For God So Loved the World

क्योंकि परमेश्वर ने जगत् से इतना प्रेम किया

30 जून 2026
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क्योंकि परमेश्वर ने जगत् से इतना प्रेम किया

30 जून 2026

प्रेम का सच्चा वर्णन

Love's Attributes

सत्रहवीं शताब्दी के आरम्भ में, आयरलैण्ड के आर्चबिशप उशर एक प्रेस्बिटेरियन सेवक के घर जाना चाहता था, ताकि वह यह देख सके कि उस व्यक्ति की व्यक्तिगत भक्ति के विषय में जो कुछ उसने सुना था, वह सच है या नहीं। उशर एक गरीब भिखारी के भेष में सेवक के घर पहुँचा। उसका भीतर स्वागत किया गया, जहाँ सेवक की पत्नी घर के लोगों को धर्म-शिक्षा दे रही थी। उसने इस अनपेक्षित आगन्तुक से पूछा कि आज्ञाएँ कितनी हैं। जब उसने उत्तर दिया, “ग्यारह,” तब उसने उसे एक अत्यन्त अज्ञानी मनुष्य समझा और उससे और कुछ नहीं पूछा, किन्तु उसने उसे भोजन दिया और सोने के लिए भेज दिया।

उस रात बाद में सेवक को उशर की चालाकी का पता चला, और उसने उससे अगली सुबह प्रचार करने का आग्रह किया। अतः उशर, अब साफ-सुथरा होकर और ऐसे वस्त्र पहनकर कि सेवक की पत्नी उसे पहचान न सके, मंच पर पहुँचा। उसने उस पर प्रचार किया जिसे उसने कहा कि “ग्यारहवीं आज्ञा” माना जा सकता है, अर्थात्, यूहन्ना 13:34 — “मैं तुम्हें एक नई आज्ञा देता हूँ कि एक दूसरे से प्रेम रखो।” सेवक की पत्नी आश्चर्यचकित रह गई कि वह भिखारी एक प्रचारक बन गया था, और यह कि उसने उसे इतनी बुरी तरह गलत समझा था और उसके प्रति अधिक प्रेम नहीं दिखाया था।

प्रेम क्या है? आप कैसे जानेंगे कि आप अपने मसीही भाई-बहनों से प्रेम रखने की ख्रीष्ट की आज्ञा का पालन कर रहे हैं या नहीं? एक प्रेम करने वाला व्यक्ति दूसरों के साथ कैसा व्यवहार करता है? लोकप्रिय मीडिया प्रायः प्रेम को आकर्षण और सुख की भावनाओं के रूप में प्रस्तुत करता है, परन्तु ऐसी भावनाएँ तो तापमापी में पारे की भाँति चढ़ती-उतरती रहती हैं। हमें ऐसे प्रेम की आवश्यकता है जो तापमापी जैसा कम और तापस्थापक जैसा अधिक हो — अर्थात् जो हमारी प्रतिक्रियाओं को नियन्त्रित करे, न कि उनके द्वारा नियन्त्रित हो।

अन्य लोग प्रेम के विषय में यह कहते हैं कि वह बिना न्याय किए, बिना शर्त की स्वीकृति है, जो “बिना शर्त के सकारात्मक सम्मान” की मनोवैज्ञानिक धारणा से ली गई है। किन्तु यह अति-सरल दृष्टिकोण भ्रम पैदा करता है, और हमें द्वेष और बुराई के सामने असहाय छोड़ देता है। आप एक आतंकवादी या एक धारावाहिक हत्यारे को बिना शर्त और बिना न्याय किए कैसे स्वीकार कर सकते हैं?

आज बहुत से मसीहियों का यह विश्वास है कि नए नियम में प्रेम के लिए मुख्य यूनानी शब्द अगापे और उससे जुड़ी क्रिया अगापाओ, किसी भावना को नहीं, परन्तु अपनी कीमत पर दूसरों का भला करने के संकल्प के एक कार्य को प्रकट करते हैं। किन्तु यह विचार यूनानी में प्रेम के लिए प्रयुक्त अलग-अलग शब्दों पर आधारित नहीं हो सकता, क्योंकि अगापे शब्द-समूह अलग-अलग सन्दर्भों में अनेक प्रकार की बातों का अर्थ दे सकता है। इसके अतिरिक्त, प्रेम की एक भावना-रहित धारणा हमें इस विषय में अनिश्चित छोड़ देती है कि हम अपनी भावनाओं के साथ क्या करें। यह उन गहरी, प्रायः छिपी हुई प्रेरणाओं से भी जूझने में विफल रहती है, जो हमारे निर्णयों को चलाती हैं।

तो फिर हमें प्रेम का सच्चा वर्णन कहाँ मिल सकता है? प्रेरित पौलुस ने 1 कुरिन्थियों 13:4–7 में हमें इसका एक उत्तम वर्णन दिया है। पौलुस प्रेम (केजेवी में, चैरिटी, लातिनी शब्द कैरिटास से) की प्रशंसा “और भी सर्वोत्तम मार्ग” के रूप में करता है (1 कुरिन्थियों 12:31) — जो आत्मिक वरदानों से श्रेष्ठ है (अध्याय 12), और परमेश्वर के तराजू में तौले जाने पर किसी भी मूल्यवान जीवन के लिए नितान्त आवश्यक है (1 कुरिन्थियों 13:1–3)। पद 4–7 प्रेम के गुणों और कार्यों की सुन्दरता को प्रकट करते हैं। ये पद प्रेम के सार की परिभाषा से अधिक प्रेम के फलों का वर्णन हैं; वे हमें दिखाते हैं कि प्रेम कैसे कुछ कार्यों या व्यवहारों को प्रेरित करता है और दूसरों के विरुद्ध खड़ा होता है।

यह वर्णन धीरज से आरम्भ होता है और सहनशीलता पर समाप्त होता है (पद 4, 7)। प्रेम अपने सच्चे रंग तब दिखाता है जब वह परीक्षाओं, दुःख और बुराई का सामना करता है। प्रेम का सबसे बड़ा प्रदर्शन ख्रीष्ट का क्रूस पर चढ़ाया जाना है। पौलुस ने रोमियों 5:8 में लिखा — “परन्तु परमेश्वर हम पर अपने प्रेम की भलाई इस रीति से प्रगट करता है, कि जब हम पापी ही थे, तभी ख्रीष्ट हमारे लिए मरा।” वही पौलुस जिसने यह कहा कि वह “यीशु ख्रीष्ट, वरन् क्रूस पर चढ़ाए हुए ख्रीष्ट” के अतिरिक्त और कुछ नहीं जानता (1 कुरिन्थियों 2:2), उसने स्पष्ट रूप से ख्रीष्ट के प्रेम के विषय में बहुत विचार किया था। यूहन्ना उस प्रेम पर ध्यान आकर्षित करता है जो ख्रीष्ट की हमारे लिए मरने की इच्छा के मूल में था, जब वह कहता है — “इससे बड़ा प्रेम किसी का नहीं, कि कोई अपने मित्रों के लिए अपना प्राण दे” (यूहन्ना 15:13)।

प्रेम अपनी श्रेष्ठता को विभिन्न रीतियों में प्रकट करता है। जोनाथन एडवर्ड्स ने लिखा, “प्रेम एक सक्रिय सिद्धान्त है” (वर्क्स 8:301)। सकारात्मक रूप से, प्रेम धीरज का अभ्यास करता है और कृपा दिखाता है (1 कुरिन्थियों 13:4)। प्रेम बस भलाई करता ही रहता है। दूसरों की आवश्यकताओं की सेवा करने और परमेश्वर की महिमा करने के लिए, एक प्रेम करने वाला व्यक्ति अप्रिय बातों या कठिनाइयों के सामने भी डटा रहेगा। प्रेम पीड़ा का बदला कृपा से चुकाने का संकल्प करता है, और बुराई के बदले भलाई लौटाता है। मसीही प्रेम परमेश्वर के स्वरूप को प्रतिबिम्बित करता है, जो “दयालु और अनुग्रहकारी, धीरजवन्त, और अति करुणामय और सच्चा है” (निर्गमन 34:6)।

नकारात्मक रूप से, प्रेम डाह नहीं करता (1 कुरिन्थियों 13:4)। प्रेम स्वार्थी ईर्ष्या को रोकता है, क्योंकि उसने स्वयं को ‘नहीं’ कहना सीख लिया है, और वह दूसरों को फलते-फूलते देखकर आनन्दित होता है। वह अपनी बड़ाई नहीं करता और न ही फूलता है (पद 4)। ये गुण दिखाते हैं कि प्रेम एक नम्र सद्गुण है। प्रेम परमेश्वर और दूसरे लोगों के विषय में हमारी सोच को बढ़ाता है, और हमारी अपने ही विषय में सोच को कम करता है। जोनाथन एडवर्ड्स ने लिखा कि “जो कोई परमेश्वर से प्रेम करता है, वह उससे परमेश्वर के रूप में प्रेम करता है… यदि हम परमेश्वर से इस रूप में प्रेम करते हैं कि वह हमसे अनन्त रूप से बढ़कर है, तो प्रेम हम में अनन्त रूप से छोटों के रूप में काम करता है, और इसलिए वह एक नम्र प्रेम है” (वर्क्स 8:245)।

प्रेम अनुचित व्यवहार नहीं करता (1 कुरिन्थियों 13:5)। “अनुचित व्यवहार करना” के लिए अनुवाद की गई यूनानी क्रिया का अर्थ है मानकों की अवहेलना करते हुए कार्य करना, जिसका परिणाम लज्जा होती है। प्रेम एक व्यक्ति को परमेश्वर और मनुष्यों के सामने जो आदरयोग्य है, वह करने के लिए प्रेरित करता है (रोमियों 12:17ख; 2 कुरिन्थियों 8:21)। यह कथन प्रेम के किसी भी व्यवस्था-विरोधी दृष्टिकोण को अस्वीकार करता है; प्रेम परमेश्वर की व्यवस्था तक फैला हुआ है (भजन संहिता 119:97) और उसे पूरा करने का प्रयास करता है (रोमियों 13:8–10)।

प्रेम अपनी ही उन्नति नहीं ढूँढ़ता (1 कुरिन्थियों 13:5), परन्तु वह हमें परमेश्वर की महिमा और अपने पड़ोसी की भलाई ढूँढ़ने के लिए प्रेरित करता है। प्रेम हमें दासों में बदल देता है (फिलिप्पियों 2)। वह चिड़चिड़ा नहीं है और बुराई का लेखा नहीं रखता (पद 5)। चिड़चिड़ा होने का अर्थ है सरलता से क्रोध में आ जाना (प्रेरितों के काम 17:16), परन्तु प्रेम क्रोध को नियन्त्रित करता है। क्षमा करने का अर्थ है बुराइयों का लेखा न रखना — प्रेम लोगों के पापों को उनके विरुद्ध गिनने में आनन्द नहीं पाता (रोमियों 4; 2 कुरिन्थियों 5:19)।

प्रेम अधर्म से आनन्दित नहीं होता, परन्तु सत्य से आनन्दित होता है (1 कुरिन्थियों 13:6)। जब भी प्रेम धार्मिकता और विश्वासयोग्यता से सामना करता है, वह उल्लसित हो जाता है। तौभी, प्रेम उस समाचार पर शोक करता है कि कोई पाप में गिर गया है और उसने उसका भारी मूल्य चुकाया है; अतः प्रेम ऐसे समाचार को गपशप के लिए स्वादिष्ट टुकड़ा नहीं समझता। ऐसा प्रेम भलाई करता है, यहाँ तक कि शत्रुओं के साथ भी।

पद 6 हमारी संस्कृति में प्रेम के नाम पर चलने वाली सापेक्षवादी सहनशीलता की मूर्ति को डाँटता है; सच्चे प्रेम में बुराई के प्रति घृणा भी सम्मिलित है (रोमियों 12:9)। परमेश्वर के प्रेम का सबसे बड़ा प्रदर्शन उसकी धार्मिकता का भी सबसे बड़ा प्रदर्शन था, क्योंकि उसके पुत्र ने हमारे पापों का दण्ड अपने ऊपर लेकर परमेश्वर के न्याय को सन्तुष्ट किया (रोमियों 3:25–26)। अतः 1 कुरिन्थियों 13:6 इस लोकप्रिय मसीही धारणा को सुधारता है कि प्रेम का भावनाओं से कोई सम्बन्ध नहीं है। प्रेम की पाप के विरुद्ध और धार्मिकता के पक्ष में प्रबल भावनाएँ होती हैं।

प्रेम के अन्तिम चार कार्यों या आदतों में (पद 7), जिस “सब” शब्द को बार-बार दोहराया गया है, उसे एक पूर्ण या बिना शर्त वाला सार्वभौमिक नहीं समझा जाना चाहिए। इन पदों को नए नियम के सन्दर्भ में पढ़ा जाना चाहिए। जब पौलुस “सब” शब्द का प्रयोग करता है, तो उसका अर्थ क्रमशः यह है कि प्रेम वे सब बोझ उठाता है जो हमें क्रूस के रूप में उठाने हैं, उन सब बातों पर विश्वास करता है जिन पर हमें मसीहियों के रूप में विश्वास करना चाहिए, उन सब बातों की आशा रखता है जिनकी हमें परमेश्वर की प्रतिज्ञा के अनुसार बाट जोहनी है, और उन सब परीक्षाओं को सहता है जिनसे हमें ख्रीष्ट के निमित्त गुज़रना है। इस प्रकार, प्रेम इन चार कार्यों को एक संगत रीति से प्रेरित करता है।

प्रेम के पास कठिनाई के बीच में डटे रहने की सामर्थ्य है; हर परिस्थिति में, प्रेम विश्वास और आशा करता ही रहता है। विश्वास, आशा, और प्रेम की तिकड़ी पवित्रशास्त्र में अनेक बार आती है। जब मसीही परमेश्वर से प्रेम करते हैं, तब उनके हृदय उसके लिए उसके विश्वासयोग्य प्रेम में आनन्दित होते हैं, जो उनके विश्वास की पुष्टि करता है और उनकी आशाओं को जीवित रखता है। एडवर्ड्स ने कहा कि प्रेम “एक व्यावहारिक विश्वास का जीवन और प्राण है,” वह जो विश्वास को उसकी जीवन्तता और फलवन्तता देता है (वर्क्स 8:139, 330–31)। प्रेम “विश्वास और आशा में सबसे आवश्यक तत्व है” (8:327)।

यहाँ हम एक पापमय और दुःखमय संसार में प्रेम की निरन्तर क्रिया का पौलुस का वर्णन पाते हैं। प्रेम एक क्रिया है। तौभी, प्रेम बाह्य कार्यों से बढ़कर होना चाहिए; उसका सार हृदय की प्रेरणाओं में निवास करता है। उसे क्या चलाता है? वह स्वार्थी महत्वाकांक्षा नहीं हो सकती, क्योंकि प्रेम घमण्डी नहीं है और अपनी भलाई नहीं ढूँढ़ता। न ही प्रेम उस व्यक्ति में तत्काल मिलने वाले सुख से चल सकता है जिससे प्रेम किया जा रहा है; अन्यथा, प्रेम पतित लोगों के साथ धीरजवन्त और कृपालु नहीं होता।

तो फिर, प्रेम को क्या चलाता है? यह पाठ हमें दो संकेत देता है। उसका आनन्द सत्य में है, अर्थात्, परमेश्वर की धार्मिकता और विश्वासयोग्यता में। अतः, प्रेम परमेश्वर के उस प्रेम में आनन्दित होता है जो ख्रीष्ट में प्रकट हुआ है। “हम इसलिए प्रेम करते हैं, क्योंकि पहले उसने हम से प्रेम किया” (1 यूहन्ना 4:19)। उसका डटे रहना विश्वास और आशा के साथ गुँथा हुआ है, अर्थात्, ख्रीष्ट की ओर देखने और परमेश्वर के वचन पर भरोसा रखने में। एडवर्ड्स ने कहा कि प्रेम “परमेश्वर की श्रेष्ठता के दर्शन या बोध” से उत्पन्न होता है (वर्क्स 8:333)। अतः, हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि प्रेम परमेश्वर से उत्पन्न होता है, परमेश्वर पर केन्द्रित होता है, और परमेश्वर के द्वारा चलाया जाता है। “परमेश्वर प्रेम है” (1 यूहन्ना 4:8ख)। हम परमेश्वर के साथ संगति में तब से अधिक गहरे कभी नहीं होते जब हम सच्चे प्रेम में चलते हैं। तब, प्रेम के गुण और कार्य कितने सुन्दर हैं।

 यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।