The Motivation for Love

प्रेम करने की प्रेरणा

7 मई 2026
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7 मई 2026

आलस्य और परिश्रम

Sloth & Diligence

जब हम सोलहवीं शताब्दी के प्रोटेस्टेन्ट धर्मसुधार की स्थायी विरासत के विषय में सोचते हैं, तो कई बातें मन में आती हैं—जैसे केवल विश्वास के द्वारा धर्मीकरण, केवल ख्रीष्ट में, केवल परमेश्वर के वचन के अनुसार, और केवल उसकी महिमा के लिए। परन्तु धर्मसुधार की एक और महत्वपूर्ण विशेषता है जिसे प्राय: अनदेखा कर दिया जाता है। इसे “प्रोटेस्टेंट कार्य-नीति” के वाक्यांश में सुरक्षित रखा गया है। यह अभिव्यक्ति अब ऐसे वाक्यों से भी जुड़ गई है, जैसे “सच्चाई से किए गए कार्य के लिए सच्चाई से मिलने वाला वेतन।” परन्तु इसे “प्रोटेस्टेन्ट कार्य-निति” इसलिए कहा जाता है, क्योंकि धर्मसुधारकों ने इस बात को स्पष्ट तथा पुन: स्थापित किया कि सभी उचित कार्य ( केवल धार्मिक या कलीसिया से सम्बन्धित कार्य ही नहीं) परमेश्वर द्वारा पवित्र ठहराया गया है। संक्षेप में, धर्मसुधारकों ने मानवीय श्रम की गरिमा से जुड़ी बाइबलीय सिद्धान्त को पुन: स्थापित किया।  

पवित्रशास्त्र में मानव श्रम के महत्व को समझने के लिए हमें केवल उन अनेक पदों पर ध्यान देना पर्याप्त है जो आलस्य और निकम्मे लोगों की कठोर शब्दों में निन्दा करते हैं: “परिश्रमी के हाथ शासन करते हैं, परन्तु आलसी तो बेगारी में पकड़े जाते हैं” (नीतिवचन 12:24)। “आलसी मनुष्य मौसम आने पर हल नहीं जोतता, अत: फसल के समय वह भीख मांगता है पर कुछ नहीं पाता” (नीतिवचन 20:4)। “आलसी की लालसा उसकी मृत्यु का कारण होती है, क्योंकि उसके हाथ परिश्रम करने से इनकार करते हैं” (नीतिवचन 21:25)। “यदि कोई कार्य करना न चाहे तो वह खाने भी न पाए। क्योंकि हम सुनते हैं कि तुम्हारे मध्य कुछ ऐसे हैं जो अनुचित चाल चलते हैं और कोई भी कार्य नहीं करते, परन्तु दूसरों के कार्य में हस्तक्षेप करते हैं। ऐसे व्यक्तियों को हम प्रभु यीशु ख्रीष्ट के नाम में आज्ञा देते हैं और समझाते हैं कि वे चुपचाप अपना कार्य करें और अपनी ही रोटी खाया करें” (2 थिस्सलुनीकियों 3:10-12)। जैसा कि ये पद स्पष्ट करते हैं, एक सक्षम व्यक्ति का काम न करना कोई छोटी बात नहीं, वरन् गम्भीर पाप है। । प्रेरित पौलुस इस बात को और भी स्पष्ट रूप से 1 तीमुथियुस 5:8 में कहता है: “परन्तु यदि कोई अपने लोगों की, और विशेषकर अपने परिवार की, देखभाल नहीं करता तो वह अपने विश्वास से मुकर गया है और एक अविश्वासी से भी निकृष्ट है।”

प्रोटेस्टेन्ट कार्य-निति केवल सच्चाई से कीये गए परिश्रमी गुण पर ही नहीं, परन्तु उस परिश्रम में लगन पर भी बल देती है। नीतिवचन 18:9 में इसे इस प्रकार व्यक्त किया गया है: “जो अपने काम में आलसी होता है, वह काम बिगाड़ने वाले का भाई होता है”। सम्पूर्ण नीतिवचन की पुस्तक में केवल कार्य करने वाले मनुष्य की ही नहीं, परन्तु लगन से कार्य करने वाले की प्रशंसा की गई है। दूसरे शब्दों में, हमें अपने कार्यों में अपना सर्वोत्तम प्रयास करना चाहिए।

परन्तु हमारे पतित स्वभाव के कारण कुछ लोग आलसी होते हैं और कार्य करने से मना करते हैं, जबकि कुछ अन्य अपने कार्य में आलसी तथा कार्य के प्रति गम्भीर नहीं होते हैं। पाप के कारण कुछ लोग कार्य को केवल स्वार्थपूर्ण दृष्टिकोण से देखते हैं —केवल आर्थिक लाभ के लिए। अर्थात्, वे इस बात की बहुत कम चिन्ता करते हैं कि वे अपने कार्य के द्वारा परमेश्वर की कैसी सेवा कर सकते हैं या उसे कैसी महिमा दे सकते हैं। वे कार्य को केवल धन कमाने का साधन मानते हैं और इस प्रकार केवल अपने लिए वस्तुएँ इकट्ठा करने का माध्यम समझते हैं।

पाप कुछ लोगों को अपने कार्य में इतना डुबो देता है कि वे अपने परिवारों और यहाँ तक कि अपने आत्मिक जीवन की भी उपेक्षा करने लगते हैं। हमारे समय में प्रचलित “हर कीमत पर आगे बढ़ने” और काम में डूबे रहने की प्रवृत्ति, जो स्वयं को परिश्रमशीलता का रूप देती है, वास्तव में पवित्रशास्त्र द्वारा अपेक्षित परिश्रम नहीं है।  परन्तु यह आत्म-धोखा है। हमारा परिश्रमी कार्य कभी भी परमेश्वर और परिवार के साथ प्रतिस्पर्धा करने के लिए नहीं है। 

पाप कुछ लोगों को उनके कार्य के प्रकार के कारण अपने विषय में अत्याधिक ऊँचा विचार रखने (और दूसरों के विषय में नीचा दृष्टिकोण) के लिए प्रेरित करता है । हमारी संस्कृति तथाकथित आकर्षक व्यवसायों से भरी हुई है जो हमें यह सोचने के लिए बहकाते हैं कि हम अपने पद के कारण स्वभावतः दूसरों से श्रेष्ठ हैं। इसका परिणाम यह होता है कि हम उन लोगों के कार्य, चरित्र और गरिमा के प्रति तिरस्कारपूर्ण दृष्टिकोण रखने लगते हैं जिनके पास ऐसे “आकर्षक” कार्य नहीं हैं। 

मसीहियों को काम के विषय में ऐसी विकृत धारणाओं से सावधान रहना चाहिए और जब ऐसे विचार प्रकट हों तो हमें पश्चाताप करना चाहिए। इसी कारण, मसीही दृष्टिकोण से कार्य के किसी भी विचार-विमर्श में विश्राम-दिन (सब्त) को सम्मिलित करना आवश्यक है। उत्पत्ति 2:3 में लिखा है, “तब परमेश्वर ने सातवें दिन को आशीषित किया और उसे पवित्र ठहराया, क्योंकि उस दिन सृष्टि के समस्त कार्य से जो उसने रचा और बनाया परमेश्वर ने विश्राम किया”। जैसे हम अपने श्रम के द्वारा अपने सृष्टिकर्ता का आदर और महिमा करते हैं, वैसे ही हमें सब्त के पालन के द्वारा भी उसकी महिमा करनी चाहिए। वहीं पर हमारा श्रम अपने उचित स्थान में दिखाई देता है।  इब्रानियों का लेखक घोषित करता है कि ख्रीष्ट ही हमारा अन्तिम विश्राम और सच्चा सब्त है (इब्रानियों 3:7–4:10)। जब हम अपने कार्यों से रुककर उसके विषय में और हमारे लिए किए गए उसके कार्यों पर मनन करते हैं, तब हमारे हृदय में कृतज्ञता फिर से जागृत होती है और जीवन तथा कार्य के प्रति हमारी सोच ख्रीष्ट-केन्द्रित बनी रहती है। 

 तो फिर, प्रोटेस्टेन्ट कार्य-निति के कुछ निहितार्थ क्या हैं? आलस्य,  निकम्मापन और सुस्ती हमारे सृष्टिकर्ता के विरुद्ध मानवीय विद्रोह के प्रकट रूप हैं और उसकी महिमा का अपमान करते हैं। 

यदि हम अपने कार्य के विषय में अपने विचारों को संसार के अनुसार आकार दें, तो अपने कार्य को एक मूर्ति बना बैठेंगे। केवल कार्य करना ही पर्याप्त नहीं है, किन्तु हमें परिश्रम से कार्य करना चाहिए, जिससे कि हम आलस्य को कोई स्थान न दें और न ही केवल मनुष्यों को प्रसन्न करने वाले बनें। 

हमें पवित्रशास्त्र में आलस्य और सुस्ती के विषय में कही गई कठोर बातों को गंभीरता से लेना चाहिए। अपने परिश्रम में और अपने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में हमें परमेश्वर की महिमा के लिए जीना चाहिए।

 यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

केन जोन्ज़

केन जोन्ज़

रेव्ह. केन जोन्ज़, मयैमी में ग्लेन्डेल बैपटिस्ट चर्च के पास्टर हैं।