदान करती है जिनके लिए वह ठहराई गई थी। दूसरे शब्दों में, प्रायश्चित्त को उसके विस्तार और उद्देश्य की दृष्टि से सीमित माना जाता है। जिन-जिन लोगों के लिए ख्रीष्ट ने प्राण दिए, वे सभी निश्चित रूप से उद्धार पाएँगे। 

किन्तु अरमिनियसवाद ऐसी त्रुटियों से सफलतापूर्वक रक्षा नहीं कर पाता। अरमिनियसवादी मत के अनुसार, यीशु की मृत्यु इतिहास के प्रत्येक व्यक्ति के उद्धार के लिए अभिप्रेत थी, परन्तु उसने वास्तव में उन सबका उद्धार नहीं किया। इस प्रकार, जिन सब लोगों के उद्धार के लिए प्रायश्चित्त किया गया था, उन सबका उद्धार वह कर नहीं सका। दूसरे शब्दों में, अरमिनियसवादी  मत यह दावा करता है कि प्रायश्चित्त अपने विस्तार में असीमित है, क्योंकि वह सभी मनुष्यों के लिए किया गया था; उसे यह निष्कर्ष भी स्वीकार करना पड़ता है कि वह अपनी प्रभावकारिता में सीमित है। वह अपने सार्वभौमिक उद्देश्य को पूरा करने में सफल नहीं हुआ। 

इन दोनों दृष्टिकोणों के बीच का अन्तर उस संकरे पुल और चौड़े पुल के अन्तर के समान है, जिसमें संकरा पुल पूरी घाटी को पार कराता है, जबकि चौड़ा पुल केवल आधे रास्ते तक ही पहुँचता है। । यदि वह आपको दूसरी ओर तक नहीं पहुँचा सकता, तो उसके अधिक चौड़े होने से क्या लाभ?

इसी अंतर के कारण चार्ल्स स्पर्जन ने तर्क दिया कि वास्तव में कैल्विनवाद की अपेक्षा अरमिनियसवाद ही ख्रीष्ट के प्रायश्चित्त को अधिक सीमित करता है। अरमिनियसवादी  कहता है:

“ख्रीष्ट इसलिए मरा कि कोई भी मनुष्य उद्धार पा सकता है, यदि” — और फिर उद्धार की कुछ शर्तें जोड़ दी जाती हैं। अब बताइए, ख्रीष्ट की मृत्यु को सीमित कौन करता है? आप ही करते हैं। आप कहते हैं कि ख्रीष्ट इस प्रकार नहीं मरा कि किसी एक व्यक्ति का उद्धार अचूक रूप से सुनिश्चित हो जाए। जब आप कहते हैं कि हम ख्रीष्ट की मृत्यु को सीमित करते हैं, तो हम विनम्रतापूर्वक उत्तर देते हैं, “नहीं, प्रिय महोदय, वास्तव में ऐसा आप करते हैं।” हम कहते हैं कि ख्रीष्ट इस प्रकार मरा कि उसने एक ऐसी असंख्य भीड़ के उद्धार को अचूक रूप से सुनिश्चित कर दिया, जिसे कोई गिन नहीं सकता। ख्रीष्ट की मृत्यु के द्वारा वे लोग केवल उद्धार पाने योग्य ही नहीं बने, वरन् वे वास्तव में उद्धार पाए हैं, उन्हें अवश्य उद्धार पाना है, और किसी भी स्थिति में उनके उद्धार से वंचित रह जाने की कोई संभावना नहीं है। आप प्रायश्चित्त के अपने धर्मसिद्धान्त को अपने पास रख सकते हैं; हम उसे स्वीकार करने के लिए प्रायश्चित्त के अपने धर्मसिद्धान्त का त्याग कभी नहीं करेंगे।  (स्पर्जन के उपदेश, खंड 4, पृष्ठ 228)

तो फिर वह “हमारा” प्रायश्चित्त का दृष्टिकोण क्या है जिसका स्पर्जन  ने इतने उत्साह से समर्थन किया ? विशेष रूप से, यह वह समझ है कि जब यीशु ने क्रूस पर अपना लहू बहाया, तब उन्होंने वास्तव में उन सभी लोगों का उद्धार कर दिया जिन्हें उद्धार करने का उनका उद्देश्य था। जिस प्रकार पुरानी वाचा के अधीन महायाजक अपने याजकीय सेवा-कार्य के समय अपने वक्षपट (छाती पर धारण किए जाने वाले पट्ट) पर इस्राएल के बारह गोत्रों के नाम धारण करता था, उसी प्रकार नई वाचा के अधीन हमारे महान महायाजक, ख्रीष्ट, जब अपने लोगों के पापों के लिए स्वयं को बलिदान के रूप में अर्पित किया, तब उनके नाम उसके हृदय पर अंकित थे।

यूहन्ना 10 में यीशु अपने प्रायश्चितकारी मृत्यु के विशेष उद्देश्य को स्पष्ट रूप से से घोषित करता है। वे स्वयं को “अच्छा चरवाहा” कहता है, जो “भेड़ों के लिए अपना प्राण दे देता है” (यूहन्ना 10:11)। इसके थोड़ी ही देर बाद वह अपनी भेड़ों का वर्णन उन लोगों के रूप में करता है जिन्हें उसके पिता ने उसे दिया है। इसके अतिरिक्त, वह कुछ अविश्वासी यहूदियों से स्पष्ट शब्दों में कहता है: “तुम विश्वास नहीं करते, क्योंकि तुम मेरी भेड़ों में से नहीं हो” (यूहन्ना 10:26–29)। 

यूहन्ना 17 में हमारे प्रभु की महायाजकीय प्रार्थना भी इसी प्रकार की सीमित उद्देश्य को दर्शाती है। जब वह अपने लोगों के लिए बलिदानस्वरूप मृत्यु का सामना करने जा रहा था, तब उसने विशेष रूप से और वास्तव में केवल उन्हीं के लिए प्रार्थना की। वे वही लोग थे जिन्हें पिता ने संसार में से चुनकर उन्हें दिया था (यूहन्ना17:6)। इसलिए उनकी महायाजकीय मध्यस्थता भी उन्हीं तक सीमित थी: “मैं उनके लिए प्रार्थना करता हूँ; मैं संसार के लिए प्रार्थना नहीं करता, परन्तु उनके लिए जिन्हें तू ने मुझे दिया है, क्योंकि वे तेरे हैं” (यूहन्ना 17:9)। यह कल्पना भी नहीं की जा सकती कि यीशु उन लोगों के लिए प्रार्थना न करे जिनके लिए वह अभी प्रतिस्थापनीय प्रायश्चित्त के रूप में मरने वाला था। जिन लोगों के लिए उसने प्रार्थना की, उन्हीं लोगों के लिए वह मरा। 

सीमित प्रायश्चित्त अथवा विशिष्ट उद्धार का धर्मसिद्धान्त यह नहीं सिखाता कि ख्रीष्ट की मृत्यु में किसी प्रकार की कमी या अपर्याप्तता थी। जिस व्यक्ति ने दुःख सहा और मृत्यु का सामना किया, उसकी महानता के कारण यीशु की मृत्यु अनन्त मूल्य और महत्त्व रखती है। डॉर्ट के नियम इस बात को स्थापित करने के लिए विस्तार से तर्क प्रस्तुत करते हैं और स्पष्ट रूप से घोषणा करते हैं कि:  “परमेश्वर के पुत्र की मृत्यु… अनन्त महत्त्व और मूल्य रखती है, और सम्पूर्ण संसार के पापों का प्रायश्चित्त करने के लिए पूरी तरह पर्याप्त है” (2.3)।

प्रायश्चित्त की सीमा ख्रीष्ट के बलिदान की सामर्थ्य या मूल्य में नहीं, वरन् परमेश्वर के उस उद्देश्य और अभिप्राय में निहित है, जिसके अनुसार उसने यीशु को क्रूस पर भेजा। ख्रीष्ट का उद्धारकारी कार्य विशेष रूप से उसके अपने लोगों के लिए प्रायश्चित्त के रूप में निर्धारित किया गया था—उन लोगों के लिए जिन्हें पिता ने उन्हें सौंपा था। उनकी मृत्यु का उद्देश्य चुने हुए लोगों का उद्धार करना था।

यीशु यह शिक्षा देता है कि उसका सम्पूर्ण उद्धारकारी कार्य परमेश्वर द्वारा पूर्वनियत और पूर्वनियोजित योजना की पूर्ति के लिए सम्पन्न हुआ। यही बात वह यूहन्ना 6:38–39 में कहता है:

“क्योंकि मैं स्वर्ग से इसलिए नहीं उतरा कि अपनी इच्छा पूरी करूँ, बल्कि उसकी इच्छा पूरी करूँ जिसने मुझे भेजा है। और जिसने मुझे भेजा है उसकी इच्छा यह है कि जो कुछ उसने मुझे दिया है, उसमें से मैं कुछ भी न खोऊँ, बल्कि अन्तिम दिन उसे फिर जीवित कर उठाऊँ।”

ईश्वरविज्ञानी इस व्यवस्था को उद्धार की वाचा कहते हैं। इस वाचा में, इतिहास के आरम्भ होने से पहले ही पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा ने मिलकर पतित मानवजाति के उद्धार को सम्पन्न करने का निश्चय किया। केवल अपनी दया और अनुग्रह के कारण पिता ने कुछ व्यक्तियों को उद्धार के लिए चुन लिया (रोमियों 9:11–13; इफिसियों 1:4; 2 थिस्सलुनीकियों 2:13)। इन चुने हुए लोगों को उसने अपने पुत्र को सौंप दिया (यूहन्ना 6:37, 39; 17:6, 9, 24)। पुत्र ने स्वयं को उनके उद्धार को पूरा करने के लिए समर्पित किया और अपने देहधारण तथा उद्धारकारी कार्य के द्वारा उसे सम्पन्न करने का दायित्व स्वीकार किया (मरकुस 10:45; यूहन्ना 10:11)। इसी ईश्वरिय योजना के अनुसार, पवित्र आत्मा को पिता और पुत्र द्वारा संसार में भेजा गया (यूहन्ना 15:26; 16:5–15), जिससे वह ख्रीष्ट के कार्य को उन लोगों के जीवन में प्रभावी बनाए जिन्हें पिता ने पुत्र को दिया था और जिनके लिए पुत्र ने अपना जीवन बलिदान किया ।

प्रायश्चित्त के विषय में यह दृष्टिकोण सुसमाचार-प्रचार की सफलता की निश्चितता प्रदान करता है। परमेश्वर के ऐसे लोग हैं जो सुसमाचार के प्रचार के द्वारा अचूक रूप से उद्धार पाएँगे। पिता ने उन्हें चुन लिया है। ख्रीष्ट ने उनके लिए अपना जीवन बलिदान किया है। और पवित्र आत्मा उद्धार के सन्देश के माध्यम से उन्हें नया जन्म प्रदान करेगा। यही सत्य कुरिन्थुस में निराशा और विरोध का सामना करते समय पौलुस को दृढ़ बनाए रखता था (प्रेरितों के काम 18:9–10)। और यही सत्य आज भी हमारे सुसमाचार-प्रचार के प्रयासों में हमें उत्साहित और स्थिर रख सकता है—केवल अपने स्थानीय स्तर पर ही नहीं, वरन् समस्त संसार में भी (प्रकाशितवाक्य 5:9)।

 यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

डॉ. टॉम एस्कोल

डॉ. टॉम एस्कोल

डॉ. टॉम एस्कोल फ्लोरिडा राज्य के केप कोरल नगर स्थित ग्रेस बैपटिस्ट चर्च के वरिष्ठ पास्टर हैं। वे फाउंडर्स मिनिस्ट्रीज़ तथा सार्वजनिक धर्मविज्ञान संस्थान के अध्यक्ष भी हैं। वे प्रत्येक सप्ताह प्रसारित होने वाले "द स्वॉर्ड एंड द ट्रॉवेल" नामक पॉडकास्ट का संचालन करते हैं तथा "प्रिय तीमुथियुस: पास्टरीय सेवकाई पर पत्र" नामक पुस्तक के संपादक हैं।