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मसीहियों को स्वर्ग से पहले स्वास्थ्य, समृद्धि और खुशी की प्रतिज्ञा नहीं की गई है। इस पतित संसार में जीवन की दुखद सच्चाई यह है कि हम सभी विभिन्न प्रकार की हानियों से होकर जाएँगे: हमारा स्वास्थ्य, व्यावसाय, सम्बन्ध, या, सबसे बुरा, हमारे किसी प्रिय व्यक्ति को खोना। जब हम इन बातों का अनुभव करते हैं, तो हानि को छोड़कर कुछ भी देखना कठिन हो सकता है। हमारा दुःख इतना भारी हो सकता है कि शेष सब कुछ उसके द्वारा निगल लिया जाता है, यहाँ तक कि पवित्रशास्त्र की जीवन देने वाली सच्चाइयाँ भी।
मैंने इसे तब अनुभव किया जब मेरी बेटी लेला अपनी नियत दिन से एक सप्ताह पहले ही मृत पैदा हुई। मैं केवल अपनी हानि के विषय में ही पूरी रीति से सोचने लगी: मेरी बच्ची जिसे मैं चाहती थी, मर गई थी; मैं उसे खाना नहीं खिला पाऊँगी, कपड़े नहीं पहना पाऊँगी, या उसकी देखभाल नहीं कर पाऊँगी; मेरा बेटा, बेन, इकलौता बच्चा रह गया; मैं पुनः बाँझपन में डूब सकती थी; मेरी बेटी को कब्र में गाड़ दिया गया था; और मेरी आत्मा की आँखें एक के बाद एक भयानक सच्चाई देखती रहीं। परन्तु अपनी हानि और उसकी कई परतों को देखते हुए, मैंने उस एक जन को देखना बन्द कर दिया जो अकेले मेरे दुःख में सान्त्वना और मेरे अन्धेरे में ज्योति ला सकता था। संगीतकार हेलेन लेमेल मेरी निराशा से बाहर निकलने का मार्ग जानती थीं:
यीशु ख्रीष्ट को निहारो,
उसके प्रेम भरे मुख को देखो,
और संसार की बातें सब धूमिल होंगी,
उसकी सुन्दर दया के सामने।
जब मैंने अपनी आँखें यीशु की ओर लगाया, तो मेरे बच्चे का खोना भी धूमिल हुआ जैसे ही यीशु के प्रकाश ने अन्धकार को उज्जवल किया। उसको देखने से मैं पीड़ा के प्रति असंवेदनशील नहीं हुई, परन्तु मुझे पीड़ा के मध्य अवश्य अत्यन्त सान्त्वना मिली।
ध्यान देने वाला उद्धारकर्ता
अपनी बेटी के खोने के बाद जब मैं यीशु की और फिरी, तो मैंने एक ऐसा उद्धारकर्ता पाया जो दया से भरा हुआ था। सुसमाचारों में वर्णन है कि यीशु का हृदय उन दुखी लोगों के प्रति कितना कोमल था जिन्होंने अनेक प्रकार की हानि का अनुभव किया था। इसका एक अत्यन्त सुन्दर उदाहरण है जब कोढ़ से पीड़ित एक व्यक्ति ने यीशु से विनती की कि वे उसे शुद्ध कर दें। मरकुस अपने सुसमाचार में लिखता है: “[यीशु] ने उस पर तरस खाकर अपना हाथ बढ़ाया, और उसे छुकर उस से कहा, ‘मैं चाहता हूँ; तू शुद्ध हो जा’” (मरकुस 1:41)। यह व्यक्ति लैव्यव्यवस्था की व्यवस्था के अनुसार अशुद्ध था (लैव्यव्यवस्था 13), और इसलिए उससे बहिष्कृत के रूप में व्यावहार किया जाता था; वह सर्वदा दूसरों से शारीरिक दूरी बनाकर रखने के लिए बाध्य था। परन्तु यीशु ने, करुणा से भरकर, उस अलगाव की खाई को पार किया, अपना हाथ बढ़ाया और उसे छू लिया। कितना समय बीत गया होगा जब उस व्यक्ति ने किसी दूसरे मनुष्य का स्पर्श अनुभव किया होगा?
सुसमाचार हमें अनेक उदाहरण देते हैं जहाँ यीशु ने इस पतित संसार के बोझ और टूटेपन के दबाव में जी रहे लोगों के जीवन को स्पर्श किया। करुणा से प्रेरित होकर यीशु उस माँ के पास पहुँचा जिसका एकलौता पुत्र मर गया था (लूका 7:11–15), रोगियों के पास (मत्ती 14:14), भूखों के पास (मत्ती 15:32), अन्धों के पास (मत्ती 20:30–34), और सताए हुए तथा असहाय लोगों के पास (मत्ती 9:35–36)। जब हम इन विवरणों को देखते हैं, तो हमें ऐसा उद्धारकर्ता नहीं दिखाई देता जो पीड़ित लोगों के दुःख के प्रति भावना रहित हो, वरन् ऐसा उद्धारकर्ता दिखाई देता है जो करुणा से “अपना हाथ बढ़ाता है” और हमारी ओर झुकता है।
रोनेवाला उद्धारकर्ता
बाइबल के सबसे छोटे पद में सम्भवतः हम यीशु के कोमल हृदय को सबसे स्पष्ट रूप से देखते हैं: “यीशु रो पड़ा” (यूहन्ना 11:35)। जब वह शोक के उस घर में पहुँचा जहाँ उसका मित्र लाज़र मृत पड़ा था, तब यीशु ने केवल दिखावे के लिए एक आँसू नहीं बहाया—वह सचमुच रोया। यद्यपि वह जानता था कि वह शीघ्र ही लाज़र को जीवन में वापस बुलाने वाला है, फिर भी उसने गहरे दुःख और क्रोध की भावनाओं का अनुभव किया।
जब लेला मृत जन्मी हुई पैदा हुई, तब मैं पहले से कहीं अधिक रोई, परन्तु मुझे इस बात से सान्त्वना मिली कि मेरे उद्धारकर्ता ने भी मृत्यु के सामने आँसू बहाए थे। इस पद पर अपनी व्याख्या में जॉन काल्विन लिखते हैं, “वह हमारी विपत्तियों से उतना ही व्यथित होता है मानो उसने स्वयं उन्हें सहा हो।” आपके दुःख में और मेरे दुःख में, हमारा प्रभु यीशु हमारे शोक में आनन्द नहीं लेता। वह देहधारी वचन है जिसने अपने हृदय में शोक अनुभव किया और अपने गालों पर आँसू बहाए।
विजयी उद्धारकर्ता
यह जानना कि यीशु हमारी चिन्ता करता है और हमारे साथ रोता है, दुःख के समय में सान्त्वना देता है, परन्तु केवल इतना ही पर्याप्त नहीं है। यदि अन्त में वह हमारे लिए इन सब पर विजयी न हो, तो हमारे दुःख और पीड़ा में उसका हमारे साथ होने का क्या लाभ? यदि यीशु विजयी नहीं है, तो अन्ततः वह सान्त्वना देने वाला भी नहीं है। जब हम दुःख में होते हैं, तो हमें केवल एक सहानुभूति जताने वाले की आवश्यकता नहीं है—हमें एक उद्धारकर्ता की आवश्यकता है।
यीशु हमारी पीड़ा पर केवल पट्टी लगाने नहीं आया; वह हमारे सम्पूर्ण दुःख के मूल कारण—अर्थात, पाप तक पहुँचा। “उसने स्वयं अपनी ही देह में क्रूस पर हमारे पापों को उठा लिया,” जिससे कि वह पतन के शाप को उलट सके (1 पतरस 2:24)। पाप का अपने भद्दे दाग को सब कुछ के ऊपर डालने से पहले, कोई हानि नहीं थी। तब न रोना था, न निराशा, न टूटापन, न मृत्यु। जब यीशु ने लाज़र को मृत्यु से जीवन में बुलाया, तो वह हमें दिखा रहा था जो वह करने आया था: “कि मृत्यु के द्वारा उसको जिसे मृत्यु पर शक्ति मिली है, अर्थात् शैतान को, शक्तिहीन कर दे” (इब्रानियों 2:14)। क्योंकि ख्रीष्ट ने मृत्यु पर विजय पाई और तीसरे दिन जी उठा, उसने हमें आने वाले उस संसार की नई आशा दी जहाँ सब शोक और कराहना मिट जाएगा, जहाँ मृत्यु और हानि फिर कभी नहीं होंगी।
सान्त्वना देने वाला उद्धारकर्ता
जब मुझे पता चला कि लेला मेरे गर्भ में मर गई थी, तो मैं ऐसे शोक में डूब गई कि वह मुझे पूरी रीति से निगल जाने वाला था। परन्तु जब मैंने यीशु की ओर देखा, वह उद्धारकर्ता जो ध्यान देता है, रोता है, दुःख और पीड़ा और इस पाप के संसार में विजयी है, तो मुझे सान्त्वना मिली—जीवन और मृत्यु में मेरी एकमात्र सान्त्वना। जब मैंने अपनी दृष्टि उस पर लगया, तो मेरी हानि “उसकी सुन्दर दया के सामने विचित्र रीति से धूमिल” हो गई।
हे प्राण, क्या तू थका और व्याकुल?
अन्धेरा ही है चारों ओर?
यीशु ही है जगत की ज्योति,
वह देता है जीवन अनन्त।
यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

