
मसीही ईश्वरीय प्रकाशन के विषय में क्या विश्वास करते हैं?
7 जुलाई 2026यीशु की मृत्यु कब हुई?
प्रत्येक वर्ष संसार भर के मसीही ईस्टर (पुनरुत्थान दिवस) मनाते हैं, जो यीशु ख्रीष्ट के मृतकों में से जी उठने की स्मृति में मनाया जाता है। नासरत के यीशु की मृत्यु केवल धार्मिक स्मरण का विषय नहीं है, किन्तु एक ऐतिहासिक तथ्य भी है। पहली और दूसरी शताब्दी के कई अ-बाइबलीय साहित्यिक स्रोतों (जैसे टैसिटस, जोसेफस, फिलो और तल्मूड) में भी नासरत के यीशु का उल्लेख मिलता है।
यद्यपि बाइबल आधुनिक काल की अपेक्षा के अनुसार क्रूस पर चढ़ाए जाने की कोई निश्चित तिथि नहीं बताती, फिर भी उसके समय और स्थान के विषय में कोई सन्देह नहीं है। इस ऐतिहासिक घटना की पृष्ठभूमि को समझते हुए, हम उसी प्रकार के ऐतिहासिक तर्क का उपयोग करते हैं जैसा इस प्रश्न का उत्तर देते समय करते हैं, “क्या यीशु तीन दिन कब्र में रहा?” ऐतिहासिक प्रमाणों के आधार पर सामान्यतः यह माना जाता है कि नासरत के यीशु की ऐतिहासिक मृत्यु शुक्रवार, 3 अप्रैल, सन् 33 ईस्वी को दोपहर के नौवें घण्टे (अर्थात् 3 बजे) यरूशलेम नगर के बाहर, गोलगोथा नामक स्थान पर क्रूस पर चढ़ाए जाने से हुई है। यूनानी भाषा में गोलगोथा का अर्थ है “खोपड़ी का स्थान” (Place of a Skull), और यह रोमियों द्वारा अपराधियों को क्रूस पर चढ़ाने का एक सामान्य स्थान था।
यीशु की अत्यन्त सार्वजनिक मृत्यु के महत्व पर ध्यान देना आवश्यक है। सुसमाचारों के वृत्तान्त बताते हैं कि यीशु की हत्या का षड्यन्त्र कैसे रचा गया और किस प्रकार उसे बन्दी बरअब्बा के स्थान पर दे दिया गया, जिसे फसह के पर्व पर क्षमा करके छोड़ दिया गया (देखें: मत्ती 27; मरकुस 14–15; लूका 23; यूहन्ना 11; 19)। यहूदिया के पाँचवें राज्यपाल, पुन्तियुस पीलातुस ने भीड़ के दबाव में आकर या उनके साथ मिलकर यीशु को तत्काल क्रूस पर चढ़ाने का आदेश दिया। क्रूस पर चढ़ाने की यह दण्ड-विधि इस प्रकार बनाई गई थी कि उसमें न तो कोई गोपनीयता रह सके और न ही मृत्यु के विषय में कोई भ्रम रहे। इसमें मृत्यु होने तक अनेक प्रकार की यातनाएँ दी जाती थीं, और खुले स्थान में होने वाले इस दृश्य में भीड़ भी अपमान और उपहास में भाग लेती थी।
इसके अतिरिक्त, यीशु की मृत्यु के उस क्षण का वर्णन किया गया है जहाँ पर सुसमाचार लेखक उन दो अपराधियों की कही हुई बातों का भी वर्णन करते हैं जिन्हें यीशु के साथ क्रूस पर चढ़ाया गया था (देखें, मत्ती 27:38–44; लूका 23:32–43)। यीशु के अन्तिम वचन भी अभिलिखित हैं, जिनमें उसका यह घोषणा करना भी सम्मिलित है, “पूरा हुआ”, जिसे उसने एक ऊँचे स्वर से पुकारते हुए कहा और फिर “उसने अपना प्राण त्याग दिया” (यूहन्ना 19:30; साथ ही देखें, मत्ती 27:50)। मरकुस उस महत्वपूर्ण प्रत्यक्षदर्शी, अर्थात् रोमी सूबेदार, की प्रतिक्रिया का भी वर्णन करता है। जब उसने देखा कि यीशु ने इस प्रकार अपना प्राण त्यागा, तो उसने कहा, “नि:सन्देह यह मनुष्य परमेश्वर का पुत्र था!” (मरकुस 15:39)।
कुछ तर्क यीशु की मृत्यु और पुनरुत्थान के समयक्रम को चुनौती देते हैं। इनमें से एक मूर्छा सिद्धान्त (Swoon Theory) है, जो यह दावा करता है कि यीशु क्रूस पर मरा नहीं था, किन्तु केवल मूर्छित हो गया था। परन्तु यदि इसे सम्भव भी मान लिया जाए, तब भी समय की वास्तविकता यही बताती है कि नासरत का यीशु किसी-न-किसी समय वास्तव में मरा। ऐतिहासिक अभिलेख और सुसमाचारों के वृत्तान्त उसके सार्वजनिक रूप से क्रूस पर हुई मृत्यु के समय और उसके साधन के महत्व को स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करते हैं। यद्यपि यीशु की मृत्यु अत्यन्त पीड़ादायक थी, फिर भी वह न तो आकस्मिक थी और न ही परमेश्वर के सम्प्रभु नियंत्रण के बाहर थी किन्तु “ठीक समय पर ख्रीष्ट भक्तिहीनों के लिए मरा” (रोमियों 5:6)।
इससे हम समझते हैं कि क्रूस पर यीशु की मृत्यु केवल एक शारीरिक घटना नहीं थी, वरन् उसने एक गहरी आत्मिक वास्तविकता को भी प्रकट किया। उसकी मृत्यु अनोखी थी, क्योंकि वह एक बलिदानात्मक और वाचाई मृत्यु थी। यही सुसमाचार है। यीशु केवल एक अच्छा मनुष्य या बुद्धिमान शिक्षक नहीं है; वह अन्तिम आदम है। प्रेरित पौलुस इसका वर्णन करता है, “जैसे एक मनुष्य (आदम) के आज्ञा-उल्लंघन से अनेक पापी ठहराए गए, वैसे ही एक मनुष्य (यीशु) की आज्ञाकारिता से अनेक मनुष्य धर्मी ठहराए जाएँगे।” (रोमियों 5:19)। क्योंकि यीशु पूर्णतः परमेश्वर और पूर्णतः मनुष्य हैं, जैसा कि सूबेदार ने भी पहचाना था। इसलिए अपनी देह में जो बलिदान उसने चढ़ाया, वह उन सभी के लिए अनन्त प्रभाव रखने वाला है जो विश्वास के द्वारा उससे एक हो गए हैं।
नासरत के यीशु की मृत्यु से हमारे मन में अनेक प्रश्न उत्पन्न होने चाहिए: यीशु कौन हैं? संसार आज भी उसकी मृत्यु की चर्चा क्यों करता है? और अन्ततः सभी जीवित प्राणी मृत्यु के अधीन क्यों हैं? बाइबल इन सभी प्रश्नों का उत्तर देती है और हमें अपनी स्वयं की मृत्यु के विषय में भी गम्भीरता से विचार करने के लिए प्रेरित करती है। क्रूस का दृश्य हमें इस सत्य का सामना करने के लिए विवश करता है कि भले ही हम कभी किसी सांसारिक न्यायालय में अपराधी न ठहराए जाएँ, फिर भी हम सब मृत्यु-दण्ड के अधीन हैं। भले ही हम अपनी नश्वरता को नकारने का पूरा प्रयास करें, परन्तु मृत्यु का आकस्मिक संकट हमें यह स्वीकारने पर विवश कर देता है कि जीवन कितना क्षणभंगुर है तथा हम अपने जीवन के अन्त के लिए पूरी तरह तैयार नहीं हैं। हमें अपने विषय में उतने ही सत्यनिष्ठ होना चाहिए जितना हमारा सृष्टिकर्ता परमेश्वर हमारे विषय में है। उसने स्पष्ट कहा है, “क्योंकि पाप की मजदूरी तो मृत्यु है” (रोमियों 6:23)। इसी कारण हम ख्रीष्ट की मृत्यु में आनन्दित होते हैं, क्योंकि “जो पाप से अनजान था, उसी को उसने हमारे लिए पाप ठहराया कि हम उसमें परमेश्वर की धार्मिकता बन जाएँ।” (2 कुरिन्थियों 5:21)।
यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

