
पवित्र आत्मा के वरदान
3 फ़रवरी 2026मसीही सिद्धान्त में ऑगस्टीन के सकारात्मक योगदान
ऑरेलियस ऑगस्टीन, जिन्हें हम हिप्पो के ऑगस्टीन (Augustine of Hippo) के नाम से जानते हैं, का जन्म 354 ईसवी में उत्तरी अफ्रीका के एक छोटे से नगर में हुआ था। उनके पिता जीवन भर अविश्वासी रहे और मृत्यु से ठीक पहले उन्होंने बपतिस्मा लिया, जबकि उनकी माता एक समर्पित मसीही थीं, जो अपने भटके हुए पुत्र के लिए निरन्तर प्रार्थना करती रहती थीं। समय के साथ उत्तरी अफ्रीका का यही बालक मसीही विश्वास में परिवर्तित हुआ। आगे चलकर वह कलीसिया के पहले हज़ार वर्षों के इतिहास में सबसे प्रभावशाली ईश्वरविज्ञानी बना और सम्पूर्ण पश्चिमी इतिहास के सबसे प्रभावशाली विचारकों में से एक माना गया।
युवा अवस्था में ऑगस्टीन द्वैतवादी (Dualistic) धर्म मैनिकीवाद (Manichaeism) से प्रभावित हुए तथा इसके पश्चात नव-अफलातूनवाद (neo-Platonism) की ओर आकर्षित हुए। ख्रीष्ट में उनका नाटकीय परिवर्तन उनकी पुस्तक कन्फ़ेशन्स (Confessions) में वर्णित है। 395 ईसवी में ऑगस्टीन उत्तरी अफ्रीका के हिप्पो रेगियस के बिशप बने। एक प्रभावशाली कलीसियाई अगुवे के रूप में वे अपने जीवनकाल में दो मुख्य ईश्वरविज्ञानी विवादों तथा अनेक छोटे विवादों में गहराई से जुड़े। जिन दो प्रमुख विवादों में उन्होंने विशेष रूप से अपनी ऊर्जा और लेखनी समर्पित की, वे थे दोनातीवाद (Donatist) विवाद तथा पलेजियसवाद (Pelagian) विवाद। इन दोनों में उनके योगदान ने पश्चिमी कलीसिया की दिशा को स्थायी रूप से आकार दिया।
ऑगस्टीन ने कलीसिया के लिए अत्यन्त विशाल साहित्यिक धरोहर भी छोड़ी। इसमें विस्तृत ईश्वरविज्ञानीय निबन्ध, वाद-विवाद सम्बन्धी ग्रन्थ, बाइबल टीकाएँ, और सैकड़ों की संख्या में पत्र व उपदेश सम्मिलित हैं। ये लेखन उस समय भी महत्वपूर्ण ईश्वरविज्ञानी स्रोत थे और आज भी बने हुए हैं।
कलीसिया के प्रारम्भिक और मध्यकालीन इतिहास के अधिकाँश काल में, पवित्रशास्त्र के बाद ऑगस्टीन को प्रमुख ईश्वरविज्ञानी अधिकार के रूप में माना गया। जिस प्रकार से आज कोई धर्मसुधारवादी ईश्वरविज्ञानी किसी सिद्धान्त के समर्थन में जॉन कैल्विन के लेखों का उल्लेख करता है, वैसे ही प्रारम्भिक ईश्वरविज्ञानी अपने विचारों के समर्थन में नियमित रूप से ऑगस्टीन की शिक्षाओं का सहारा लेते थे। कुछ वाद-विवादों में, जैसे धर्मसुधार आन्दोलन के समय प्रभु भोज से सम्बन्धित चर्चाओं में, विरोधी मतों के समर्थक भी ऑगस्टीन को अपने पक्ष में प्रस्तुत करते थे।
बारहवीं शताब्दी में पीटर लोम्बार्ड ने द फोर बुक्स ऑफ सेंटेन्सेस (The Four Books of Sentences) नामक एक ईश्वरविज्ञानीय पुस्तक लिखा। सेंटेन्सेस (Sentences) तेरहवीं शताब्दी के आरम्भ से लेकर धर्मसुधार-युग तक विश्वविद्यालयों में मानक ईश्वरविज्ञानीय पाठ्य-पुस्तक बना रहा। प्रत्येक योग्य ईश्वरविज्ञानी के लिए लोम्बार्ड की सेंटेन्सेस पर टीका लिखना उसकी शिक्षा का अनिवार्य भाग था। मैं लोम्बार्ड की सेंटेन्सेस का उल्लेख इसलिए करता हूँ, क्योंकि इसकी सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि इसकी सामग्री निरन्तर ऑगस्टीन के लेखनों का सहारा लेती है।
बात यह है कि पवित्रशास्त्र और ईश्वरविज्ञान के विषय में ऑगस्टीन की समझ ने प्रारम्भिक, मध्यकालीन तथा धर्मसुधार के ईश्वरविज्ञान पर गहरा प्रभाव डाला। कलीसिया ने औपचारिक रूप से उसकी कई शिक्षाओं को स्वीकार किया, और ऑगस्टीन के बाद आने वाले कलीसिया के ईश्वरविज्ञानियों ने उसके कार्य पर आगे निर्माण करने का प्रयास किया। यहाँ तक कि जब कलीसिया और उसके ईश्वरविज्ञानियों ऑगस्टीन की कुछ शिक्षाओं से दूर भी हुए, तो उन्होंने ऐसा बहुत ही शान्तिपूर्वक किया। शास्त्रसम्मत मसीही परम्परा के भीतर वास्तव में कोई भी ऑगस्टीन का विरोध करने वाला दिखाई देना नहीं चाहता था।
यदि ऑगस्टीन ने कोई शिक्षा दी भले ही वह बाइबल के अनुरूप थी या नहीं, कलीसिया में स्थायी रूप से बनी रहीं और शताब्दियों तक कलीसिया में प्रत्येक व्यक्ति को प्रभावित करती रही। इसका अर्थ यह है कि यदि ऑगस्टीन ने किसी विषय पर सही शिक्षा दी, तो उसके प्रभाव और अधिकार के कारण वह शिक्षा भविष्य की त्रुटियों से बचाने वाली एक मानक बन गई। परन्तु यदि उसने किसी विषय में त्रुटि की, तो उसकी व्यापक स्वीकृति के कारण वह त्रुटि भी आगे की पीढ़ियों में बढ़ती चली गई। पश्चिमी कलीसिया के ईश्वरविज्ञानी सामान्यतः ऑगस्टीन का विरोध करने से बचते थे, जिसके परिणामस्वरूप उसकी सिखाई हुई सत्य और त्रुटियाँ दोनों कलीसिया के सिद्धान्तात्मक ढाँचे का भाग बन गईं।
इस अंक के Tabletalk (टेबलटॉक) में प्रकाशित पिछले लेख में उन विषयों पर विचार किया गया था जहाँ ऑगस्टीन से कुछ महत्वपूर्ण त्रुटियाँ हुईं। प्रायः ये त्रुटियाँ उन मूर्तिपूजक शिक्षाओं के अवशेषों के कारण थीं जिन्हें ऑगस्टीन ने अपने हृदय-परिवर्तन से पहले अपनाया था। परन्तु यह लेख (जिसे आप पढ़ रहे हैं) ऑगस्टीन के मसीही ईश्वरविज्ञान में दिए गए सकारात्मक योगदानों पर केन्द्रित है। इस क्रम में, सर्वप्रथम हम उसके कुछ विशिष्ट धर्मसिद्धान्तों को उनके ऐतिहासिक सन्दर्भ में देखेंगे। इस प्रक्रिया में, हम उन बिन्दुओं पर भी ध्यान देगें, जहाँ धर्मसुधारको ने उसकी शिक्षाओं के कुछ पक्षों पर आपत्ति प्रकट की। ऐसा करना आवश्यक है, क्योंकि कभी-कभी ऑगस्टीन की शिक्षाओं में अच्छा और बुरा दोनों का मिश्रण पाया जाता है—यहाँ तक कि उन क्षेत्रों में भी जहाँ वे मुख्यतः सही दिशा में थे।
ऑगस्टीन ने स्वयं अपनी लेखनी के प्रति इस प्रकार के दृष्टिकोण को बढ़ावा दिया। वह अपने विषय में किसी भी प्रकार से यह नहीं सोचते थे कि वे अचूकत (infallibile) थे। उनका यह स्पष्ट विश्वास था कि उनके लेखन का अधिकार और स्तर पवित्रशास्त्र के समान नहीं है। कुछ समय पूर्व ही प्राप्त एक पत्र में ऑगस्टीन लिखते हैं:
हम, जो प्रचार करते हैं और पुस्तकें लिखते हैं, हमारा लिखने की रीति उस प्रकार का नहीं है जिस प्रकार पवित्रशास्त्र का ग्रन्थसंग्रहण (The canon of Scriptures) लिखा गया है। हम लिखते समय स्वयं भी आगे बढ़ रहे होते हैं। हम प्रतिदिन कुछ नया सीखते हैं। हम खोज करते हुए ही लिखते और बोलते हैं। हम तब बोलते हैं जब हम अभी भी समझ की खोज में हैं . . . । इसलिए मैं आपसे, मेरे प्रति प्रेम रखते हुए, यह आग्रह करता हूँ कि मेरी किसी भी पूर्व लिखी पुस्तक या उपदेश को पवित्रशास्त्र के रूप में स्वीकार न करें। यदि कोई व्यक्ति मेरी उस बात की आलोचना करता है जो सही है, तो वह सही नहीं करता। परन्तु मेरी अनुचित आलोचना करने वालों से अधिक मैं ऐसे व्यक्ति से अधिक अप्रसन्न होता हूँ जो मेरी प्रशंसा करता है और मेरी लिखी बातों को सुसमाचार की सत्यता [ग्रन्थसंग्रहण] के रूप में स्वीकार करता है।”
सर्वप्रथम, हम उस विवाद पर दृष्टि डालेंगे जिसने ऑगस्टीन के जीवन के सम्भवत: पच्चीस वर्ष ले लिए। दोनातीवाद (Donatist) विवाद की उत्पत्ति तीसरी और प्रारम्भिक चौथी शताब्दी में कलीसिया पर हुए सताव के कारण हुआ। इन सतावों के समय कई मसीहियों ने किसी भी प्रकार के समझौते का विरोध किया और अत्यन्त कष्ट का सामना किया, यहाँ तक कि कुछ ने मृत्यु भी स्वीकार की। वहीं दूसरी ओर, कुछ लोगों ने समझौता कर लिया या सताने वाले के साथ सहयोग किया; कुछ ने तो पवित्रशास्त्र की प्रतियाँ भी अधिकारियों को सौंप दीं, जिन्हें बाद में नष्ट कर दिया गया।
जब सताव समाप्त हुआ, तब एक ऐसा विवाद उत्पन्न हुआ जिसने उत्तरी अफ्रीकी कलीसिया में लम्बे समय तक चलने वाले विभाजन को जन्म दिया। इस विवाद में दो सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न कलीसिया की प्रकृति और बपतिस्मा की वैधता से सम्बन्धित थे। दोनातीवाद, जो स्वयं एक समान और एकरूप समूह नहीं थे, मूलतः कलीसिया को विश्नासयोग्य लोगों का एक पवित्र और छोटा समुदाय मानते थे। उनके अनुसार कलीसिया उन लोगों से बनी थी जो विश्वासघातियों के पाप से दूषित नहीं हुए थे। इस सच्ची कलीसिया को, जैसा कि उनमें से बहुतों का विश्वास था, वास्तव में केवल उत्तर अफ्रीका तक सीमित माना जाता था। उनके लिए बपतिस्मा तभी वैध था जब वह इसी सच्ची कलीसिया के किसी सेवक द्वारा दिया गया हो।
ऑगस्टीन दोनातीवादी विवाद में उस समय तक सक्रिय रूप से जुड़े रहे, जब तक कि 411 ईसवी में कार्थेज की सभा (Council of Carthage) में दोनातीवाद की निन्दा नहीं कर दी गई। दोनातीवादी अपने आप को ही एकमात्र सच्ची कलीसिया मानते थे। इसके उत्तर में ऑगस्टीन ने विश्वव्यापी कलीसिया का धर्मसिद्धान्त प्रस्तुत किया, जिसके अनुसार कलीसिया में अन्तिम दिन तक गेहूँ और जंगली घास दोनों साथ-साथ रहेंगे। ऑगस्टीन की यह शिक्षा उनके समय से लेकर आज तक सामान्य रूप से स्वीकार की जाती रही है, यद्यपि रोमन कैथोलिक और प्रोटेस्टेन्ट परम्पराओं ने इसे अलग-अलग रीति से समझा है। दोनातीवादियों की इस शिक्षा के प्रतिउत्तर में कि बपतिस्मा की वैधता उस पुरोहित या बिशप की नैतिक योग्यता पर निर्भर करती है जो उसे देता है, ऑगस्टीन ने तर्क दिया कि इस कलीसियाई विधि की वैधता अन्ततः इस तथ्य पर आधारित है कि उसका संचालक स्वयं ख्रीष्ट है। इसलिए इस कलीसियाई विधि की वैधता उस मानवीय माध्यम के चरित्र पर निर्भर नहीं करती, जिसे ख्रीष्ट उपयोग में लाता है। यदि ऐसा होता, तो हम कभी यह निश्चित नहीं कर सकते कि हमने वैध बपतिस्मा प्राप्त किया है या नहीं, क्योंकि किसी व्यक्ति के हृदय की वास्तविक स्थिति को जानना हमारे लिए सम्भव नहीं है। धर्मसुधारवादी ईश्वरविज्ञानियों ने इस विषय पर प्रायः ऑगस्टीन से सहमति प्रकट की, यद्यपि वे बपतिस्मा और अनुग्रह के आपसी सम्बन्ध के विषय में उनसे भिन्न दृष्टिकोण रखते थे।
यह तर्क दिया जा सकता है कि मसीही धर्मसिद्धान्त में ऑगस्टीन का सबसे महत्वपूर्ण सकारात्मक योगदान उस अगले विवाद के समय सामने आया, जिसमें वे सम्मिलित थे। ऑगस्टीन की पहली पेलाजियन-विरोधी (anti-Pelagian) लेखनी कार्थेज की सभा के कुछ ही समय बाद लिखी गईं। इन लेखनों में ऑगस्टीन ने पाप, अनुग्रह, पूर्व-निर्धारण और स्वतन्त्र इच्छा से सम्बन्धित अपने धर्मसिद्धान्तों को प्रस्तुत किया। उनके विचारों ने धर्मसुधार तथा उसके समय तक होने वाली चर्चाओं की सीमाएँ निर्धारित कर दी गईं। तथापि, ऑगस्टीन के विचारों को ठीक से समझने के लिए, हमें सर्वप्रथम यह जानने की आवश्यकता है कि पेलेजियस ने क्या सिखाया था।
मैनिकीवाद (Manichaean) विचार के प्रत्युत्तर में, जिसके अनुसार मनुष्य अपने शारीरिक स्वभाव के कारण बुरा है—पेलाजियस ने यह सिखाया कि मनुष्य मूल रूप से अच्छा है, क्योंकि उसे परमेश्वर ने अच्छा बनाकर सृष्टि किया है। उसके विचार में, जो मसीही यह सिखाते थे कि मनुष्य आदम के पाप के कारण भ्रष्ट हो गया है, वे वास्तव में मैनिकीवाद (के बहुत निकट की शिक्षा दे रहे थे। पेलाजियस ने इस शिक्षा को अस्वीकार किया और तर्क दिया कि आदम का पाप केवल आदम को ही प्रभावित करता है, न कि सम्पूर्ण मानव जाति को। उसके अनुसार, आज हम जो पाप करते हैं, वह किसी प्रकार की विरासत में मिली पापपूर्ण भ्रष्टता के कारण नहीं है। जब हम पाप करते हैं, तो हम केवल आदम की नकल करते हैं, जैसे कोई बच्चा अपने पिता की नकल करता है। यदि हम बार-बार ऐसा करते हैं, तो पाप करने की आदत बन जाती है। पेलाजियस का मानना था कि इस पाप की आदत को हम अपनी स्वतन्त्र इच्छा का उपयोग करके, बुराई के स्थान पर भलाई को चुनते हुए, दूर कर सकते हैं। पेलाजियस के विचार में, यदि मनुष्य अपनी स्वतन्त्र इच्छा का सदैव सही उपयोग करे और भलाई को चुनता रहे, तो पूर्णतः निष्पाप जीवन जीना भी सम्भव है।
यद्यपि पेलाजियस के पास मूल पाप का कोई धर्मसिद्धान्त नहीं था, फिर भी उसने कहा कि उद्धार के लिए अनुग्रह आवश्यक है। परन्तु यह समझना बहुत महत्वपूर्ण है कि वह “अनुग्रह” से वास्तव में क्या अर्थ रखता था। पेलाजियस ने इस शब्द का उपयोग कई अर्थों में किया है। सबसे पहले, उसने तर्क दिया कि बाइबल में परमेश्वर का प्रकाशन अनुग्रह का एक उपहार है। दूसरा, यीशु का देहधारण हमें अनुकरण करने के लिए एक नया आदर्श देता है। यह भी अनुग्रह का उपहार है। तीसरा, और सबसे महत्वपूर्ण, हमारा अस्तित्व स्वयं अनुग्रह का उपहार है। परमेश्वर ने अनुग्रहपूर्वक हमें रचा और हमें कई क्षमताएँ दीं, जिनमें स्वतन्त्र इच्छा भी निहित है। इसका अर्थ यह है कि भलाई या बुराई चुनने की हमारी क्षमता परमेश्वर के अनुग्रह का उपहार है। हम अपनी स्वतन्त्र इच्छा का उपयोग कैसे करते हैं, यह पूर्णतः हम पर निर्भर है, परन्तु यह तथ्य कि हमारे पास चुनने की क्षमता है, परमेश्वर के उस अनुग्रहमयी निर्णय के कारण है जिसके द्वारा उसने हमें सृजा है। इसी प्रकार पेलाजियस यह कह सकता है कि उद्धार के लिए परमेश्वर का अनुग्रह आवश्यक है। परमेश्वर ने अनुग्रह में होकर ख्रीष्ट का अनुकरण करने की स्वतन्त्र क्षमता दी है, और यदि हम ऐसा करते हैं, तो हमारे अच्छे कार्य हमारे उद्धार के योग्य ठहरते हैं।
पेलेजियसवादी शिक्षाओं के प्रत्युत्तर में, ऑगस्टीन ने पतन से पूर्व और पतन के बाद मानव अवस्था के बीच एक स्पष्ट भेद स्थापित किया। आदम के पाप के परिणामस्वरूप उसका स्वभाव भ्रष्ट हो गया, और यह भ्रष्टता आदम की सन्तान में भी स्थानान्तरित हो गई। पतन से पूर्व, मनुष्य में भलाई अथवा बुराई में से किसी एक को चुनने की क्षमता थी। किन्तु मूल पाप के कारण मानव इच्छा भ्रष्ट हो गई और उसने वह स्वतन्त्रता खो दी जो पतन से पहले उसे प्राप्त थी। अब वह भलाई की इच्छा करने या परमेश्वर को चुनने के लिए स्वतन्त्र नहीं रही। पतन के बाद, हमारी इच्छा दासत्व की अवस्था में है। अब उसमें केवल पाप करने की ही क्षमता शेष रह गई है। इस स्थिति से स्वयं को मुक्त करने के लिए मनुष्य कुछ भी करने में समर्थ नहीं है। केवल ख्रीष्ट ही हमारा उद्धार कर सकता है। यही वह स्थान है जहाँ ऑगस्टीन के धर्मसिद्धान्त में अनुग्रह की बात आती है।
यह ध्यान देना महत्वपूर्ण है कि अनुग्रह के विषय में ऑगस्टीन क्या कहते हैं, क्योंकि धर्मसुधारक ईश्वरविज्ञानियों ने उनके कुछ तत्वों से सहमति तथा कुछ तत्वों से असहमति व्यक्त की। वे ऑगस्टीन की मूल पेलाजियन-विरोधी (anti-Pelagian) दृष्टिकोण से सहमत थे। वे मूल पाप और उसके परिणामस्वरूप मनुष्य की अपने आप को उद्धार करने में असमर्थता के धर्मसिद्धान्त से भी सहमत थे (देखें: वेस्टमिन्स्टर विश्वास अंगीकार, 6)। वे इस बात पर भी सहमत थे कि पापी मनुष्य को उद्धार के लिए परमेश्वर की आवश्यकता है। किन्तु असहमति का विषय क्या था? ऑगस्टीन ने यह सिखाया कि अनुग्रह परमेश्वर का वरदान है, जिसे मनुष्य अपने कार्यों से अर्जित नहीं कर सकता है। परन्तु ऑगस्टीन ने कभी-कभी नव-अफलातूनवाद (neo-Platonism) से प्रभावित शब्दों में अनुग्रह के विषय में बात की, जिसका अर्थ यह था कि अस्तित्व की एक प्रकार की क्रमिक सीढ़ी है, जिसके माध्यम से मनुष्य परमेश्वर की ओर आरोहण करता है। इसके विपरीत, धर्मसुधारक अनुग्रह को केवल और केवल परमेश्वर का अयोग्य उपकार के रूप में समझते हैं।
ऑगस्टीन के पाप और अनुग्रह के धर्मसिद्धान्तों ने विवाद के अर्ध-पेलाजियन चरण (semi-Pelagian stage) के समय उसके पूर्वनिर्धारण और अटलता के धर्मसिद्धान्तों के विकास को गहराई से प्रभावित किया। ऑगस्टीन के अनुसार, पूर्वनिर्धारण किसी भी मनुष्य में पहले से देखे गए गुणों या योग्यताओं पर आधारित नहीं था। पूर्वनिर्धारण पूरी रीति से परमेश्वर की सम्प्रभुता दया आधारित थी। इसके अतिरिक्त, ऑगस्टीन के अनुसार, जो लोग अनन्त उद्धार के लिए पूर्वनिर्धारित किए गए हैं, उन्हें अन्त तक विश्वास में बने रहने का वरदान भी दिया जाता है।
धर्मसुधारवादी ईश्वरविज्ञानियों ने अपने पूर्वनिर्धारण के सिद्धान्त में ऑगस्टीन का निकटता से अनुकरण किया, किन्तु एक महत्वपूर्ण विषय पर वे उनसे भिन्न थे। यह भिन्नता प्राय: प्रोटेस्टेन्ट मसीही ऑगस्टीन को पढ़ते हैं तो वे इस अन्तर पर सदैव ध्यान नहीं देते, किन्तु यह अति महत्वपूर्ण है। धर्मसुधारवादी ईश्वरविज्ञानी इस विचार से ऑगस्टीन के साथ पूर्णत: सहमत थे कि सभी पूर्वनिर्धारित लोगों को अन्त तक स्थिर बने रहने का वरदान प्रदान किया जाता है। किन्तु, वे इस प्रश्न पर ऑगस्टीन से असहमत थे कि क्या इस जीवन में विश्वासियों को इस बात की निश्चयता हो सकती है कि उन्हें अन्त तक स्थिर बने रहने वरदान प्राप्त है। ऑगस्टीन के अनुसार, जो भी उद्धार के लिए पूर्वनिर्धारित हैं, उन्हें अन्त तक स्थिर बने रहने का वरदान प्रदान किया जाता है, और परमेश्वर भली-भाँति जानता है कि यह वरदान किसे प्राप्त है। किन्तु कोई भी व्यक्तिगत विश्वासी इस बात के विषय में निश्चित नहीं हो सकता कि उसे अन्त तक स्थिर बने रहने का यह वरदान मिला है, जब तक कि वह वास्तव में अन्त तक स्थिर न बना रहे। केवल अन्त तक स्थिर बने रहने के पश्चात ही कोई व्यक्ति यह जान सकता है कि उसे यह वरदान प्राप्त हुआ है।
कलीसिया के लिए ऑगस्टीन द्वारा किया गया एक और महत्वपूर्ण तथा सकारात्मक योगदान उसकी पुस्तक On the Trinity (ऑन द ट्रीनिटी) है। यद्यपि हाल के सभी मसीही विचार-इतिहासकार इस मूल्यांकन से सहमत नहीं रहे हैं। कई वर्षों तक, ऑगस्टीन के त्रिएकता सम्बन्धी ईश्वरविज्ञान को विकृत रूप में प्रस्तुत किया गया और उसे कप्पदूकियाई पिताओं (Cappadocian fathers) की यूनानी त्रिएकता ईश्वरविज्ञान के विरोध में समझा गया। ऑगस्टीन की तथाकथित “पश्चिमी” त्रिएकतावाद को एक अधिक व्यक्तिवादी “पूर्वी” त्रिएकतावाद के विपरीत माना गया। किन्तु On the Trinity (ऑन द ट्रीनिटी) का हाल के वर्षों में किया गया अधिक सावधानीपूर्ण अध्ययन इन सभी विकृत धारणाओं को उजागर किया है और यह स्पष्ट रूप से दिखाया गया है कि ऑगस्टीन नीकिया के विश्वास वचन (Nicene Creed) में पाया जाने वाला त्रिएकता के धर्मसिद्धान्त के समर्थक थे। ऑगस्टीन के त्रिएकता सम्बन्धी धर्मसिद्धान्त में ऐसा कुछ भी विशेष या नया नहीं है, केवल इसके कि उन्होंने उसे स्पष्ट करने के उद्देश्य से कुछ मनोवैज्ञानिक उपमाओं (psychological analogies) का उपयोग किया। इन उपमाओं की उपयोगिता कितनी सहायक है, यह प्रश्न आज भी विद्वानों के बीच विवाद का विषय बना हुआ है।
इस विषय पर लिखे गए किसी लेख में यदि हम ऑगस्टीन की महान कार्य द सिटी ऑफ़ गॉड (The City of God) द्वारा किए गए सकारात्मक योगदान का संक्षिप्त उल्लेख न करें, तो यह एक गम्भीर चूक होगी। यह विशाल लेख दस वर्षो से भी अधिक समय की अवधि में लिखा गया था और रोम पर विसिगोथों (Visigoths) के आक्रमण की पृष्ठभूमि में रचा गया। उस समय अनेक रोमी इस विनाश के लिए मसीही धर्म को दोषी ठहरा रहे थे, और द सिटी ऑफ़ गॉड में ऑगस्टीन ने इन आरोपों का उत्तर दिया। यह कार्य मसीही आपत्तिखण्डनशास्त्र (apologetics) और ईश्वरविज्ञान की महान् कार्यों में से एक मानी जाती है। इस पुस्तक के प्रथम भाग (पुस्तकें 1–10) में ऑगस्टीन मसीही धर्म के विरुद्ध मूर्तिपूजक रोमी द्वारा प्रस्तुत तर्कों का खण्डन करते हैं और साथ ही अनेक मूर्तिपूजक सिद्धान्तों का भी प्रभावशाली प्रत्युत्तर देते हैं। द्वितीय भाग (पुस्तकें 11–22) में वे मसीही विश्वास की सकारात्मक बचाव प्रस्तुत करते हैं। इस कार्य के माध्यम से आगे बढ़ते हुए, ऑगस्टीन सम्भवत: प्रत्येक सम्भावित विषय को प्रभावी रीति से स्पर्श करते हैं। यद्यपि यह पुस्तक विस्तृत और दीर्घ है, फिर भी इसमें लगाया गया समय पूर्णतः सार्थक सिद्ध होता है। मैं टेबलटॉक के किसी भी ऐसे पाठक को, जिसने अब तक इसे नहीं पढ़ा है, प्रोत्साहित करता हूँ कि वह इस पुस्तक को “उठाए और पढ़े।”
ऑगस्टीन एक विश्वासयोग्य मसीही ईश्वरविज्ञानी थे, और परख सहित अध्ययन किए जाने पर उनकी लेखनी आज भी मसीहियों के लिए एक मूल्यवान ईश्वरविज्ञानी संसाधन बनी हुई हैं।
यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

