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परमेश्वर अपने आप को और अपनी इच्छा को मनुष्यजाति पर केवल आत्म-प्रकटीकरण, अर्थात् प्रकाशन के द्वारा ही प्रकट करता है। प्राणी होने के नाते मनुष्यों के लिए परमेश्वर को जानने हेतु यह आवश्यक है, क्योंकि सृष्टिकर्ता होने के नाते परमेश्वर सृष्टि से परे है और अपनी सृष्टि से अलग है। मनुष्य परमेश्वर को तब तक नहीं जान सकते, जब तक वह स्वयं अपने आप को प्रकट करना न चाहे। वे उसके आत्म-प्रकटीकरण के बिना अपनी बुद्धि, अनुभव, या प्रयास के द्वारा उसका ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकते। इसी कारण, परमेश्वर अनुग्रहपूर्वक अपने आप को प्रकट करते समय प्राणी होने के नाते मनुष्यों की सीमित क्षमता के अनुरूप अपने आप को ढाल लेता है और नीचे उतर आता है। इस प्रकार, परमेश्वर और सृष्टि में उसके प्रयोजनों — दोनों का सम्पूर्ण मानवीय ज्ञान, सृष्टिकर्ता के रूप में अपने आप का और अपनी सृष्टि का जो ज्ञान परमेश्वर के पास है, उसका एक प्राणी के स्तर का प्रतिरूप ही होना है।
हम उन दो रीतियों में भेद कर सकते हैं जिनके द्वारा परमेश्वर अपने आप को और अपनी इच्छा को मनुष्यों पर प्रकट करता है। ये दोनों रीतियाँ एक दूसरे की पूरक हैं और साथ मिलकर काम करती हैं। पहली रीति को सामान्यतः साधारण प्रकाशन कहा जाता है, जिसमें परमेश्वर अपने आप को सृष्टि, ईश्वरीय-प्रावधान, और मानवीय विवेक के अपने कार्यों के द्वारा सब लोगों पर सार्वभौमिक रूप से प्रकट करता है। प्राकृतिक व्यवस्था और ब्रह्माण्ड परमेश्वर की सामर्थ्य, बुद्धि, और ईश्वरीय स्वभाव को प्रकट करते हैं (रोमियों 1:19–20)। इतिहास और मानवीय बातों पर उसका शासन उसके न्याय और भलाई को प्रतिबिम्बित करता है (मत्ती 5:45; प्रेरितों के काम 14:17)। मनुष्य अपने सामान्य व्यवहार में उचित और अनुचित का एक ईश्वर-प्रदत्त नैतिक बोध प्रकट करते हैं, जो परमेश्वर की नैतिक व्यवस्था को प्रतिबिम्बित करता है (रोमियों 2:14–15)। ये सब निरन्तर, स्पष्ट रूप से, सच्चाई से, और अधिकारपूर्वक मनुष्यों पर यह प्रकट करते हैं कि परमेश्वर उनके सृष्टिकर्ता के रूप में कौन है, और उसके स्वरूप में रचे गए प्राणियों के रूप में उसके प्रति उनके क्या दायित्व हैं। ये लगातार और कभी न रुकने वाले साक्षी हैं, जो मनुष्यों को हर समय परमेश्वर के सामने उत्तरदायी बनाते हैं।
यद्यपि यह साधारण प्रकाशन सब मनुष्यों को परमेश्वर के सामने उत्तरदायी बनाने के लिए पर्याप्त है, तौभी यह केवल आधारभूत है और मनुष्यों के उद्धार के लिए पर्याप्त नहीं है। वेस्टमिन्स्टर विश्वास-अंगीकार (1.1) इसे इस प्रकार कहता है:
“यद्यपि प्रकृति का प्रकाश, और सृष्टि तथा ईश्वरीय-प्रावधान के कार्य, परमेश्वर की भलाई, बुद्धि, और सामर्थ्य को इतना प्रकट करते हैं कि मनुष्य निरुत्तर रह जाएँ; तौभी वे परमेश्वर का और उसकी इच्छा का वह ज्ञान देने के लिए पर्याप्त नहीं हैं, जो उद्धार के लिए आवश्यक है।”
यह इसलिए नहीं है कि मनुष्य सीमित हैं और इस प्रकार प्राणी होने के नाते परमेश्वर के सम्पूर्ण आत्म-प्रकटीकरण को ग्रहण करने की अपनी क्षमता में सीमित हैं। परमेश्वर अपने आप को प्रकट करते समय सदा अपने आप को मनुष्यों के लिए पर्याप्त रूप से ढाल लेता है। इसके विपरीत, यह अपर्याप्तता पाप की वास्तविकता और मनुष्यों की बुद्धि तथा इच्छा पर उसके प्रभाव से उत्पन्न होती है। परमेश्वर के स्वरूप में रचे गए मनुष्य का प्रत्येक पक्ष इस प्रकार बनाया गया था कि वह उसके ईश्वरीय अस्तित्व और चरित्र पर निर्भर रहे और उसे प्रतिबिम्बित भी करे। पाप ने मनुष्यों के मन और उनकी प्रेरणाओं को भ्रष्ट कर दिया है, जिसके कारण वे साधारण प्रकाशन के द्वारा प्राप्त परमेश्वर के ज्ञान को दबा देते और बिगाड़ देते हैं। पवित्र आत्मा के कार्य के बिना, लोग उस बात का अवश्य ही गलत अर्थ निकालेंगे, उसे बिगाड़ेंगे, या अस्वीकार करेंगे, जो स्पष्ट रूप से प्रकट की गई है।
विशेष प्रकाशन वह दूसरी रीति है जिसके द्वारा परमेश्वर अपने आप को और अपनी इच्छा को मनुष्यों पर प्रकट करता है, और यह उस बात की व्याख्या भी करता है और उसमें जोड़ता भी है जो वह साधारण प्रकाशन में प्रकट करता है। यह प्रकट करता है कि परमेश्वर छुड़ाने वाले के रूप में कौन है, इतिहास में उसके उद्धार के कार्यों के प्रयोजन क्या हैं, अपने लोगों के साथ उसका वाचा का सम्बन्ध कैसा है, और यीशु ख्रीष्ट के द्वारा उसकी छुटकारे की अन्तिम योजना क्या है। यह विशेष प्रकाशन छुटकारे के सम्पूर्ण इतिहास में विभिन्न साधनों के द्वारा प्रदान किया गया, जिनमें स्वप्न, दर्शन, स्वर्गदूतों का प्रकट होना, ईश्वरीय दर्शन, और भविष्यद्वाणियाँ सम्मिलित हैं। तौभी, यह यीशु ख्रीष्ट के व्यक्तित्व में अपने चरम और पूर्णता तक पहुँचा, जिसके द्वारा परमेश्वर ने निश्चित रूप से बातें की हैं (इब्रानियों 1:1–2), और जो पिता का सिद्ध प्रकाशन है (यूहन्ना 1:18; 14:9)। विशेष प्रकाशन का वह प्रमुख, अन्तिम, और पर्याप्त रूप जो अधिकारपूर्वक और अचूक रूप से इन सब बातों की साक्षी देता है, वह पवित्रशास्त्र है। वेस्टमिन्स्टर विश्वास-अंगीकार (1.1) इस विषय में भी कहता है:
“प्रभु को यह अच्छा लगा कि वह विभिन्न समयों पर, और भिन्न-भिन्न रीतियों से, अपने आप को प्रकट करे, और अपनी उस इच्छा को अपनी कलीसिया पर प्रकट करे; और तत्पश्चात्, सत्य को और अच्छी तरह सुरक्षित रखने और फैलाने के लिए, और शरीर के भ्रष्टाचार, तथा शैतान और संसार के द्वेष के विरुद्ध कलीसिया की अधिक निश्चित स्थापना और शान्ति के लिए, उसी को पूरी तरह से लेखबद्ध कर दे; जो पवित्रशास्त्र को अति आवश्यक बना देता है।”
यह वही विशेष प्रकाशन है जिसे पवित्र आत्मा के द्वारा मनुष्यों के लिए प्रभावशाली बनाया जाता है, ताकि उन्हें परमेश्वर का वह ज्ञान प्राप्त हो जो उद्धार, विश्वास, और भक्तिमय जीवन के लिए आवश्यक है; और यह साधारण प्रकाशन के साथ एक संयुक्त सम्पूर्णता के रूप में मिलकर काम करता है, ताकि मनुष्यों को परमेश्वर का आत्म-प्रकटीकरण प्रदान किया जा सके।
यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

