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क्या कलीसिया पाखण्डियों से भरी हुई है?

Is the Church Full of Hypocrites?

लगभग तीस वर्ष पहले, मेरे घनिष्ठ मित्र और सहकर्मी आर्ची पैरिश, जो उस समय फोर्ट लॉडरडेल में इवेंजेलिज्म एक्सप्लोजन (Evangelism Explosion EE ईई) कार्यक्रम का नेतृत्व कर रहे थे, मेरे पास एक अनुरोध लेकर आए। उन्होंने बताया कि सुसमाचार प्रचार के लिए जब ईई की टीमें लोगों से मिलती थीं, तो वे उन उत्तरों का लेखा रखते थे जो लोग सुसमाचार की चर्चा के दौरान देते थे। उन्होंने उन प्रश्नों और आपत्तियों को संकलित किया जो लोग मसीही विश्वास के विषय में सबसे अधिक उठाते थे, और उन्हें दस प्रमुख आपत्तियों में वर्गीकृत किया। डॉ. पैरिश ने मुझसे अनुरोध किया कि मैं इन आपत्तियों का उत्तर देने के लिए एक पुस्तक लिखूँ, जिससे सुसमाचार प्रचारक अपने कार्य में उसका उपयोग कर सकें। इसी प्रयास के परिणामस्वरूप मेरी पुस्तक “ऑब्जेक्शन्स आंसर्ड” प्रकाशित हुई, जिसे अब “रीज़न टू बिलीव” कहा जाता है। उठाई गई शीर्ष दस आपत्तियों में से एक यह भी थी कि कलीसिया पाखंडियों से भरी हुई है। उस समय, डॉ. डी. जेम्स कैनेडी ने इस आपत्ति का उत्तर देते हुए कहा, “हाँ, वहाँ एक और के लिए हमेशा स्थान है।” उन्होंने लोगों को यह भी चेतावनी दी कि यदि उन्हें कोई पूर्ण कलीसिया मिल जाए, तो उन्हें उसमें सम्मिलित नहीं होना चाहिए, क्योंकि वे उसे भी अपूर्ण बना देंगे। 

​​पाखण्डी शब्द यूनानी नाट्य-जगत से आया है। इसका प्रयोग उन मुखौटों के लिए किया जाता था जिन्हें अभिनेता विभिन्न भूमिकाओं को नाटकीय रूप देने के लिए उपयोग करते थे। आज भी, नाट्यशाला को हास्य और त्रासदी के दोहरे मुखौटों द्वारा दर्शाया जाता है। प्राचीन काल में, कुछ अभिनेता एक से अधिक भूमिकाएँ निभाते थे, और वे अपने चेहरे के सामने मुखौटा पकड़कर यह दर्शाते थे कि वे कौन-सी भूमिका निभा रहे हैं।  यहीं से पाखण्ड की अवधारणा का उद्गम हुआ।

परन्तु यह आरोप कि कलीसिया पाखण्डियों से भरी है, स्पष्ट रूप से असत्य है। यद्यपि कोई भी मसीही इस जीवन में पूर्ण पवित्रीकरण को प्राप्त नहीं करता, और हम सभी निरन्तर पाप से संघर्ष करते हैं, फिर भी इससे यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं कि हम पाखण्डी हैं। पाखण्डी वह होता है जो ऐसे काम करता है जिनके बारे में वह कहता है कि वह नहीं करता। मसीही कलीसिया के बाहरी पर्यवेक्षक उन लोगों को देखते हैं जो स्वयं को मसीही कहते हैं और पाते हैं कि वे पाप करते हैं। वे मसीहयों के जीवन में पाप देखते हैं, इसलिए वे तुरन्त यह निष्कर्ष निकाल लेते हैं कि ये लोग पाखण्डी हैं। यदि कोई व्यक्ति पापरहित होने का दावा करता है और फिर पाप करता है, तो निश्चित रूप से वह पाखण्डी है। परन्तु किसी मसीही के लिए केवल यह साबित करना कि वह पापी है, उसे पाखण्डी नहीं बनाता।

उलटी तर्क-प्रणाली कुछ इस प्रकार चलती है: सभी पाखण्डी पापी होते हैं। यूहन्ना पापी है; इसलिए, यूहन्ना पाखण्डी है। तर्क के नियमों को जानने वाला कोई भी व्यक्ति जानता है कि यह तर्क मान्य नहीं है। यदि हम इस आरोप कि “कलीसिया पाखण्डियों से भरी हुई है” को बदलकर “कलीसिया पापियों से भरी हुई है” कर दें, तो हम तुरन्त अपना अपराध स्वीकार कर लेंगे। कलीसिया ही एकमात्र ऐसी संस्था है जिसके सदस्य बनने के लिए पापी होने की स्वीकारोक्ति आवश्यक है। कलीसिया पापियों से भरी हुई है क्योंकि कलीसिया वह स्थान है जहाँ पापी अपने पापों को स्वीकार करके उनसे मुक्ति पाने आते हैं। अतः, इस अर्थ में, केवल इसलिए कि कलीसिया पापियों से भरी है, यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है कि कलीसिया पाखण्डियों से भरी है। फिर से, सभी प्रकार का पाखण्ड पाप है, परन्तु सभी पाप पाखण्ड नहीं हैं।

जब हम नए नियम के समय में पाखण्ड की समस्या को देखते हैं, तो वह सबसे स्पष्ट रूप से उन लोगों के जीवन में दिखाई देती है जो स्वयं को सबसे अधिक धर्मी बताते थे। फरीसी ऐसे लोगों का समूह थे जो स्वयं को सामान्य लोगों की पापमयता से अलग समझते थे। उन्होंने अच्छा आरम्भ किया,  वे ईश्वर-भक्ति और परमेश्वर की व्यवस्था के प्रति समर्पण का जीवन जीने का प्रयास किया। परन्तु जब उनका व्यवहार उनके आदर्शों के अनुरूप नहीं रहा, तो उन्होंने ढोंग करना आरम्भ कर दिया। उन्होंने दिखावा किया कि वे वास्तव में जितने धर्मी थे, उससे कहीं अधिक धर्मी हैं। उन्होंने धार्मिकता का एक बाहरी मुखौटा पहन लिया, जो केवल उनके जीवन में व्याप्त घोर भ्रष्टाचार को छिपाने का काम करता था।

यद्यपि कलीसिया पाखण्डियों से भरी नहीं है, फिर भी इस बात को अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि पाखण्ड एक ऐसा पाप है जो केवल नए नियम के फरीसियों तक ही सीमित नहीं है। यह एक ऐसा पाप है जिससे मसीहियों को भी संघर्ष करना पड़ता है। कलीसिया के लिए आत्मिक और धार्मिक आचरण का उच्च मानदण्ड निर्धारित किया गया है। हम प्रायः इन उच्च लक्ष्यों को प्राप्त करने में अपनी असफलताओं से लज्जित होते हैं और यह दिखावा करने लगते हैं कि हम वास्तव में जितने धर्मी हैं उससे अधिक हैं। जब हम ऐसा करते हैं, तो हम पाखण्ड का मुखौटा पहन लेते हैं और उस विशेष पाप के लिए परमेश्वर के न्याय के भागी बन जाते हैं। जब हम स्वयं को इस प्रकार के दिखावे में फँसा हुआ पाते हैं, तो हमारे मन में एक चेतावनी की घंटी बजनी चाहिए कि हमें क्रूस और ख्रीष्ट की ओर लौटना चाहिए और यह समझना चाहिए कि हमारी सच्ची धार्मिकता कहाँ निहित है। हमें ख्रीष्ट में यह नहीं खोजना है कि वह हमारे चेहरे को छिपाने के लिए एक मुखौटा दे, वरन् हमें उसमें सम्पूर्ण वस्त्र-भण्डार मिलता है, जो है उसकी अपनी धार्मिकता।  वास्तव में, केवल मसीह की धार्मिकता को, जो विश्वास के द्वारा हमें दी जाती है, धारण करने के द्वारा ही हममें से कोई भी पवित्र परमेश्वर के सामने ठहरने की आशा रख सकता है। विश्वास के द्वारा ख्रीष्ट के वस्त्र धारण करना पाखण्ड नहीं है, वरन् यह उद्धार का कार्य है।

 यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

आर.सी. स्प्रोल

आर.सी. स्प्रोल

डॉ. आर.सी. स्प्रोल लिग्नेएर मिनिस्ट्रीज़ के संस्थापक, सैनफर्ड फ्लॉरिडा में सेंट ऐन्ड्रूज़ चैपल के पहले प्रचार और शिक्षण के सेवक, तथा रेफर्मेशन बाइबल कॉलेज के पहले कुलाधिपति थे। वह सौ से अधिक पुस्तकों के लेखक थे, जिसमें द होलीनेस ऑफ गॉड भी सम्मिलित है।