The Transforming Power of God’s Holiness in Everyday Life

दैनिक जीवन में परमेश्वर की पवित्रता की रूपान्तरणकारी सामर्थ्य

29 सितम्बर 2026
The Transforming Power of God’s Holiness in Everyday Life

दैनिक जीवन में परमेश्वर की पवित्रता की रूपान्तरणकारी सामर्थ्य

29 सितम्बर 2026

यीशु ही नया मन्दिर है

Jesus Is the New Temple

जब आप बाइबल में मन्दिर के विषय में सोचते हैं, तो आपके मन में कैसी छवि उभरती है? सम्भव है कि आप मरुस्थल में बने उस भव्य तम्बू की कल्पना करें, जो सुन्दर कढ़ाईदार पर्दों से सुसज्जित था और जिसके सुनहरे खम्भे एक पवित्रस्थान को घेरे हुए थे। या सम्भव है कि आप आप एक विशाल भवन की कल्पना करें जिसके परमपवित्र स्थान के प्रवेश-द्वार पर करूब पहरा दे रहे थे और जिसकी स्वर्णमढ़ित दीवारों पर अनारों की नक्काशी की गई थी। सम्भव है कि आप उन भव्य तराशे हुए पत्थरों की भी कल्पना करें जिन्हें बड़ी कुशलता से एक के ऊपर एक स्थापित किया गया था और जो यरूशलेम के ऊपर ऊँचे उठकर प्राचीन संसार के एक हेरोदीय आश्चर्य के रूप में दिखाई देते थे। ये सभी चित्र बाइबल में विभिन्न समयों पर प्रकट हुए मन्दिर के विभिन्न स्वरूपों का सही चित्रण करते हैं। किन्तु जो बात आपको आश्चर्यचकित कर सकती है, वह यह है कि पवित्रशास्त्र हमें सिखाता है कि जब हम मन्दिर के विषय में सोचें, तब हमें यीशु के विषय में सोचना चाहिए। मन्दिर के वे सभी स्वरूप केवल छाया हैं, जो उसी की ओर संकेत करते हैं।

पवित्रशास्त्र में दिखाई देने वाला सबसे पहला मन्दिर अदन की वाटिका है। जिस प्रकार बाद में मिलापवाला तम्बू और मन्दिर बनाए गए, उसी प्रकार परमेश्वर ने अदन को भी अपने पवित्र निवास-स्थान के रूप में रचा था—वह स्थान जहाँ वह अपनी प्रजा के साथ निवास करेगा। मनुष्य के पतन से पहले, अदन का उद्देश्य यही पवित्रस्थान होना था। परमेश्वर अदन में वैसे ही चलता था जैसे बाद में तम्बू में चला (उत्प. 3:8; लैव्य. 26:12; व्यव. 23:14; साथ ही 2 शमू. 7:6–7)। अदन और मिलापवाले तम्बू दोनों में प्रवेश पूर्व दिशा से होता था (उत्प. 3:24; निर्ग. 26:18–22)। अदन और सुलैमान के मन्दिर दोनों की रक्षा करूब करते थे (उत्प. 3:24; निर्ग. 26:31; 1 राजा 6:23–29), और दोनों वृक्षों से परिपूर्ण थे (उत्प. 2:16; 1 राजा 6:20–36)। आदम और याजकों दोनों को अपने-अपने पवित्रस्थान की “सेवा करने और उसकी रक्षा करने” का दायित्व सौंपा गया था (उत्प. 2:15; गिन. 3:8; 8:26; 18:5–6)। अदन एक मन्दिर था। 

क्योंकि आदम पाप में गिर गया था,  इसलिए उसे उस पवित्रस्थान से बाहर निकाल दिया गया। जब परमेश्वर ने अपनी प्रजा को मिस्र की दासता से छुड़ाया, तब उसने अनुग्रहपूर्वक फिर से एक पवित्रस्थान स्थापित किया, जहाँ पापी बार-बार बलिदान अर्पित करके पश्चाताप और आराधना के साथ उसके निकट आ सकते थे (इब्रा. 10:1)। परमेश्वर ने इस “मिलापवाले तम्बू” अर्थात् तम्बू को इसलिए स्थापित किया कि वह अपनी प्रजा के साथ निवास करे (निर्ग. 29:45–46)। किन्तु जब तम्बू का निर्माण पूरा हुआ, तब इस्राएलियों ने देखा कि परमेश्वर की उपस्थिति  का पवित्र बादल उन सभी से पवित्रता की माँग करता था जो उसके निकट आते।  इसलिए कोई भी उसके भीतर प्रवेश न कर सका, यहाँ तक कि मूसा भी नहीं (निर्ग. 40:35)। बाद में राजा सुलैमान ने उसी तम्बू का एक और भी अधिक भव्य रूप, अर्थात् मन्दिर, बनवाया। तब वही बादल इस मन्दिर पर भी छा गया और इससे यह प्रकट हुआ कि याजक भी उस पवित्र परमेश्वर की उपस्थिति में प्रवेश नहीं कर सकते थे (1 राजा 8:10–11)।

जब नबूकदनेस्सर ने सुलैमान के मन्दिर को नष्ट कर दिया और इस्राएल को बन्धुआई में ले गया, तब बाद में फारस के राजा कुस्रू (साइरस महान) ने इस्राएलियों को अपने देश लौटकर एक नया मन्दिर बनाने की अनुमति दी (एज्रा 1; 2 इतिहास 36:22–23)। किन्तु जब उन वृद्ध लोगों ने जिन्होंने पहले सुलैमान के मन्दिर को देखा था, इस नए मन्दिर का निर्माण देखा, तो वे दुःख से फूट-फूटकर रोने लगे, क्योंकि वे जानते थे कि यह दूसरा मन्दिर उन बातों को कभी पूरा नहीं कर सकेगा, जिनकी भविष्यद्वक्ताओं ने भविष्यवाणी की थी (एज्रा 3:12)। पुराने नियम के भविष्यद्वक्ताओं ने भविष्यवाणी की थी कि अनेक जातियाँ यहूदी और अन्यजातियाँ यरूशलेम आएँगी और मन्दिर में परमेश्वर की आराधना करेंगी (यशा. 2:1–5)। किन्तु वे यह भी समझते थे कि यह मन्दिर सुलैमान के मन्दिर से कहीं अधिक महान् होगा। यह नया मन्दिर आकाश और पृथ्वी को हिला देगा तथा सभी लोगों के लिए महिमा और उद्धार का स्रोत बनेगा (हाग्गै 2:5–9)। यही वह समय होगा, जिसके विषय में परमेश्वर कहता है, “मैं तुम्हारे साथ रहूँगा” (हाग्गै 2:4)।

पुराने नियम के सन्त जिस मन्दिर की बड़ी लालसा से प्रतीक्षा कर रहे थे, वह परमेश्वर के देहधारी में आ पहुँचा। वह नासरत का यीशु ही वह है, जो हमारे बीच में निवास किया (यूह. 1:14)। वही परमेश्वर की सच्ची उपस्थिति है, क्योंकि उसी में ईश्वरत्व की सारी परिपूर्णता देहधारी होकर वास करती है (कुलु. 2:9–10)। यीशु ने स्वयं भी इसी सत्य को तब प्रकट किया, जब उसने यहूदियों से कहा, “इस मन्दिर को ढा दो और मैं इसे तीन दिन में फिर खड़ा कर दूँगा” (यूह. 2:19)। यद्यपि यहूदियों ने उसके शब्दों को शाब्दिक रूप से समझा, यीशु अपने विषय में आत्मिक रीति से बात कर रहा था, अर्थात् परमेश्वर के सच्चे मन्दिर के विषय में बात कर रहा था (यूह. 2:20–21)। निस्सन्देह, महायाजक के रूप में उसने अपने सिद्ध जीवन और बलिदानी मृत्यु के द्वारा स्वयं को अर्पित किया, जिससे कि पापी उसके बलिदान के द्वारा पवित्र परमेश्वर की उपस्थिति तक पहुँच प्राप्त कर सकें (इब्रा. 9:11–14; 10:19–20)। यीशु एक ही समय में याजक, बलिदान और मन्दिर है। 

परन्तु नया नियम मन्दिर के विषय में एक और सत्य भी प्रकट करता है। 1 कुरिन्थियों 3:16–17 में पौलुस लिखता है:

“क्या तुम नहीं जानते कि तुम परमेश्वर का मन्दिर हो और परमेश्वर का आत्मा तुम में वास करता है? यदि कोई परमेश्वर के मन्दिर को नष्ट करे तो परमेश्वर उसे नष्ट करेगा; क्योंकि परमेश्वर का मन्दिर पवित्र है, और वह मन्दिर तुम हो।”

जब पौलुस लिखता है, “तुम परमेश्वर का मन्दिर हो,” तो यहाँ “तुम” शब्द एकवचन नहीं, वरन् बहुवचन में प्रयोग हुआ है। इसका अर्थ है कि पौलुस परमेश्वर की प्रजा को सामूहिक रूप से, अर्थात् कलीसिया के रूप में सम्बोधित कर रहा है।  दूसरे शब्दों में, यीशु ख्रीष्ट की कलीसिया भी परमेश्वर का मन्दिर है। आखिरकार, विश्वासी ख्रीष्ट के स्वरूप के सदृश बनाए जा रहे हैं (रोम. 8:29), क्योंकि उसका आत्मा हम में वास करता है। परमेश्वर की उपस्थिति और उसकी सामर्थ्य उसकी कलीसिया में हैं। वह अपने पवित्र आत्मा के द्वारा अपनी कलीसिया का अभिषेक करता है, जिससे कि वह सुसमाचार के द्वारा सभी जातियों को आशीष देने का कार्य पूरा करे (मत्ती 28:18–20; 2 कुरि. 4:1–6)। हम, जो ख्रीष्ट की देह हैं, उसी में परमेश्वर का मन्दिर हैं, क्योंकि वह हमें अपने सदृश बनाता है। इसलिए, जब हम इस संसार में ख्रीष्ट का प्रतिनिधित्व करते हैं, तब कलीसिया परमेश्वर की पवित्रता की दृश्यमान अभिव्यक्ति बन जाती है। ख्रीष्ट में, हम पर्वत पर बसा हुआ एक नगर हैं (मत्ती 5:14) और जातियों के लिए ज्योति हैं (यशा. 49:6; प्रेरितों के काम 13:47), जिससे कि संसार हमारे द्वारा उस सच्चे मन्दिर को देख सके।

यद्यपि पवित्रशास्त्र अलंकृत पर्दों, स्वर्णमढ़ित दीवारों और अद्भुत निर्माण वाले मन्दिरों का वर्णन करता है, तौभी ये सब उन उत्तम बातों की ओर संकेत करने वाली छायाएँ थीं जो अब आ चुकी हैं (इब्रा. 9–10)। अब हम किसी दूसरे मन्दिर की खोज नहीं कर रहे हैं। वह हमारे पास है

 यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

लेवी बर्नटसन

लेवी बर्नटसन

डॉ. लेवी बर्नटसन सैनफोर्ड, फ्लोरिडा में रिफॉर्मेशन बाइबल कॉलेज में थियोलॉजी के एसोसिएट प्रोफेसर और प्रेस्बिटेरियन चर्च इन अमेरिका में टीचिंग एल्डर हैं।