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नीतिवचन

The Proverbs

संयुक्त राज्य अमेरिका में आजकल बुद्धि किसी उद्योग के समान हो गई है। वार्ता-रेडियो के प्रस्तुतकर्ता और व्यापक रूप से प्रकाशित स्तम्भकार परामर्श चाहने वालों का एक समर्पित वर्ग तैयार कर लेते हैं। व्यावसायिक परामर्शदाता सभी आकार की कम्पनियों को जटिल समस्याओं को सुलझाने में सहायता करते हैं।

मानवजाति की युगों-पुरानी बुद्धि को खोजने की दीर्घ यात्रा आज भी चल रही है। मसीहीयों के रूप में हम जानते हैं कि बुद्धि परमेश्वर का एक वरदान है, जो मुख्य रूप से पवित्र शास्त्र के पन्नों में पाई जाती है। पुराने नियम में, सुलैमान के नीतिवचन की पुस्तक बुद्धि पाने का प्रमुख स्थान है, और इसलिए हमारे लिए यह लाभदायक होगा कि हम देखें कि इस पुस्तक की शिक्षा को हम सही रीति से कैसे समझें और लागू करें।

बुद्धि क्या है?

पवित्र आत्मा ने बुद्धि प्राप्त करने में हमारी सहायता के लिए नीतिवचन को प्रेरित किया (नीतिवचन 1:2), इसलिए इस पुस्तक को समझने के लिए हमें बुद्धि के स्वरूप को जानना आवश्यक है। सरल शब्दों में, बुद्धि “कौशल” या “निपुणता” है। बुद्धिमान लोग जीवन को भली-भाँति जीते हैं; वे सामान्य कठिनाइयों से बचते हैं और अन्य समस्याओं को सूझ-बूझ के साथ सँभालते हैं। अनेक छोटे जीव के समान, बुद्धिमान पुरुष और स्त्रियाँ भी अपनी सीमाओं के बावजूद अपने क्षेत्र में दक्षता दिखाते हैं (नीतिवचन 30:24–28)।

नीतिवचन के अनुसार, बुद्धि की जड़ “यहोवा के भय” में है (1:7), जो उन लोगों की पहचान है जो उसकी व्यवस्था का पालन करते हैं (भजन 34:11–16; प्रेरितों के काम 5:29)। यहोवा के भय में एक बौद्धिक पक्ष भी है: हमें उसकी आज्ञाओं का अध्ययन करना और उन्हें स्मरण रखना चाहिए, जिससे कि हम उसकी इच्छा को जानें और उसके अनुसार चलें (व्यवस्थाविवरण 6:4–9)। किन्तु यहोवा का भय केवल बौद्धिक बात ही नहीं है; यह एक भावनात्मक प्रत्युत्तर भी है पिता के प्रति प्रेम की, और उसकी आज्ञाओं के प्रति भरोसेमन्द आज्ञाकारिता की (मरकुस 10:28–31; याकूब 2:14–26; 1 यूहन्ना 4:16)। शैतान पवित्र शास्त्र का उद्धरण दे सकता है, परन्तु वह यहोवा से प्रेम नहीं करता, और इसलिए मूर्खतापूर्वक उसके विरुद्ध विद्रोह करता है (मत्ती 4:1–11)। यीशु धनी मनुष्य को “मूर्ख” कहता है, क्योंकि उसे अपने सृष्टिकर्ता की कोई चिन्ता नहीं थी—यह इसलिए नहीं कि उसके जीवन में बुद्धि बिल्कुल ही नहीं थी (लूका 12:13–21)।

नीतिवचन की पुस्तक में बुद्धि, धार्मिकता के लगभग समानार्थी के रूप में प्रस्तुत की गई है—प्रस्तावना हमें बताती है कि ये नीतिवचन बुद्धि और धार्मिकता के लिए दिए गए हैं (नीतिवचन 1:3)। बुद्धिमानी की शिक्षा और धार्मिक जीवन जीवन को उत्पन्न करते हैं (नीतिवचन 12:28; नीतिवचन 13:14), परन्तु अधर्मी व्यक्ति और मूर्ख मृत्यु की ओर ले जाने वाले चौड़े मार्ग पर भटकते रहते हैं (नीतिवचन 10:14; नीतिवचन 11:7)। यह स्पष्ट है कि पवित्रता के बिना हम बुद्धिमान नहीं हो सकते, और यदि हम बुद्धि को नहीं खोजते, तो हम पवित्र भी नहीं हो सकते (देखें मत्ती 6:33)।

नीतिवचन अन्य बाइबल की पुस्तकों का पूरक है, क्योंकि वह हमें यह स्मरण कराता है कि सामान्य, प्रतिदिन का जीवन भी हमारे सृष्टिकर्ता की महान् सेवा का अवसर है। हम में से अधिकांश लोग न तो भू-राजनीतिक प्रभाव रखेंगे और न ही कलीसिया की दिशा को नियंत्रित करेंगे। फिर भी, प्रभु हमारे जीवन की गहरी चिन्ता करता है और हमारे सभी कार्यों पर सावधानी से दृष्टि रखता है (नीतिवचन 5:21)। नीतिवचन हमें इस विस्मयकारी वास्तविकता का स्मरण कराता है और हमें ठोस रीति से दिखाता है कि हम परमेश्वर की व्यवस्था का पालन कैसे कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, यदि हम अपनी जवानी की पत्नी (या पति) में आनन्दित हों (पद 15–20), तो हम अपने जीवन-साथी के साथ भावनात्मक और वैवाहिक सम्बन्ध को सम्मान देने और उसे उत्सव के समान मनाने के उपाय खोजेंगे, और इस प्रकार हम अपनी विवाह-प्रतिज्ञाओं का उल्लंघन करने की ओर कम झुकाव रखेंगे।

ऐसे भाग हमें यह स्मरण कराते हैं कि प्रभु “साधारण” लोगों के बीच के सम्बन्धों को भी पवित्र करता है। हम “एकाकी मसीही” नहीं हैं; हमें अन्य विश्वासियों के साथ समुदाय में जीवन जीना चाहिए। नीतिवचन की अनेक प्रोत्साहनाओं को पूरा करना, जैसे पापों को स्वीकार करना (उदाहरण के लिए, नीतिवचन 28:13), इसका अर्थ है कि हम परमेश्वर के सामने और दूसरों के सामने भी सच्चे और स्पष्ट रहें। बुद्धिमान लोग ऐसे मसीहीयों को खोजते हैं जिनके सामने वे धार्मिकता के विषय में जवाबदेह हो सकें। वे ऐसी कलीसियाएँ खोजते हैं जहाँ पापों को स्वस्थ रीति से स्वीकार किया जाता है और जहाँ विश्वासी एक-दूसरे के भार को उठाते हैं (गलातियों 6:2)। जो लोग ईश्वरभक्त मित्रों की बात सुने बिना निर्णय लेते हैं, वे मूर्ख हैं (नीतिवचन 15:22)। पाश्चात्य व्यक्तिवाद हमें सिखाता है कि हम अपने निर्णय स्वयं करें। परन्तु नीतिवचन हमें सिखाता है कि हम निजी जीवन नहीं जीते; केवल मूर्ख लोग परमेश्वर के लोगों के समुदाय में पाई जाने वाली पुरानी और परखी हुई बुद्धि को अनसुना करते हैं (नीतिवचन 1:8; नीतिवचन 4:1–6; नीतिवचन 24:6)।

नीतिवचन को कैसे पढ़ें

इस पुस्तक को प्रार्थनापूर्वक पढ़ना बुद्धिमान बनने की कुँजी है (याकूब 1:5)। परन्तु अन्य साहित्य के समान, नीतिवचन की सही व्याख्या सुनिश्चित करने के लिए हमें इसकी साहित्यिक शैली और पृष्ठभूमि पर भी ध्यान देना चाहिए। जिससे कि हम इन बुद्धिमानी की उक्तियों का त्रुटिपूर्ण उपयोग न करें, इसके लिए चार सिद्धान्त स्मरण रखें:

एक ही नीतिवचन इस जीवन की प्रत्येक परिस्थिति के लिए नहीं होता है। हम यह अपेक्षा नहीं करते कि कोई भी मानव-निर्मित कहावत हर समय लागू हो। यही सिद्धान्त पवित्र आत्मा से प्रेरित सुलैमान के नीतिवचनों पर भी लागू होता है। डॉ० आर. सी. स्प्रोल इस बात को स्पष्ट करने के लिए कहावतों “कूदने से पहले देख लो” और “जो हिचकता है वह हार जाता है” का उपयोग करते हैं। कुछ अवसरों पर निर्णय लेने से पहले सावधानी से चलना आवश्यक होता है—जैसे जीवन-साथी चुनना। किन्तु अन्य समयों पर हिचकिचाहट मूर्खता होती है। उदाहरण के लिए, हम कभी रुककर यह नहीं सोचते कि हमें अपने दो वर्ष के बच्चे को अकेले सड़क पार करने से रोकना चाहिए या नहीं। इसी प्रकार, यदि हम यह अपेक्षा करेंगे कि सुलैमान का कोई एक नीतिवचन हर स्थिति में सत्य सिद्ध होगा, तो हम निराश और भ्रमित होंगे। किसी मूर्ख को उसकी मूर्खता के अनुसार उत्तर देना चाहिए या नहीं (नीतिवचन 26:4–5), यह इस पर निर्भर करता है कि हम किस व्यक्ति से व्यवहार कर रहे हैं।

जिस समस्या का सामना कर रहे हैं, उसका गहनता से परीक्षण करें। गिनती 35:9–28 में हर प्रकार की हत्या के लिए मृत्युदण्ड की आज्ञा नहीं दी गई थी; यह केवल पूर्वनियोजित हत्या के लिए था। उचित दण्ड निर्धारित करने के लिए अधिकारियों को यह जाँच करनी होती थी कि अपराध योजनाबद्ध था या नहीं। परमेश्वर के नीतिवचनों और व्यवस्थाओं का सही उपयोग करने के लिए उन परिस्थितियों का ज्ञान आवश्यक है जिन पर उन्हें लागू किया जाना है।

जब आप किसी एक नीतिवचन को पढ़ें, तो सभी नीतिवचनों को ध्यान में रखें। सन्दर्भ अत्यन्त महत्वपूर्ण है—किसी एक नीतिवचन की सही व्याख्या तभी होती है जब उसे अन्य नीतिवचनों के प्रकाश में समझा जाए। सभी नीतिवचन हमारे होठों पर तैयार रहने चाहिए (नीतिवचन 22:17–18)। “लड़के को उसी मार्ग पर शिक्षा दे जिस पर उसे चलना चाहिए; और वह बुढ़ापे में भी उससे न हटेगा” (पद 6) हमें यह बताता है कि ईश्वरभक्त माता-पिता प्रायः ईश्वरभक्त सन्तानें उत्पन्न करते हैं। परन्तु यदि सन्तान को सीधे मार्ग पर बना रहना है, तो नीतिवचन की अन्य धारणाएँ भी पूरी होनी चाहिए। सन्तानों को अपने माता-पिता और प्राचीनों की ईश्वरभक्तिपूर्ण बुद्धि को मानना चाहिए और उनके हृदय परमेश्वर की ओर झुके होने चाहिए, तभी वे विश्वासयोग्य बने रहेंगे (नीतिवचन 1:8–9, 32–33; 3:5–6; 7:1–3)। यदि हम अन्य नीतिवचनों की उपेक्षा करें, तो हम “लड़के को शिक्षा दे” को अनुचित रीति से पकड़ सकते हैं और यह मान सकते हैं कि सोच-समझकर और विचारशील मसीही घर में सन्तानों का पालन-पोषण करना अनिवार्य रूप से यह अर्थ रखता है कि वे सन्तानें विश्वास में आ ही जाएँगी। नीतिवचन के सन्दर्भ को स्मरण रखना हमें इस बात के लिए प्रेरित करता है कि विश्वास में पले-बढ़े लोगों की बड़े होने पर भी शिष्योन्नति करते रहें, क्योंकि हम जानते हैं कि बहुत पहले सुनी गई शिक्षा आज यदि त्याग दी जाए, तो उसका कोई लाभ नहीं होता। इसके अतिरिक्त, जब हम “लड़के को शिक्षा दे” को अन्य सभी नीतिवचनों के प्रकाश में पढ़ते हैं, तो हम इसका उपयोग अधार्मिक सन्तानों वाले माता-पिता के पालन-पोषण के कौशल को स्वतः दोषी ठहराने के लिए नहीं करेंगे। सम्पूर्ण नीतिवचन, और पूरी बाइबल, हमें दिखाती है कि विश्वासयोग्य माता-पिता से भी कभी-कभी अविश्वासी सन्तानें उत्पन्न होती हैं। यहाँ तक कि वे पिता और माता भी, जो अपने छोटे बच्चों को लगन से परमेश्वर का वचन सिखाते हैं (व्यवस्थाविवरण 6:4–9), पत्थर के हृदय को माँस के हृदय में नहीं परिवर्तित कर सकते हैं।

अन्त को दृष्टि में रखें। अनेक नीतिवचन प्रभु के लोगों के लिए सफलता का संकेत देते हैं, और वास्तव में धर्मी जीवन जीने वाले लोग प्रायः कठिनाइयों से बचते हैं और दूसरों के साथ शान्ति से रहते हैं (नीतिवचन 12:21; 16:7)। फिर भी, यद्यपि पवित्र पुरुष और स्त्रियाँ अक्सर “धन और आदर और जीवन” पाते हैं (नीतिवचन 22:4), हम सब ऐसे विश्वासयोग्य सेवकों को जानते हैं जो दुःख उठाते हैं। नीतिवचन इस वास्तविकता को भी स्वीकार करता है। परमेश्वर का भय मानते हुए भी निर्धनता में जीवन बिताना सम्भव है (नीतिवचन 15:16; 19:1)। ऐसे समय भी आते हैं जब दुष्टता सांसारिक धन ले आती है (नीतिवचन 10:2क)। यदि हम इन सत्यों को भूल जाएँ और ईश्वरभक्तों के लिए सफलता बताने वाले नीतिवचनों को पूर्ण और निरपेक्ष प्रतिज्ञाएँ मान लें, तो जब अनुभव वास्तविकता से मेल नहीं खाएगा तब हम निराश हो जाएँगे। हम अय्यूब के मित्रों के समान भी बन सकते हैं, जिन्होंने त्रुटिपूर्ण रूप से यह समझ लिया कि उसकी विपत्तियाँ यह प्रमाण हैं कि वह किसी पाप का दोषी था।

तथापि यह तथ्य कि नीतिवचन इस वर्तमान जीवन के लिए स्वचालित प्रतिज्ञाएँ नहीं हैं, इसका अर्थ यह नहीं है कि धर्मियों के लिए अन्तिम सफलता की कोई सुनिश्चितता नहीं है। प्रभु के न्याय के विषय में पवित्रशास्त्र की साक्षी (उत्पत्ति 18:25; प्रकाशितवाक्य 16:5) उस समय की ओर संकेत करती है जब परमेश्वर के लोग निर्दोष ठहराए जाएँगे और दुष्टों का विनाश होगा। परमेश्वर के लिए न्याय को स्थिर रखने का अर्थ यह है कि उसे अपने पवित्र जनों के साथ किए गए अन्यायों को कब्र के पार के जीवन में ठीक करना होगा। यह आशा नीतिवचन में धुँधली रूप से दिखाई देती है (देखें नीतिवचन 10:2ब, 25; 11:21; 16:4),प्रत्यक्ष शिक्षा नहीं वरन् एक अनिवार्य परिणाम के रूप में प्रस्तुत है। फिर भी, धर्मियों के लिए महान् आशीष की ओर संकेत करने वाले नीतिवचन अन्ततः सत्य सिद्ध होंगे; इसलिए हम उस दिन की बाट जोहते हैं (दानिय्येल 12:1–3; प्रकाशितवाक्य 20:11–15)।

नीतिवचन और ख्रीष्ट

जीवन के बाद के जीवन की ओर संकेत करते हुए, नीतिवचन उसकी अग्रिम झलक देता है जो धर्मियों को निर्दोष ठहराएगा और उनकी सेवा का प्रतिफल देगा। यदि करुणा और धार्मिकता राजा को सुरक्षित रखती हैं (नीतिवचन 20:28), तो केवल वही शासक जो इन गुणों को पूर्ण रूप से धारण करता है, पवित्र जनों को निर्दोष ठहराने वाला ठहर सकता है। यह मसीहा प्रभु यीशु ख्रीष्ट है, जिसने न केवल नीतिवचन की बुद्धि के प्रति पूर्ण रूप से अधीनता दिखाई, वरन् वह स्वयं ही परमेश्वर की बुद्धि है (1 कुरिन्थियों 1:24)। सुलैमान अन्ततः मूर्ख सिद्ध हुआ (1 राजा 11), परन्तु यीशु सदा परमेश्वर का भय मानता रहा और बुराई से दूर रहा (नीतिवचन 3:7; 1 पतरस 2:22)। यदि हम नीतिवचन को उसकी शिक्षा के पूर्ण प्रकाश में पढ़ें और उसके उपदेशों के अधीन हों, तो हम परमेश्वर की महिमा के लिए बुद्धिमानी से जीवन व्यतीत करेंगे।

 यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

रॉर्बट रॉथवेल
रॉर्बट रॉथवेल
रेव रॉबर्ट रोथवेल लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ के वरिष्ठ लेखक, टैबलेटटॉक पत्रिका के एसोसिएट एडिटर, रिफॉर्मेशन बाइबिल कॉलेज में रेजिडेंट एडजंक्ट प्रोफेसर और पोर्ट ऑरेंज, फ्लोरिडा में स्प्रूस क्रीक प्रेस्बिटेरियन चर्च के एसोसिएट पास्टर हैं।