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प्रेम करने की प्रेरणा

The Motivation for Love

बीसवीं शताब्दी की अपनी प्रसिद्ध पुस्तक द स्क्रूटेप लेटर्स  में लेखक सी. एस. लुईस यह कल्पना करते हैं कि  दुष्टात्मा, स्क्रूटेप अपने भतीजे वर्मवुड को लिख रहा है और यह समझने का प्रयास कर रहा है कि परमेश्वर मनुष्यों से क्यों प्रेम करता है। वह लिखता है:

सच्चाई यह है कि मैंने केवल असावधानी से यह कह दिया कि ‘शत्रु’ वास्तव में मनुष्यों से प्रेम करता है। यह तो निश्चय ही असम्भव है… प्रेम के विषय में उसकी सारी बातें अवश्य ही किसी और बात को छिपाने के लिए होंगी—निश्चय ही उनके सृजन और उनकी इतनी चिन्ता करने के पीछे उसका कोई वास्तविक उद्देश्य होगा। हम इस प्रकार बात इसलिए करते हैं मानो उसमें यह असम्भव प्रेम वास्तव में हो, क्योंकि हम उस वास्तविक उद्देश्य को खोज निकालने में पूर्णतः असफल रहे हैं। वह उनसे क्या लाभ उठाना चाहता है? यही वह प्रश्न है जिसका समाधान नहीं मिल पाता… और यही हमारा मुख्य कार्य है। हम जानते हैं कि वह वास्तव में प्रेम नहीं कर सकता—कोई भी नहीं कर सकता; इसका कोई अर्थ नहीं बनता। काश, हम यह जान पाते कि वह वास्तव में क्या करने में लगा हुआ है। 

हम इन दुष्टात्माओं को उनकी इस खोज में शुभकामनाएँ देते हैं कि वे इसका उत्तर ढूँढ़ें। क्योंकि हम जो परमेश्वर के लोग हैं, हमें ऐसी किसी खोज की आवश्यकता नहीं है। हम विश्वास करते हैं कि परमेश्वर वास्तव में हमसे प्रेम करता है। परमेश्वर प्रेम है (1 यहून्ना 4:16)। इसलिए प्रेम करना उसका स्वभाव है। उसने हमसे पतन से पहले हमारी निर्दोष अवस्था में प्रेम किया, और वह हमारी पतित अवस्था में भी हमसे प्रेम करता रहता है। इसलिए यीशु कह सका, “अपने शत्रुओं से प्रेम करो… जिस से कि तुम अपने स्वर्गीय पिता की सन्तान बन सको” (मत्ती 5: 44-45)। 

हमारे प्रति परमेश्वर का प्रेम क्रूस पर उसके उद्धारकारी कार्य में अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँचा: “क्योंकि परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम किया कि उसने अपना एकलौता पुत्र दे दिया, कि जो कोई उस पर विश्वास करे वह नाश न हो, परन्तु अनन्त जीवन पाए” (यूहन्ना 3:16)। यह प्रेम अवर्णनीय है और हमें पूर्णतः अभिभूत कर देता है। जैसा कि चार्ल्स वेस्ली कहते हैं:

मेरे लिए यह प्रेम की अपार वर्षा क्यों? पूछो मेरे मध्यस्थ से जो ऊपर विराजमान है! यीशु के मुख में देखो इसका कारण, जो अब अनुग्रह के सिंहासन के सामने खड़ा है।

वहाँ मेरे लिए उद्धारकर्ता खड़ा है; अपने घाव दिखाता है और अपने हाथ फैलाता है, परमेश्वर प्रेम है; मैं जानता हूँ, मैं अनुभव करता हूँ; यीशु जीवित है, और अब भी मुझसे प्रेम करता है। 

बाइबल में हमारे प्रति परमेश्वर के प्रेम का जो चित्रण है, उसी ने हमारे भीतर उसके प्रति प्रेम को प्रज्वलित किया है। मेरा तात्पर्य यह है कि ऐसे अद्भुत तथ्यों के प्रकाश में हम उससे प्रेम किए बिना कैसे रह सकते हैं? क्रूस पर परमेश्वर के पुत्र का बलिदान वह अग्निकुण्ड है जहाँ हम अपने ठण्डे हृदयों को परमेश्वर के प्रति प्रेम से गर्म करते हैं। हममें जो प्रचारक हैं, उनके लिए सेवकाई में कोई भी बलिदान उस बलिदान के प्रकाश में बहुत बड़ा नहीं है जो परमेश्वर ने हमारे लिए किया।  पवित्र आत्मा इसी सत्य का उपयोग करके हमारे प्राणों के दहन-कक्षों को प्रज्वलित रखता है। हमारा उत्साह कभी न बुझने वाला बन जाता है। आइज़क वाट्स का प्रसिद्ध भजन अपने अन्तिम पद में इस सत्य को बहुत अच्छी तरह व्यक्त करता है: 

यदि सम्पूर्ण प्रकृति का सारा सम्राज्य मेरा होता,
तो भी वह भेंट देने के लिए बहुत छोटा होता;
इतना अद्भुत, इतना दिव्य प्रेम,
मेरे प्राण, मेरा जीवन, मेरा सर्वस्व माँगता है।

तथापि,  हम केवल परमेश्वर से ही प्रेम नहीं करते, वरन् हम अपना स्नेह उन लोगों की ओर भी मोड़ते हैं जिन्हें परमेश्वर ने प्रेम किया है और जिनसे वह प्रेम करता आ रहा है।

हम वह माध्यम बनना चाहते हैं जिसके द्वारा परमेश्वर का प्रेम अपने नियत व्यक्तियों तक पहुँच सके। हम देशों और समुद्रों को पार करेंगे न केवल खोई हुई आत्माओं को परमेश्वर के क्रोध के विषय में चेतावनी देने के लिए, वरन् उनसे गम्भीरता से विनती करने के लिए भी कि वे यीशु ख्रीष्ट में परमेश्वर के प्रेम का उत्तर दें। वास्तव में, यदि हम इस प्रेम को जानते हैं, तो हमें ऐसा ही करना चाहिए। 

यही बात प्रेरित पौलुस कहना चाहता था जब उसने कहा: 

क्योंकि मसीह का प्रेम विवश करता है जिससे यह निष्कर्ष निकलता है कि जब एक सब के लिए मरा, तो सब मर गए….. इसलिए हम मसीह के राजदूत हैं, मानो परमेश्वर हमारे द्वारा विनती कर रहा है; हम मसीह की ओर से तुम से निवेदन करते हैं  कि परमेश्वर के साथ मेल-मिलाप कर लो (2कुरि 5:14,20) .

यदि यह प्रेम आपके सुसमाचार प्रचार के परिश्रमों को प्रेरित नहीं कर रहा है, तो सम्भव है कि आप अपनी पूर्ण सामर्थ्य से बहुत कम स्तर पर कार्य कर रहे हैं। 

जब हम परमेश्वर के हमारे प्रति प्रेम के प्रकाश में उससे प्रेम करते हैं, तब हम उसकी दुल्हन—कलीसिया—से भी प्रेम करने लगते हैं। परमेश्वर के लोग, जिसे उसके अपने लहू से मोल लिया गया है, हमारे लिए अत्यन्त प्रिय हो जाती है। और तब हम पौलुस के साथ उनसे कहते हैं: 

और विश्वास के द्वारा मसीह तुम्हारे हृदय में निवास करे कि तुम प्रेम में नींव डाल कर और जड़ पकड़ कर, सब पवित्र लोगों के साथ भली-भांति समझ सको कि उसकी चौड़ाई, लम्बाई और गहराई कितनी है, और मसीह के उस प्रेम को जान सको जान सको जो ज्ञान से परे है, कि तुम परमेश्वर की समस्त परिपूर्णता तक भरपूर हो जाओ (इफि 3:17-19)।

इसी उद्देश्य के लिए हम परमेश्वर द्वारा दी गई सारी सामर्थ्य और शक्ति के साथ परिश्रम करते और संघर्ष करते हैं। 

जबकि लुईस की कल्पना के दुष्टात्माएँ अभी भी यह समझने में लगी हैं कि परमेश्वर के हमारे प्रति प्रेम के पीछे वास्तविक उद्देश्य क्या है, हम इस प्रेम को अपने भीतर ऐसा कार्य करते हुए पाते हैं कि वह हमें न केवल परमेश्वर से प्रेम करने के लिए प्रेरित करता है, किन्तु उन लोगों से भी प्रेम करने के लिए प्रेरित करता है जिन्हें उसने बनाया और उद्धार दिया है। और हम अपने आप से कहते हैं (जॉन केंट के शब्दों में)

हे मेरे प्राण, ऐसे प्रेम पर निरन्तर मनन कर; इतना महान, इतना समृद्ध और स्वतन्त्र प्रेम। पवित्र आश्चर्य में डूबकर यह कह, हे प्रभु, मुझ पर ऐसा प्रेम क्यों? हल्लेलूयाह! अनुग्रह सदा राज्य करेगा ।

 यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

कॉनराड म्बेवे

कॉनराड म्बेवे

रेव. कॉनराड म्बेवे जाम्बिया के लुसाका स्थित कबवाटा बैपटिस्ट चर्च के पास्टर हैं और अफ्रीकन क्रिश्चियन यूनिवर्सिटी में धर्मशास्त्र के .डीन हैं। वे "फाउंडेशन्स फॉर द फ्लॉक: ट्रुथ्स अबाउट द चर्च फॉर ऑल द सेंट्स" नामक पुस्तक के लेखक हैं।