
मैं अपने विश्वास में कैसे बढ़ सकता हूँ
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– स्कॉटी एंडरसन
शिष्यता को लेकर पवित्रशास्त्र में जितने भी स्थल हैं, उनमें से महान् आदेश वाला स्थल सबसे अधिक ध्यान देने योग्य है। यह आदेश, या कहें आज्ञा, शिष्यों को दी गई है (मत्ती 28:16) जिससे कि वे औरों को भी शिष्य बनाएँ (मत्ती 28:19-20)। और यीशु इसको कैसे करना है ये भी बताता है। मसीही बपतिस्मा और बाइबलिय शिक्षा। इससे पहले कि माता-पिता अपनी सन्तान को अनुशासित करें, उन्हें शिष्य बनाने के लिए ख्रीष्ट की योजना पर ध्यान देना चाहिए। ख्रीष्ट का अनुशासन हमारे घरों की विशेषता होनी चाहिए। यह निश्चित ही उस अनुशासन को समाहित करता है जिसके विषय में हम प्रायः सोचते हैं (नीतिवचन 13:24; 19:18; 22:15; 23:13-14; 29:15-17), परन्तु यह माता-पिता से और अधिक की माँग भी करता है।
यदि हम नीतिवचन को सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र के परिप्रेक्ष्य में ध्यानपूर्वक न पढ़ें (और प्रायः करते भी हैं), तो हम व्यवहारवादी सोच में पड़ सकते हैं, अर्थात् एक सांसारिक मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण जो मनुष्य के व्यवहार को केवल प्रतिक्रिया-आधारित अभ्यास मानता है। परन्तु ख्रीष्ट हमें सिखाता है कि हम और हमारी सन्तान इससे कहीं बढ़कर हैं। हमारे पास हृदय हैं, हमारे अस्तित्व के आत्मिक चेतना, जिसके द्वारा हमारा व्यवहार प्रवाहित होता है। (नीतिवचन 4:23; मत्ती 12:33-35; 15:10-20; लूका 6:43-45)। बाइबल यह भी सिखाती है कि हमारे हृदय जन्म से ही भ्रष्ट हैं (भजन 51:5; रोमियों 5:12), अतः परिवार के सभी सदस्यों-चाहे माता-पिता हों या बच्चे-अंततः अपनी समस्याओं को भीतर से बाहर की ओर समाधान करने की आवश्यकता होती है।
यही बात माता-पिता का ध्यान महान् आदेश की ओर खींचती है। शिष्यता की मूलभूत आवश्यकता है–पाप से शुद्ध किया हुआ नया हृदय। और यह कार्य केवल ख्रीष्ट ही पूरा कर सकता है। नबी यहेजकेल के माध्यम से बोलते हुए प्रभु कहता है कि, “मैं तुम पर शुद्ध जल छिड़कूँगा,… तुमको नया हृदय दूँगा,… और मैं अपना आत्मा तुम में डालूँगा और तुम्हें अपनी विधियों पर चलाऊँगा और तुम मेरे नियमों का सावधानी से पालन करोगे” (यहेजकेल 36:25–27)। इस महान् आदेश में बपतिस्मा से स्पष्ट सम्बन्ध है। चाहे कोई विश्वासी का बपतिस्मा या शिशु बपतिस्मा का समर्थन करता हो, परन्तु प्रत्येक जन इस बात से सहमत है कि बपतिस्मा कुछ ऐसा है जो आपके लिए किया गया जाता है, न कि कुछ ऐसा जो आप अपने लिए करते हैं। यह आत्मा के कार्य की आवश्यकता की ओर संकेत करने वाला एक बाहरी चिन्ह है। मसीही माता-पिता को यह जानना चाहिए कि हृदय परिवर्तन के बिना कोई सच्ची शिष्यता नहीं आ सकती है। हमारे बच्चों के लिए शिष्यता का आरम्भिक स्थान बपतिस्मा से अलग नहीं किया जा सकता है।
इस आशा के साथ कि प्रभु उनके बच्चों के हृदय में परिवर्तन लाएगा, माता-पिता तब उन्हें “जो जो आज्ञा मैंने तुम्हें दी हैं उनका पालन करना सिखाओगे” के कार्य में आगे बढ़ सकते हैं (मत्ती 28:20)। पुनः, यह छोटे बच्चों में मात्र व्यवहारिक अनुरूपता नहीं है। माता-पिता अपने बच्चों को अनादर, अन्यायपूर्ण हिंसा, यौन अनैतिकता, चोरी, झूठ और असन्तोष के लिए उचित परिणामों को बताते हुए उचित ढ़ंग से अनुशासित करते हैं; और इसमें छड़ी और डाँट भी सम्मिलित हैं (नीतिवचन 29:15)। परन्तु व्यवस्था में परमेश्वर-केन्द्रित पहली तालिका भी है (पहली चार आज्ञाएँ, निर्गमन 20:2-11)।
माता-पिता को “जो कुछ मैंने तुम्हें आज्ञा दी है” उसका पालन करना चाहिए। इसमें अटूट विश्वासयोग्यता के लिए ख्रीष्ट की बुलाहट (यूहन्ना 14:6; लूका 10:27) के साथ-साथ स्वयं को नकारना और दूसरों के प्रति प्रेम के साथ (मत्ती 16:24; 22:39), धन्य वचन (मत्ती 5:3-12), सांसारिक सुख-समृद्धि की अपेक्षा आत्मिक समृद्धि को प्राथमिकता देना (1 तीमुथियुस 6:17-18), और कलीसिया के लिए समर्पित होना (1 पतरस 4:8; 1 यूहन्ना 4:7; 2 तीमुथियुस 2:22) सम्मिलित है। इन क्षेत्रों में शिष्यता केवल छड़ी और डाँट-फटकार से नहीं होता है, परन्तु संयम को बढ़ावा देना, ज्ञान को विकसित करना, सेवा के अवसरों की खोज करना, जोखिम लेने को प्रोत्साहित करना, निराशा में सांत्वना देना, पथभ्रष्ट होने पर पुनः दिशा दिखाना और शान्ति देना है। बारह प्रेरितों के प्रशिक्षण में, यीशु ने इनमें से प्रत्येक को अपने प्रशिक्षण कार्यक्रम के एक आयाम के रूप में सम्मिलित किया था। यह सब के लिए एक जैसा नहीं था। इसमें उन लोगों की क्षमताओं, पापपूर्ण स्वभाव, समर्पण और परिवर्तन के विषय में परिस्थितियों को ध्यान में रखा गया था, जिन्हें वह उस मार्ग पर चलने के लिए प्रशिक्षित कर रहा था जिस पर उन्हें चलना था।
माता-पिता से इतनी अपेक्षा करना बहुत बड़ी बात है। वास्तव में यह उससे कहीं अधिक है जो वे अपने क्षमता में करने में सक्षम हैं। परन्तु परमेश्वर ने अपनी कलीसिया में उनकी कमी को अनुग्रहपूर्वक पूरा किया। समग्र पारिवारिक शिष्यता का अर्थ है कलीसिया-केंद्रित जीवन होना, जहाँ अनुग्रह के सामान्य साधनों को प्राथमिकता देती है। जैसे कि वचन का प्रचार, प्रार्थना और कलीसियाई-विधियाँ (साथ ही कलीसियाई अनुशासन)। एक पिता जो अपने परिवार के कारण कलीसिया को प्राथमिकता नहीं देता है, वह अपनी देखभाल में रहने वालों को जीवनदायी वचन और पवित्रीकरण के लिए एक धन्य स्थान से वंचित कर रहा है। वह नए नियम में कलीसियाओं को लिखी पत्रियों की सब “एक दूसरे” आज्ञाओं का उपहास करता है। चाहे वह ऐसा इसलिए करता है क्योंकि वह बहुत आलसी है या बहुत “बुद्धिमान” है, उसे पता होना चाहिए कि उसे परमेश्वर के लोगों से अलग होकर अपने या अपने परिवार के लिए आशीष की आशा करने का कोई अधिकार नहीं है। वह अपने ऐसे चुनाव के कारण, वह ख्रीष्ट के सच्चे शिष्य से कमतर कुछ तैयार कर रहा है, उस ख्रीष्ट से जिसने कलीसिया से प्रेम किया और उसके लिए अपने आप को दे दिया (इफिसियों 5:2, 25)।
यह बात सच है कि कोई भी कलीसिया सिद्ध नहीं है, परन्तु कुछ कलीसियाएँ दूसरों से उत्तम हैं (प्रकाशितवाक्य. 2-3)। प्रभु के दिन सामूहिक आराधना के साथ उचित रूप से चुनी गई स्थानीय कलीसिया बपतिस्मा और वचन का प्रचार, और साथ ही परमेश्वर और पड़ोसी की सेवा करने, स्वयं मरने के लिए, और प्राथमिकताओं को पुनः निर्देशित करने के कई अवसर प्रदान करती है। “मसीही शिक्षा के माध्यम से पूरा परिवार उन अतिरिक्त आवाज़ों के बीच यह सत्य सुनेगा, जो कहेगी…“मार्ग यही है, इसी पर चलो” (यशायाह 30:21)। रविवार की संगति इस संसार में ख्रीष्ट के साथ चलने का प्रयास करने वालों को यह बताती है कि वे अकेले नहीं है, तथा शिष्यता कुछ असामान्य नहीं, वरन् सामान्य जीवन का भाग है। शिष्यता एक सामूहिक आज्ञा के रूप में आया, और यह सामूहिक सन्दर्भ में ही भली प्रकार से पूरा होता है। कलीसिया में जीवन का आत्मिक अनुशासन पारिवारिक शिष्यता का मात्र एक भाग नहीं है, वरन् यह सबसे अधिक आवश्यक है।
यह लेख मसीही शिष्यता की मूल बात संग्रह का हिस्सा है।
यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।