
बच्चे के खोने में परमेश्वर की सान्त्वना
31 मार्च 2026
क्या मनुष्य का स्वभाव मूलतः अच्छा है या पूर्णतः पापमय है?
9 अप्रैल 20263 बातें जो आपको योएल के विषय में जाननी चाहिए
अधिकांश लोगों को योएल की पुस्तक के विषय में जो बात पता है, वह है योएल 2:28-29 की वह महान् भविष्यवाणी, जिसमें परमेश्वर यह प्रतिज्ञा करता है कि वे अपनी आत्मा सभी लोग पर उण्डेलेगा जिससे कि परमेश्वर की प्रजा के सभी सदस्य भविष्यवाणी करेंगे। परन्तु इन पदों का अर्थ तब तक ठीक से नहीं समझा जा सकता जब तक हम पूरी पुस्तक के सन्देश को न समझें। यहाँ योएल की पुस्तक के विषय में तीन बातें हैं जो आपको इसके सन्देश को समझने में सहायता करेंगी।
1. योएल की पुस्तक की तिथि निश्चित नहीं है।
सबसे पहले, यद्यपि अधिकांश भविष्यद्वक्ताओं की पुस्तकों का ऐतिहासिक सन्दर्भ उनके सन्देश को समझने में महत्वपूर्ण होता है, योएल की पुस्तक की तिथि निश्चित नहीं है। मन्दिर कार्यरत था, जिससे यह संकेत मिलता है कि यह या तो सुलैमान का पूर्व-निर्वासन मन्दिर हो सकता है (जो 586 ईसा पूर्व में नष्ट हुआ), या फिर निर्वासन के बाद पुनः समर्पित किया गया मन्दिर (516 ईसा पूर्व)। किसी राजा का उल्लेख नहीं मिलता, और न ही इस्राएल या यहूदा के प्रमुख शत्रुओं का नाम लिया गया है। विद्वानों ने इसकी तिथि के विषय में विभिन्न मत प्रस्तुत किए हैं, परन्तु कोई एक तिथि सर्वमान्य नहीं हुई है। यह पुस्तक ऐसे दृष्टिकोण को प्रकट करती प्रतीत होती है जो निर्वासन से पूर्व का है, और जो पहले मन्दिर के विनाश से सम्बन्धित घटनाओं से जुड़ा हुआ है, जैसे कि बलिदान चढ़ाना बंद कर दिया जाना (योएल 1:9), उत्तर दिशा से आने वाली सेना से धमकी (योएल 2:20), और भविष्य में छुटकारा मिलने का वर्णन (योएल 2:23–29)। कुछ लोगों का विचार है कि पुस्तक की तिथि निर्धारित करना कठिन इसलिए है क्योंकि यह राष्ट्रीय आपदा के समय में बार-बार पढ़े जाने वाला एक आराधनात्मक पाठ बन गई थी।
2. इस पुस्तक की पृष्ठभूमि टिड्डियों की विपत्ति है।
दूसरी बात जो आपको योएल की पुस्तक के विषय में पता होनी चाहिए, वह यह है कि पुस्तक का अवसर पुस्तक के सन्देश से गहराई से जुड़ा है। इस पुस्तक की पृष्ठभूमि टिड्डियों की एक भीषण विपत्ति है। पहला अध्याय एक सामूहिक विलाप के लिए बुलावा है, क्योंकि यह विपत्ति इतनी भयंकर थी कि इससे पहले ऐसा कभी नहीं हुआ था। इस विपत्ति के विषय में योएल 1:4 में बताया गया है, जहाँ टिड्डियों के झुण्ड ने खाने योग्य सबकुछ समाप्त कर दिया है। इसके परिणामस्वरूप अलग-अलग समूह को शोक मनाने के लिए बुलाया गया है: शराबियों को शोक मनाना है क्योंकि दाखमधु समाप्त हो गई हैं (योएल 1:5–7), याजको को शोक मनाना है क्योंकि बलिदान समाप्त हो गया है (योएल 1:8–10), और किसानों को शोक मनाना है क्योंकि फसल नहीं होगी (योएल 1:11–12)। याजकों को यह भी बुलाया गया कि वे रोने और उपवास के द्वारा एक सामूहिक शोक सभा का अगुवाई करें (योएल 1:13–14)।
यह टिड्डियों की विपत्ति प्रभु के दिन के वर्णन का चित्र बन जाती है। यह उन लोगों के लिए न्याय का दिन होगा जो परमेश्वर को नहीं मानते और उन लोगों के लिए आशीष का दिन होगा जो परमेश्वर के पास लौटते हैं। यह विपत्ति आने वाले न्याय की पूर्वछाया है, जिसका उल्लेख सबसे पहले योएल 1:15 में किया गया है:
हाय उस दिन के कारण, हाय!
यहोवा का दिन निकट है।
उस दिन के विनाश का वर्णन योएल 1:16–20 में किया गया है, और योएल 2:1–2 में एक तीव्र चेतावनी के साथ यह चरम पर पहुँचता है, जहाँ उस “दिन” के स्वरूप को “अन्धकार और घोर अन्धियारे का दिन” तथा “बादलों और घने अन्धकार का दिन” बताया गया है। यह अन्धकार पर्वतों पर फैल जाता है और एक महान् तथा सामर्थी सेना की ओर संकेत करता है, जो युद्ध के लिए सुसज्जित है और जिसके योद्धाओं को कोई रोक नहीं सकता। लोग इस सेना का सामना करने के विषय में सोचकर ही व्याकुल हो उठते हैं, क्योंकि यह पृथ्वी की सेना से कहीं अधिक है; यह प्रभु की सेना है। प्रभु इस सेना और सृष्टि के सामने अपनी वाणी सुनाता हैं और सारी सृष्टि काँप उठती है और सूर्य और चन्द्रमा अन्धकारमय हो जाते हैं (योएल 2:10–11)। कोई भी इसे सह नहीं सकता क्योंकि “यहोवा का दिन बड़ा और अति भयानक है” (योएल 2:11)।
योएल की पुस्तक में, प्रभु का दिन केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं है; यह एक युगान्तकालीन घटना का वर्णन करता है जो इतिहास को उसके अन्त पर लाती है। योएल इस आने वाले न्याय और विनाश के माध्यम से परमेश्वर की प्रजा को मन फिराने के लिए बुलाता है (योएल 2:15–17)। वह उन्हें टिड्डियों की विपत्ति से हुए विनाश के उलट भौतिक आशीषों की प्रतिज्ञा करता है (योएल 2:21–27) और साथ ही उन आत्मिक आशीषों की भी, जो उसकी पवित्र आत्मा के उण्डेले जाने से प्राप्त होंगी (योएल 2:28–32)।
3. प्रेरित पतरस ने पिन्तेकुस्त के दिन की घटनाओं को समझाने के लिए योएल को उद्धरित किया।
तीसरी बात जो आपको इस पुस्तक के विषय में पता होनी चाहिए, वह यह है कि पतरस ने पिन्तेकुस्त के दिन की घटनाओं को समझाने के लिए प्रेरितों के काम 2:17–21 में योएल 2:28–32 को उद्धरित किया है। योएल द्वारा भविष्यद्वाणी की गई आत्मिक आशीषें उस समय पूरी हो रही थीं, जब परमेश्वर ने अपनी आत्मा सब मनुष्यों पर उण्डेली, ताकि जो कोई प्रभु का नाम ले, वह उद्धार पाए।
इसके अतिरिक्त, परमेश्वर के वचन को बोलने की भविष्यवाणी की सेवा समाज के सभी वर्गों तक फैल गई, जिसमें गैर-यहूदी भी सम्मिलित थे, जो आत्मा के द्वारा सामर्थ्य पाकर अपनी-अपनी भाषाओं में एक-दूसरे से समझ के साथ बातें कर रहे थे (प्रेरितों के काम 2:4)। उस समय परमेश्वर के शत्रुओं पर अन्तिम न्याय (योएल 3:1–8) और उसकी प्रजा की पूर्ण पुनर्स्थापना (योएल 3:17–21) घटित होने के स्थान पर , परमेश्वर की उद्धार की योजना यीशु ख्रीष्ट के सुसमाचार के समस्त संसार में प्रचार के माध्यम से आगे बढ़ रही थी। इसके परिणामस्वरूप, हमने यीशु ख्रीष्ट में अपने उद्धार का बयाना प्राप्त किया है। हम अपने उद्धार की पूर्णता की प्रतिक्षा कर रहे हैं, जब हमारा उद्धारकर्ता इस संसार में लौटेगा यहोवा के दिन को पूरा करेगा अर्थात् अपने शत्रुओं का अन्तिम न्याय करेगा और अपनी प्रजा को पूर्ण रूप से पुनर्स्थापित करेगा। उस समय, हम अनन्तकाल तक उसकी पूर्ण उपस्थिति और उसकी उपस्थिति से मिलने वाली प्रचुर आत्मिक तथा शारीरिक आशीषों का अनुभव करेंगे।
यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

