
नीतिवचन
10 फ़रवरी 2026हिप्पो नगर का ऑगस्टीन (ऑगस्टीन ऑफ हिप्पो)
ऑगस्टीन का जन्म रोमी साम्राज्य के मसीही युग के चरम पर हुआ। उन्होंने अपने जीवन में रोम के पतन को देखा और उनकी मृत्यु उस समय हुई जब वैंडल लोग हिप्पो नगर के द्वार तक पहुँच चुके थे। उनका जीवन प्रारम्भिक कलीसिया की दो प्रमुख महासभाओं, सन् 325 में नाइसिया की सभा और सन् 451 में काल्सीडोन की सभा के बीच के समयकाल में रहा। यीशु और उसके चेलों के अलावा,वे निर्विवाद रूप से कलीसिया के पहले हजार वर्षों में, और सम्भवतः सम्पूर्ण इतिहास में भी, सबसे प्रभावशाली व्यक्ति माने जाते हैं। उनका प्रभाव प्रत्येक प्रमुख मसीही सिद्धान्त के विकास पर पड़ा है, जिनमें त्रिएकता का सिद्धान्त, अनुग्रह के सिद्धान्त, पवित्रशास्त्र का सिद्धान्त तथा युगान्तविज्ञान (अन्तिम बातों का सिद्धान्त) सम्मिलित हैं। यद्यपि यह बात सत्य है कि वह सर्वदा सब बातों में सिद्ध नहीं थे, कभी कभी उनके प्लेटोवादी दर्शन का अनुचित प्रभाव पड़ा, फिर भी वह स्पष्ट रूप से एक मुख्य व्यक्ति थे। ऑगस्टीन को परमेश्वर के सम्मुख यह स्वीकार करने में कई दशक लग गए कि “आप प्रत्येक बातों का उपयोग करते हैं, भले ही हम उसे समझे या न समझें, एक ऐसे उद्देश्य के लिए जो केवल आप जानते हैं।” इस कथन के सन्दर्भ में, “प्रत्येक बातों” से उसका अर्थ उसके जीवन की प्रत्येक घटना, प्रत्येक उतार-चढ़ाव, प्रत्येक एक कदम आगे और दो कदम पीछे, प्रत्येक हार, प्रत्येक जीत, प्रत्येक निराशा और प्रत्येक उत्सव से है।
भटकने वाला
13 नवम्बर, 354 ईस्वी को ऑगस्टीन का जन्म उत्तरी अफ्रीका के नुमिडिया क्षेत्र में स्थित थागास्ते नामक नगर में हुआ। यह क्षेत्र विशाल रोमी साम्राज्य का भाग था। नुमिडिया शब्द का सम्बन्ध नोमैड (घुमन्तू) शब्द से है। इस क्षेत्र के निवासी बर्बर घुमन्तू थे, जिन्हें ईसा पूर्व तीसरी और दूसरी शताब्दी में हुए प्युनीक युद्धों (Punic Wars) के समय रोम के अधीन लाया गया था।
ऑगस्टीन के पिता, पैट्रीशियस, एक मूर्तिपूजक (अन्यजाति) थे, जबकि उनकी माता, मोनिका, एक अत्यन्त ईश्वरभक्त, और कई बार रहस्यमय अनुभवों वाली मसीही थीं। आगे चलकर मोनिका ने कलीसिया के इतिहास में अपना विशेष स्थान बनाया और वह सबसे प्रसिद्ध मसीही माताओं में से एक के रूप में जानी गईं। ऑगस्टीन का कम से कम एक भाई था, जिसके विषय में बहुत कम जानकारी है। इसके अतिरिक्त उनकी कम से कम एक बहन भी थीं, जिनका नाम हमें ज्ञात नहीं है।
थागास्ते एक उपजाऊ मैदान पर स्थित था, जो सम्पूर्ण अफ्रीका के सबसे उपजाऊ क्षेत्रों में एक मान जाता था। आसपास के पर्वतीय क्षेत्रों में सिंह और बाघ घूमते थे। नगर सेवानिवृत्त रोमी सैनिकों से भरा हुआ था। यद्यपि, कृषि कार्य और सैनिक जीवन में ऑगस्टीन की कोई रुचि नहीं थी। उनकी दृष्टि शिक्षा की ओर लगी हुई थी। दस वर्ष की आयु में ही वह लगभग पन्द्रह मील दूर स्थित विश्वविद्यालय नगर माडौरा भेज दिया गया। वहाँ जाकर उन्होंने न केवल अध्ययन किया, वरन् अपने साथियों पर प्रभाव भी डाला। वे स्वयं बताते हैँ कि उन्होंने “साहित्य और सार्वजनिक भाषण की कला” का अध्ययन किया।
370 ईस्वी में ऑगस्टीन थागस्ते लौट आए, और इसके पश्चात् वह घटना घटित हुई जिसका वर्णन उन्होंने अपनी पुस्तक कन्फेशन्स (Confessions) के दूसरे भाग में किया है। यह अध्याय पाप का गहन विश्लेषण करता है और बताता है कि पाप वास्तव में “छायाओं के पिछे दौड़ना” है। शरीर की वासनाएँ और इच्छाएँ हमें “पाप के भँवर में डुबो देती हैं।” इसे समझाने के लिए, ऑगस्टीन अपने एक बड़े पाप को अर्थात् नाशपाती चुराने के पाप को स्वीकार करते हैं। एक दिन वे अपने मित्रों के साथ अपने पड़ोसी की भूमि से होकर जा रहे थे और उसी समय उन्होंने नाशपातियाँ चुरा लीं। ऑगस्टीन स्वीकार करते हैं कि उसे उन नाशपातियों को खाने का आनन्द लेने की कोई इच्छा नहीं थी किन्तु उसे तो केवल चोरी करने का आनन्द चाहिए था। उन्होंने इसलिए पाप किया क्योंकि वह पाप करना चाहता था। परन्तु वे यह भी अंगीकार करते हैं कि उस पापपूर्ण कार्य ने उसे अन्दर से खाली और दुःखी कर दिया।
माडौरा में जो कुछ भी सिख जा सकता था, सीखने के पश्चात् ऑगस्टीन कार्थेज चला गया। उस समय कार्थेज रोमी साम्राज्य का दूसरा सबसे बड़ा नगर था। एक बार फिर, ऑगस्टीन ने अध्ययन में उत्कृष्टता प्राप्त की। परन्तु उनकी सारी सफलता उन्हें तृप्त न कर सकी। कार्थेज को लातिनी भाषा में कार्टागो (Cartago) कहा जाता है। लातिनी शब्द सार्टागो (Sartago) का अर्थ है “तवा” या “तलने की कड़ाही।” और वास्तव में कार्थेज ऐसा ही था अर्थात् पापों की कड़ाही। विशाल बन्दरगाह, धन का लेन-देन, और शक्तिशाली लोगों की निरन्तर आवाजाही के कारण कार्थेज पाप की एक कड़ाही बन चुका था। ऑगस्टीन को कार्टागो –सार्टागो का यह शब्द-खेल बहुत पसंद था, अर्थात् “वह नगर जो पापों की कड़ाही है।” ऑगस्टीन ने वहाँ लालच, प्रसिद्धि और वासना के प्रलोभनों को बहुत तीव्रता से अनुभव किया।
अधिक अध्ययन और अधिक अध्यापन ने उन्हें और अधिक प्रसिद्धि दी, परन्तु वे और गहराई से भँवर में फँसते चले गए। उन्होंने एक रखैल रख लिया, और अगले पन्द्रह वर्षों तक वे उसके साथ विश्वासयोग्य बने रहें। दोनों का एक पुत्र भी हुआ, जिसका नाम एडियोडेटस था। थगास्ते और माडौरा के समान, अब कार्थेज भी ऑगस्टीन को छोटा लगने लगा। इसलिए वे अपनी रखैल और बेटे के साथ जहाज़ से रोमी साम्राज्य के सबसे बड़े नगर रोम को चले गए। परन्तु वहाँ पहुँचते ही पुन: निराशा और हताशा की एक और लहर ने उन्हें घेर लिया। यह ठीक उसी प्रकार है जैसे कोई कॉलेज का प्रसिद्ध खिलाड़ी पेशेवर स्तर पर अपने पहले ही मैच में अच्छा प्रदर्शन न कर पाए। इसलिए ऑगस्टीन, जो सदा भटकने वाले यात्री थे, स्वयं को सम्भालने तथा स्थिर होने के लिए मिलान चले गए।
जैसे-जैसे वह रोमी साम्राज्य के नगरों में भटकता रहे, वैसे-वैसे वह अपने समय के विश्व-दृष्टिकोणों और दर्शनशास्त्रों में भी भटकते रहें। वे परमेश्वर से भाग रहे थे। शीघ्र ही वे मैनिकीवाद (Manichaeism) के प्रभाव में आ गए, यह प्लेटोवादी विचारधारा का एक दूरस्थ रूप था, जिसमें मसीही विश्वास के कुछ तत्व (जो बुरी रीति से विकृत कर दिए गए थे) और रोम द्वारा जीते गए विभिन्न देशों के रहस्यवादी धर्मों के तत्व मिले हुए थे। ऑगस्टीन विशेष रूप से भलाई और बुराई की प्रकृति और उनके स्रोत के प्रश्न में उलझे हुए थे। उनका मन अशान्त था।
प्रकाश
मिलान नगर में एक फव्वारे के पास बने बाग में, ऑगस्टीन के जीवन में एक बहुत ही अप्रत्याशित घटना घटी। उस क्षण तक पहुँचने में चार बातें सम्मिलित थीं। पहली बात, ऑगस्टीन के एक मित्र की मृत्यु हो गई थी। द कन्फेशन्स (The Confessions) में ऑगस्टीन अपने कई मित्रों का उल्लेख करते हैं, परन्तु इस मित्र का नाम वे नहीं बताते, मानो उसका नाम लेना भी उनके लिए बहुत पीड़ादायक हो। दूसरी बात उनकी माता से सम्बन्धित है। ऑगस्टीन जहाँ-जहाँ भटकते हुए गए, उनकी माँ मोनिका उनके पीछे-पीछे चलती रही। वह भी मिलान आ गई थी। ऑगस्टीन के पूरे जीवन में मोनिका ने अपने पुत्र के उद्धार के लिए प्रार्थना करना कभी नहीं छोड़ा। उसका यह विश्वास कभी डगमगाया नहीं कि परमेश्वर उसके पुत्र को बचा सकता है। तीसरी बात यह थी कि ऑगस्टीन ने एम्ब्रोस का प्रचार सुना था। ऑगस्टीन ने पहले भी मसीही विश्वास को “परखा” था, परन्तु उसे वह भाषण-कला की दृष्टि से असंतोषजनक लगा। किन्तु इसके बाद उन्होंने एम्ब्रोस के प्रभावशाली और प्रेरक उपदेशों को सुना जो उसे नए नियम को पढ़ने की ओर ले गया। चौथी बात उनके प्रसन्नता की खोज तथा उनकी सबसे गहरी लालसाओं और इच्छाओं की पूर्ति से जुड़ी हुई थी। जितना अधिक वे सुख की खोज करते, उतना ही अधिक वे दुःख का अनुभव करते। जितना अधिक वे सन्तुष्टि का खोज करते उतना ही अधिक वे खालीपन का अनुभव करते। वे ऐसे जलयान के समान थे जो बार बार गलत बन्दरगाहों पर जाकर रुक रहा हो। कन्फेशन्स के पहले ही अनुच्छेद में वे यह प्रसिद्ध पंक्ति लिखते हैँ: “हमारे हृदय तब तक अशांत रहते हैं, जब तक वे तुझ में विश्राम नहीं पा लेते।”
और इसी प्रकार वे अपने मित्र एलीपियस के साथ अपने बगीचे में थे। उनके पास पौलुस के द्वारा लिखी गई रोमियों की पत्री की एक प्रतिलिपि थी। तभी उन्हें ऐसा अनुभव हुआ की बच्चों की खेल की आवाज़ सुनाई दे रही हो जो लतीनी भाषा में कह रहे थे: “तोले, लेगे। तोले लेगे (Tolle, lege. Tolle, lege)।” जिसका अर्थ है – “उठाओ, पढ़ो। उठाओ, पढ़ो।” इसलिए उन्होंने रोमियों की पत्री को पढ़ा और उसी क्षण प्रकाश ने उनकी आत्मा को भर दिया तथा अन्धकार और सन्देह को दूर कर दिया। ऑगस्टीन को वह मिल गया जिसकी वे खोज कर रहे थे—सत्य, आनन्द, जीवन, प्रसन्नता और शान्ति। अनन्त: उनके अशान्त हृदय को विश्राम मिल गया।
जैसा कि ऑगस्टीन स्वयं आगे चलकर सिखाने लगे कि उन्होंने परमेश्वर की खोज नहीं की है परन्तु परमेश्वर ने उन्हें पाया है। इसलिए, 386 ईस्वी में मिलान में ऑगस्टीन के हृदय परिवर्तन की कहानी में एक पाँचवाँ और अन्तिम तत्व भी है। जैसा कि ऑगस्टीन ने सोचा कि वह परमेश्वर से दूर जा रहा था, तब वास्तव में (“स्वर्ग का शिकारी”) जैसा कि ऑगस्टीन अपने भजनों की टीका में परमेश्वर को कहते हैं उसे निरन्तर अपने पास खींच रहा था। ऑगस्टीन के जीवन की कहानी सम्प्रभु परमेश्वर के अनुग्रह की विजय की कहानी है। जब मनुष्य अपने जीवन की भूमिका निभाते हैं, तब परमेश्वर सम्प्रभुता के साथ सभी मानवीय कार्यों पर शासन करता है और सब बातों को अपनी अनन्त ठहराई हुई इच्छा और उद्देश्य की पूर्ति तक पहुँचाता है—जैसे कोई कुशल धनुर्धारी तीर को निशाने के केन्द्र तक पहुँचा देता है।
ऑगस्टीन के हृदय परिवर्तन के तुरन्त पश्चात्, वे अपने कुछ मित्रों के साथ कास्सियाकुम (Cassiacum) गए, जो इटली की आल्प्स पर्वतमाला की तलहटी में बसा एक विश्राम-स्थल था। वहाँ ऑगस्टीन ने, एक नए मसीही के रूप में, अपनी पहली मसीही पुस्तकों को लिखा (यद्यपि अपने हृदय-परिवर्तन से पहले भी उन्होंने विभिन्न विषयों पर अनेकों पुस्तकों को लिखा था, परन्तु वे सब इतिहास में खो चुकी हैं)। इन पुस्तकों में दूसरी एक छोटी संवादात्मक रचना है, जिसका शीर्षक है ऑन द हैप्पी लाइफ ( आनन्दमय जीवन पर) । प्लेटो की “एलेगोरी ऑफ़ द केव” (“Allegory of the Cave”) या वोल्टेयर की “द स्टोरी ऑफ़ अ गुड ब्राह्मिन” (“The Story of a Good Brahmin”) के समान, यह रचना भी प्रसन्नता के मूल प्रश्न तथा इसे कैसे प्राप्त की जाए, इसकी खोज-बीन करती है। ऑगस्टीन कहते हैं कि बहुत कम लोग वास्तव में प्रसन्नता को प्राप्त करते हैं। परन्तु जो इसे प्राप्त करते हैं, वे यह जानते हैं: “जो कोई प्रसन्न है, उसके पास परमेश्वर है।” वे आगे जोड़ते है कि परमेश्वर को पाना, वास्तव में परमेश्वर में पूर्ण आनन्द लेना है।
इसके बाद ऑगस्टीन मिलान लौटे और 387 ईस्वी की वसंत ऋतु में एम्ब्रोस द्वारा उनका बपतिस्मा ङुआ। उसके साथ उसके पुत्र एडियोडेटस और मित्र एलिपियुस का भी बपतिस्मा हुआ। इसके तुरन्त पश्चात् उन्होंने अपने घर लौटने की योजना बनाई। ऑगस्टीन ने अपनी रखैल को, उससे विवाह करने के स्थान पर विदा कर दिया। यह एक ऐसा निर्णय था जिसे उन्होंने बाद में पछतावे के साथ स्मरण किया। उन्होंने अपने पुत्र को अपने साथ ही रखा। वे सभी, ऑगस्टीन, उसका पुत्र, और उसकी माता मोनिका रोम नगर के बन्दरगाह नगर ओस्तिया पहुँचे। वहाँ उन्होंने एक आँगन की ओर खुलने वाले कमरे किराए पर लिए और कार्थेज लौटने के लिए जहाज़ की प्रतीक्षा करने लगे। उसी ओस्तिया में मोनिका की मृत्यु हो गई, और ऑगस्टीन के हृदय में “शोक की एक महान् लहर उमड़ पड़ी।” यह घटना द कन्फेशन्स की नौवीं पुस्तक में वर्णित है और उन सबसे मार्मिक क्षणों में से एक है जिन्हें ऑगस्टीन ने स्वयं लिखा है।
बिशप
जब ऑगस्टीन 389 ईस्वी में थगास्टे में थे, उसी समय उसके पुत्र एडियोडेटस, जो पढ़ाई के लिए कार्थेज गया था, उसकी मृत्यु हो गई। ऑगस्टीन ने अपनी ऊर्जा लेखन में लगाई और 392 ईस्वी में आधुनिक अल्जीरिया के हिप्पो रेगियस में याजक के रूप में नियुक्त किए गए। ऑगस्टीन के समय में हिप्पो रेगियस उस क्षेत्र की राजधानी था। वहाँ एक रंगशाला थी जिसमें छह हज़ार लोग बैठ सकते थे, और उस नगर में प्राचीन रोमी नगरों की सभी विशेषताएँ उपस्थित थीं। उस नगर में एक विशाल बेसिलिका (चर्च भवन) भी थी। याजक बनने के चार वर्ष बाद, ऑगस्टीन को हिप्पो रेगियस का बिशप नियुक्त किया गया।
बिशप के रूप में ऑगस्टीन ने कलीसियाई महासभाओं की अगुवाई की; अपने समय के सभी विवादों पर मार्गदर्शन दिया; अनेक लोगों को आत्मिक परामर्श दिया, जिनमें सेनापति और रोमी अधिकारी भी सम्मिलित थे; अपने बिशप क्षेत्र की विभिन्न कलीसियाओं का निरीक्षण किया; विवादों पर निर्णय दिया; और यहाँ तक कि कलीसिया के निर्माण कार्यों के लिए धन एकत्र करने में भी सहायता की। इसके अतिरिक्त, जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है, वह नियमित रूप से उपदेश भी देते थे। हिप्पो की बेसिलिका (चर्च भवन) सम्भवत: आधे फुटबॉल मैदान के बराबर लम्बी थी। उसकी छत लकड़ी की कड़ियों से बनी थी, जिन पर टेराकोटा की टाइल्स लगी थीं। फर्श पर सुन्दर पच्चीकारी जड़े थे, और वेदी का गोल भाग (एप्स) उस क्षेत्र के स्थानीय संगमरमर से बना था। वेदी और सभागृह के बीच एक विशाल पत्थर की संरचना थी, जहाँ से ऑगस्टीन उपदेश दिया करते थे।
ऑगस्टीन हर प्रकार के विवादों का समाधान करते थे। एक मामले में, एक पुस्तकालय में पाँडुलिपियों की नकल करने वाले याजक पूरे दिन उन लोगों से परेशान रहते थे जो संग्रह की अन्य पाण्डुलिपियाँ को “देखना” चाहते थे। वे पुस्तकालयाध्यक्ष (लाइब्रेरियन) की भाँति इतने व्यस्त रहते थे कि लेखक होने के रूप में अपने कार्य पर ध्यान नहीं दे पाते थे। ऑगस्टीन ने सामान्य बुद्धि का उपयोग किया—दिन में पुस्तकों को लेने के लिए एक निश्चित समय निर्धारित किया जाए; उसके अतिरिक्त समय में नकल करने वालों को शान्ति से अपना कार्य करने दिया जाए।
ये छोटे छोटे विषय थे जो ऑगस्टीन का समय खा जाती थीं। बड़े विषय दो प्रमुख विवाद थे—दोनातुसवाद (Donatism) और पलेजियसवाद (Pelagianism) विवाद। दोनातुसवाद विवाद चौथी शताब्दी के पहले दशक तथा कॉन्स्टेंटाइन के रोमी सम्राट बनने से पहले हुए मसीहियों पर घोर उत्पीड़न के समय से जुड़ा है। कॉन्स्टेंटाइन द्वारा मसीही धर्म को मान्यता दिए जाने के पश्चात् जब उत्पीड़न कम हुआ, तो जो लोग उत्पीड़न के समय अपने विश्वास से समझौता कर चुके थे, वे उन्हीं कलीसियाओं में उन लोगों के साथ बैठने लगे जो अपने विश्वास में दृढ़ रहे थे तथा परिणामस्वरूप, इनके कारण कष्ट भी सहे थे। यह संघर्ष विशेष रूप से कार्थेज और उत्तरी अफ्रीका में तीव्र था। समय के साथ, परम्परा, कलीसियाई सदस्यता, धर्मत्याग की प्रकृति, और स्वयं उद्धार की प्रकृति से जुड़े प्रश्न दोनातुसवाद विवाद के साथ गुँथते चले गए।
पलेजियसवाद सुसमाचार के केंद्र तक पहुँचता है। पलेजियस सम्भवत: 380 ईस्वी में ब्रिटेन से रोम चला आया। सम्भवत: 400 ईस्वी के आसपास वह नैतिकता और पाप का प्रसारण सम्बन्धित चर्चा में सम्मिलित हुआ। पलेजियस लोगों को नैतिक रूप से उत्तरदायी ठहराना चाहता था, और ऐसा वह केवल इस शिक्षा द्वारा कर सकता था कि आदम का पाप उसकी संतान पर आरोपित नहीं होता। पलेजियस के लिए आदम केवल एक उदाहरण था। परिणाम यह है कि लोग पापी जन्म से नहीं होते, किन्तु तटस्थ जन्म लेते हैं। हमें भला और परमेश्वर को चुनने की स्वतंत्रता है या विपरीत दिशा चुनने की स्वतंत्रता है। ऑगस्टीन ने पलेजियस की इस विधर्मता (heresy) का उत्तर परमेश्वर के अनुग्रह पर बल देकर दिया। हम जन्म से पापी हैं, तटस्थ नहीं। ऑगस्टीन ने नॉन पोस्से नॉन पेक्कारे (non posse non peccare) शब्दावली का प्रयोग किया, जिसका अर्थ है कि हम पाप न करने में असमर्थ हैं। दूसरे शब्दों में, हम पाप के दासत्व में हैं। तब ऑगस्टीन ने यह घोषणा की, “यीशु ख्रीष्ट के द्वारा परमेश्वर का अनुग्रह ही एकमात्र ऐसी सामर्थ्य है जो हमें स्वतन्त्र करता है।” हम अपने अपुनरुज्जीवित (unregenerate) अवस्था में परमेश्वर के अनुग्रह के साथ सहयोग नहीं करते। हम परमेश्वर की ओर पहला कदम नहीं बढ़ाते हैं। हम पाप के दासत्व में हैं तथा पापों में मरे हुए हैं। परन्तु परमेश्वर ने अपने अनुग्रह में अपने पुत्र को भेजा और हमें नया जन्म दिया तथा विश्वास का वरदान प्रदान किया।
426 ईस्वी के एक पत्र में ऑगस्टीन ने लिखा कि यदि परमेश्वर का अनुग्रह हमारे कार्यों के अनुसार दिया जाता है, तो उद्धार में कुछ महिमा हमें भी मिल जाती है। पलेजियसवाद में महिमा केवल परमेश्वर की नहीं होती, किन्तु मनुष्य की भी होती है। ऑगस्टीन स्पष्ट रूप से यह घोषित करते हैं कि पवित्रशास्त्र ऐसी किसी भी धारणा को स्वीकार नहीं करता। हमने सब कुछ परमेश्वर से ही प्राप्त किया है, विशेषकर अपना उद्धार, और इसलिए महिमा केवल उसी की है। ऑगस्टीन के इस स्पष्ट खण्डन के बाद भी, पलेजियसवाद पाँचवीं शताब्दी और उसके बाद भी बना रहा।
इन विवादों में ऑगस्टीन ने नेतृत्व किया, परन्तु वह अकेला नहीं था। इस पूरे समय वह एलिपियस का घनिष्ट मित्र बना रहा। इन दोनों ने एक साथ विश्वास किया, एक साथ बपतिस्मा लिया तथा एक ही समय याजक नियुक्त किए गए तथा पड़ोसी बिशप क्षेत्रों में सेवा भी की। ऑगस्टीन प्राय: सिसेरो द्वारा दी गई मित्रता की परिभाषा को उद्धृत करते थे: “मित्रता मानवीय और ईश्वरीय विषयों में, आपसी प्रेम और स्नेह के साथ, सहमति है।” ऑगस्टीन और एलिपियस पहले मानवीय बातों में मित्र थे, और फिर ख्रीष्ट में वे ईश्वरीय बातों में भी मित्र बने। ऑगस्टीन का विश्वास था कि एलिपियस और अन्य कई लोगों के साथ उनकी इस प्रकार की मित्रता भी परमेश्वर द्वारा दिए गए उद्धार के वरदान से उत्पन्न एक अतिरिक्त उपहार था। ऑगस्टीन अपने समकालीनों से स्पष्ट रूप से ऊँचे स्थान पर थे, और विवाद तथा संकट के समय उनके साथ खड़े रहने वाले उनके अनेक मित्रों और सहयोगियों के नाम आज हमें ज्ञात नहीं हैं। फिर भी, ऑगस्टीन जानते थे कि वे अकेले नहीं हैं और दूसरों की सहायता से ही वे ऐसा कर पारहे हैं।
संकट
ऑगस्टीन ने विभिन्न लंबाइयों की लगभग चार सौ पुस्तकें लिखीं। इनमें से कई उत्कृष्ट हैं। दो पुस्तकें अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं: द कन्फेशन्स (The Confessions) और द सिटी ऑफ़ गॉड (The City of God)। ऑगस्टीन ने द कन्फेशन्स पुस्तक को 400 ईसवी में लिखा। उन्होंने द सिटी ऑफ़ गॉड पुस्तक को 412 ईसवी में लिखना आरम्भ किया और तेरह वर्ष के पश्चात इसे पूर्ण किया। द सिटी ऑफ़ गॉड उस संकट की पृष्ठभूमि में लिखी गई थी जिसने ऑगस्टीन के जीवन के अन्तिम दो दशकों को गहराई से प्रभावित किया अर्थात रोम का विनाश तथा पश्चिमी रोमी साम्राज्य का पतन। 410 में विसिगोथ राजा अलारिक ने रोम को लूट लिया। इससे चारों ओर लोगों पर भय छा गया। पश्चिमी रोम में कुछ ही लोग रोमी साम्राज्य के बिना जीवन की कल्पना कर सकते थे, और बहुत-से लोग रोमी साम्राज्य की संरचना और समर्थन के बिना कलीसिया की भी कल्पना नहीं कर पा रहे थे। कुछ लोगों ने रोम की पराजय और साम्राज्य के पतन के लिए मसीहियत को दोषी ठहराया। जहाँ भी ऑगस्टीन ने देखा, उसे गलत सोच दिखाई दी। वह सबसे बढ़कर एक शिक्षक था, और इसलिए उन्होंने द सिटी ऑफ़ गॉड पुस्तक को लिखा जिससे कलीसिया को संकट के विषय में बेहतर रीति से सोचने का मार्ग सिखा सके।
ऑगस्टीन अपनी इस पुस्तक का आरम्भ परमेश्वर की महिमामय नगर से ककरते हैं, एक ऐसा नगर या राज्य जिसका कोई अन्त नहीं है। वही अकेला शाश्वत, स्थायी और सत्य है। इसके पश्चात मनुष का नगर है जो अपने देवताओं को प्राथमिकता देता है। इन दोनों नगरों के मध्य सदैव संघर्ष रहा है। राष्ट्र और साम्राज्य आते-जाते रहते हैं, परन्तु संघर्ष बना रहता है, और अन्ततः विजय और प्रभुत्व केवल परमेश्वर के नगर का ही होता है। रोमी साम्राज्य को ध्यान में रखते हुए, ऑगस्टीन पहले ही पृष्ठ पर लिखते हैं कि “सभी सांसारिक पद-प्रतिष्ठाएँ इस परिवर्तित संसार में डगमगाती रहती हैं।” राष्ट्र, विश्वदृष्टियाँ और विचारधाराएँ सब डगमगाती हैं, परिवर्तित होती हैं और अन्ततः ढह जाती हैं।
ऑगस्टीन ने इस पुस्तक के अन्तिम पृष्ठ को 425 ईस्वी में लिखा। उस समय वह अपनी वृद्धावस्था का अनुभव कर रहे थे और उसके विचार स्वर्ग की ओर मुड़ गए। वह उस महान् आनन्द के विषय में लिखते हैं जो वहाँ होगा—जहाँ हम पाप से अछूते और शुद्ध होंगे, और जहाँ परमेश्वर पूर्ण रूप से सब में सब होगा। वहाँ हम सच्ची सुन्दरता का आनन्द लेंगे, और हमारी सभी लालसाएँ तथा इच्छाएँ पूर्ण रूप से तृप्त होंगी। ऑगस्टीन ने स्वर्ग को “पवित्र और अनन्त विश्राम का स्थान” (sanctum aeternum otium) कहा, जहाँ हम स्थिर रहेंगे और जानेंगे कि परमेश्वर है, और हम उसके नगर में उसके साथ होंगे।
430 ईस्वी तक वैंडल जाति ने हिप्पो नगर की घेराबन्दी कर लि थी। ऑगस्टीन ने अपनी मृत्यु-शय्या से ही नगर की अन्तिम सुरक्षा-व्यवस्थाओं का संचालन किया। जैसे-जैसे वे दुर्बल होते गए, उसके विश्वासयोग्य लिपिकारों ने उनके लिए भजन संहिता को बड़े अक्षरों में लिख दिया जिससे कि वे पढ़ सके। जब वे पन्नों पकड़ने में असमर्थ हो गए, तो उन पन्नों को दिवारों में चिपका दिया गया। अब वे भटकते हुए नहीं थे, ऑगस्टीन के पास अपनी आवश्यकता या इच्छा से कहीं अधिक था, क्योंकि उनके पास ईश्वर था, जो सब कुछ में सब कुछ है।
यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

