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जब आपकी मृत्यु होती है, तो आपकी आत्मा के साथ क्या होता है? 

22 अक्टूबर 2026
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29 अक्टूबर 2026
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पवित्र आत्मा का अग्रसर होना क्या है? 

What Is the Procession of the Holy Spirit?

हम पवित्र आत्मा पर विश्वास करते हैं, जो प्रभु और जीवन को देनेवाला  है; जो पिता और पुत्र से अग्रसर है; जिसकी आराधना एवं महिमा पिता और पुत्र के साथ की जाती है, जिसने भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा बातें की। (नीकिया का विश्वास-वचन)

नीकिया का विश्वास-वचन (Nicene Creed)

यह विश्वास वचन 381 ई. में कॉन्स्टेंटिनोपल (Constantinople) की महासभा से उत्पन्न हुआ, जिसने त्रिएकता के धर्मसिद्धान्त को लेकर उत्पन्न एक बड़े संकट का समाधान किया। इस महासभा की विशिष्ट विशेषताओं में पवित्र आत्मा के विषय में दिया गया कथन भी सम्मिलित था, जिसमें यह उल्लेख भी था कि पवित्र आत्मा पिता से अग्रसर होता है।

इसमें कहा गया  है कि पवित्र आत्मा “प्रभु और जीवन को देनेवाला” है, इसलिए वह पिता और पुत्र के साथ सृष्टि के कार्य में सहभागी होता है। उसने भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा बातें की, इसलिए वह पवित्रशास्त्र का प्रथामिक लेखक है। जिस प्रकार से वह पूर्ण रूप से परमेश्वर है, उसकी आराधना और महिमा भी पिता और पुत्र के साथ समान रूप से की जानी चाहिए। संक्षेप में, एक ही अविभाज्य (Indivisible) परमेश्वर है, जो तीन सत्ताओं या व्यक्तियों में विद्यमान (अस्तित्व में) है; जो एक-दूसरे से भिन्न हैं, परन्तु अलग-अलग नहीं हैं।

इस विश्वास-अंगीकार में यह कथन भी सम्मिलित है कि  पवित्र आत्मा “पिता और पुत्र से अग्रसर” होता है। यह अविभाज्य त्रिएकता में व्यक्तियों के पारस्परिक सम्बन्धों को व्यक्त करता है। पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के निर्वाह का मूल स्रोत है, जबकि तीनों समान रूप से और पूर्णतः एक ही अविभाज्य परमेश्वर हैं।

यह कितना महत्वपूर्ण है? अगले ही वर्ष, इस विषय में रोम की महासभा (Synod of Rome) ने अपने आधिकारिक पत्र में इस विषय पर निर्णय दिया, जिससे कोई सन्देह शेष न रहा। आत्मा, पिता और पुत्र के साथ, “एक ही प्राणी है, जो अजन्मा है और उसी एक प्राणी तथा अनन्त त्रिएकता का सहभागी” है। महासभा द्वारा घोषित शाप-कथन इस बात को और दृढ़ करते हैं। ये निर्णय उन लोगों के विरुद्ध घोषित किए गए जो अन्य बातों के साथ-साथ इस बात को अस्वीकार करते हैं कि आत्मा पिता से है। ऐसा मत  विधर्मिता है और सुसमाचार से विचलन होगा। इसी प्रकार का शाप-कथन उन लोगों के विरुद्ध भी घोषित किया गया जो पवित्र आत्मा के सर्वज्ञानी और सर्वउपस्थिति होने के गुणों को नकारते हैं, यह कहते हैं कि आत्मा सृजा गया था, या इस बात को नकारते हैं कि सब वस्तुओं की सृष्टि पवित्र आत्मा और पुत्र के द्वारा हुई। संक्षेप में, उस महासभा ने—और उसके बाद से कलीसिया ने— पवित्र आत्मा के ईश्वरत्व और पिता से उसके निकलने को सुसमाचार का मुख्य भाग और परमेश्वर को जानने के लिए आवश्यक मन है।

क्या पवित्र आत्मा का पिता से अग्रसर होना/या निकालना बाइबलीय  है?

यदि आप इसके समर्थन में बाइबल से कोई प्रमाण चाहते हैं तो यूहन्ना 15:26 में यीशु कहते हैं कि आत्मा “जिसे मैं तुम्हारे पास पिता की ओर से भेजूँगा… जो पिता से निकलता है।” यह वचन दर्शाता है कि त्रिएकता में पिता और पवित्र आत्मा का सम्बन्ध अनन्तकाल से है। इसी के आधार पर मानव इतिहास में, पिन्तेकुस्त के दिन पिता और पुत्र दोनों ने पवित्र आत्मा को भेजा है (यूहन्ना 14:16, 21, 23, 26; 15:26; 16:7; प्रेरितों के काम 2:29–33)। फिर से, यह त्रिएकता के व्यक्तियों के सम्बन्ध को दर्शाता है; यह विचार त्रिएकता को विभाजित नहीं करता है और न ही कर सकता है। 

पवित्र आत्मा का निकालना यह दर्शाता है कि वह पिता के समान ही स्वभाव का है। यह एक गतिशील सम्बन्ध की ओर संकेत करता है; यह निकालना दर्शाता है कि पवित्र आत्मा जीवन का आत्मा है (यूहन्ना 6:63; रोमियों 8:2, 9–11), ठीक वैसे ही जैसे पुत्र स्वयं जीवन है (यूहन्ना 1:4; 11:25–26; 20:31) । परमेश्वर स्वयं जीवन की परिपूर्णता है।

फिर भी, यह धर्मसिद्धान्त अवर्णनीय भी है (अर्थात् ऐसा भी है जिसे पूर्णतः शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता)। प्रारम्भिक कलीसिया के पिताओं ने बार-बार कहा कि मनुष्य के लिए पिता से निकलने की पूर्ण व्याख्या करना सम्भव नहीं है। वास्तव में, इसे सम्पूर्ण रीति से समझने के लिए स्वयं परमेश्वर होना आवश्यक होगा। इसलिए यह एक ऐसा सत्य है जिसे स्वीकार और अंगीकार किया जाना चाहिए, क्योंकि यह हमें इस अपरिहार्य तथ्य से अवगत कराता है कि हम सृजे गए प्राणी हैं, न कि सृष्टिकर्ता। जैसा कि कैल्विन ने इसी प्रकार के सन्दर्भ में लिखा, यह ऐसा भेद है जिसकी जाँच-पड़ताल करने के बजाय आराधना की जानी चाहिए। 

फिलिओक्वे (Filioque) विवाद

यदि बात यहीं तक सीमित रहती, तो सब कुछ सरल होता। परन्तु इसके कुछ ही समय बाद समस्याएँ और मतभेद उत्पन्न हो गए। नीकिया विश्वास-वचन में केवल इतना लिखा था कि पवित्र आत्मा पिता से अग्रसर है, लातिनी कलीसिया ने इसमें एक और शब्द जोड़ दिया ‘फिलिओक्वे’ (Filioque) जिसका अर्थ है “और पुत्र से”। इस प्रकार से, यह वाक्य बन गया कि पवित्र आत्मा “पिता और पुत्र से अग्रसर है।” नीकिया का विश्वास-वचन ने इसका खण्डन नहीं किया था, परन्तु उसमें पुत्र का स्पष्ट उल्लेख भी नहीं था। 

यूनानी (Greek) कलीसिया विश्वास करती थी कि परमेश्वर पिता ही पुत्र और पवित्र आत्मा के व्यक्तिगत अस्तित्व का मूल स्रोत है। इसलिए उनके अनुसार ‘फिलिओक्वे’ (Filioque) जोड़ना पिता की विशिष्ट भूमिका को कमज़ोर करने जैसा था। इसके विपरीत, लैटिन कलीसिया (जिससे आगे चलकर अधिकाँश प्रोटेस्टेंट परम्परा निकली) का विचार था कि पुत्र पिता के साथ पूर्ण एकता में है, और पिता ने सब कुछ पुत्र को सौंपा है, जिसमें पवित्र आत्मा को पिता के साथ भेजना भी सम्मिलित है। उउनकी दृष्टि में, यूनानी कलीसिया त्रिएकत्व में पुत्र के स्थान को उचित महत्त्व नहीं दे रही थी और न ही आत्मा तथा पुत्र के बीच के सम्बन्धों का उचित विवरण प्रस्तुत कर रही थी। यूनानी कलीसिया इस बात को स्वीकार करने के लिए तैयार थी कि पवित्र आत्मा “पिता से पुत्र के द्वारा” अग्रसर होता है, क्योंकि उनके लिए यीशु के बपतिस्मा का वर्णन अत्यन्त महत्वपूर्ण था। परन्तु वे फिलिओक्वे (Filioque) शब्द स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे। अन्ततः 1054 ईस्वी में, दोनों कलीसियाओं के मध्य इतना गहरा विवाद हो गया कि पूर्वी (Greek) और पश्चिमी (Latin) कलीसियाओं के मध्य आधिकारिक विभाजन हो गया।

क्या यह विवाद अनावश्यक था? मूलतः, यह दोनों पक्षों के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण था, क्योंकि इसका सम्बन्ध इस बात की हमारी समझ से है कि परमेश्वर वास्तव में कौन है। सही धर्मसिद्धान्त महत्त्व रखते हैं, और उनसे विचलन के प्रायः दुर्भाग्यपूर्ण परिणाम होते हैं। फिर भी, हाल के कुछ वर्षों में दोनों पक्षों के मध्य सहमति स्थापित करने के अनेक प्रयास हुए हैं। यद्यपि इनमें से कुछ प्रयास आलोचना के योग्य हैं, फिर भी अब यह समझ बढ़ी है कि यह विवाद केवल मूल विषय-वस्तु के अन्तर का ही नहीं, वरन् दृष्टिकोण के अन्तर का भी विषय है।

क्या इसका अर्थ है कि जब हम नीकिया का विश्वास-वचन पढ़े तब फिलिओक्वे शब्द को छोड़ दें? मेरा उत्तर है- नहीं, क्योंकि ख्रीष्ट सुसमाचार का केन्द्र है, और पवित्र आत्मा की सम्पूर्ण सेवकाई ख्रीष्ट पर केन्द्रित है, जिससे पिता की महिमा हो। 

निष्कर्ष

आज बहुत-से विश्वासियों या पढ़ने वालों के लिए नीकिया का विश्वास-वचन अपरिचित हो सकता है। और यह बदलना चाहिए। यह हमारे विश्वास का आधारभूत मूल है, क्योंकि इसमें उस विश्वास का सार प्रस्तुत किया गया है जिसे मसीही सदैव मानते आए हैं। नीकिया का विश्वास-वचन को त्यागने का अर्थ है कि सम्पूर्ण मसीही कलीसिया के द्वारा पवित्रशास्त्र की व्याख्या का परिपक्व और सघन सार को त्यागना है। इंग्लैंड की कलीसिया के धर्मसिद्धान्तों के उनतालीस अनुच्छेद का अनुच्छेद 8 कहता है: “नीकिया के विश्वास-वचन को पूरी निष्ठा के साथ पूर्णतः स्वीकार और विश्वास किया जाना चाहिए, क्योंकि इसे पवित्रशास्त्र के अत्यन्त निश्चित प्रमाणों द्वारा सिद्ध किया जा सकता है।”

 यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

रॉबर्ट लीथम

रॉबर्ट लीथम

डॉ. रॉबर्ट लीथम वेल्स में यूनियन स्कूल ऑफ थियोलॉजी में विधिवत और ऐतिहासिक ईश्वरविज्ञान के प्रोफेसर हैं। वे अनेक पुस्तकों के लेखक हैं, जिनमें द होली ट्रिनिटी और यूनियन वित क्राइस्ट सम्मिलित हैं।