Is the Church Full of Hypocrites?

क्या कलीसिया पाखण्डियों से भरी हुई है?

14 मई 2026
Is the Church Full of Hypocrites?

क्या कलीसिया पाखण्डियों से भरी हुई है?

14 मई 2026

महिला पास्टरों के विषय में बाइबल क्या कहती है?

What Does the Bible Say About Women Pastors?

यह प्रश्न कि क्या महिलाएँ पास्टर या एल्डर के रूप में सेवा कर सकती हैं, अनेक मसीहियों के लिए व्यक्तिगत और संवेदनशील विषय है। विश्वासियों ने देखा है कि इस विषय ने कई कलीसियाओं में विवाद उत्पन्न किए हैं और यहाँ तक कि कभी-कभी विभाजन का कारण बन गया है। ऐसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील विषय पर विचार करते समय, हमारे लिए आवश्यक है कि हम बाइबल की ओर मुड़ें। परमेश्वर का वचन इस विवादास्पद विषय पर क्या प्रकाश डालता है? 

1 तीमुथियुस 2:8–15 में प्रेरित पौलुस कलीसिया को यह स्पष्ट निर्देश देता है कि उसे अपना जीवन इस प्रकार व्यवस्थित करना चाहिए जो परमेश्वर को भाए। इस पत्री में पौलुस अपने युवा सहकर्मी तीमुथियुस को लिखता है। तीमुथियुस उस समय इफिसुस की कलीसिया में सेवा कर रहा था, जहाँ परिस्थितियाँ कठिन थीं। उसे झूठी शिक्षाओं (1 तीमुथियुस 1:3–11; 6:2–10) और आराधना में अव्यवस्था (1 तीमुथियुस 2:1–15) जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा था। साथ ही, कलीसिया को अपने अगुवों—एल्डरगण और डीकनगण की योग्यताओं और उनके कार्यों के विषय में भी स्पष्ट मार्गदर्शन की आवश्यकता थी (1 तीमुथियुस 3:1–5:25)। 

मसीही आराधना में प्रार्थना के कार्य के विषय में निर्देश देने के पश्चात् (1 तीमुथियुस 2:1–7), पौलुस सार्वजनिक आराधना में पुरुषों और स्त्रियों की भागीदारी के सम्बन्ध में विशेष परामर्श देता है (1 तीमुथियुस 2:8–15)। इन पदों में वह उन पापों को सम्बोधित करता है जो विशेष रूप से प्रत्येक लिंग को प्रभावित करते हैं। पुरुषों को “बिना क्रोध और विवाद के” प्रार्थना करनी चाहिए (1 तीमुथियुस 2:8)। स्त्रियों को बाहरी साज-सज्जा से अधिक भक्तिपूर्ण जीवन को प्राथमिकता देनी चाहिए (1 तीमुथियुस 2:9–10)।

पौलुस आगे स्त्रियों की सार्वजनिक आराधना में भागीदारी से सम्बन्धित एक और महत्वपूर्ण विषय उठाता है। वह पहले सकारात्मक रूप से परमेश्वर की स्त्रियों के लिए बुलाहट को स्पष्ट करता है—“प्रत्येक स्त्री चुपचाप और सम्पूर्ण अधीनता से शिक्षा ग्रहण करे” (1 तीमुथियुस 2:11)। प्रेरित यह पुष्टि करता है कि स्त्रियों को कलीसिया की आराधना में उपस्थित रहने और पुरुषों के साथ मिलकर परमेश्वर के वचन को, जब उसे पढ़ा और सुनाया जाता है, सीखने का पूरा अधिकार है। इस दृष्टि से, यीशु की महिला शिष्य हर प्रकार से पुरुष शिष्यों के समान हैं।

फिर, पौलुस स्त्रियों को “उपदेश देने और पुरुषों पर अधिकार जताने” के लिए मना कर करता है (1 तीमुथियुस 2:12)। इसके विपरीत उन्हें “चुप रहने” के लिए कहा गया है। स्त्रियों को उन कार्यों में लगे रहना चाहिए जिनके लिए परमेश्वर ने उन्हें बुलाया है—अर्थात् शान्त भाव से सीखने वाली बनना। उन्हें उन निषिद्ध कार्यों को नहीं करना चाहिए जिनका उल्लेख पद 12 में किया गया है। 

ये कार्य कौन-से हैं? पौलुस दो बातों का उल्लेख करता है। पहला, शिक्षा देना है। यहाँ सन्दर्भ को समझना महत्वपूर्ण है। पौलुस स्त्रियों को प्रत्येक प्रकार की शिक्षा देने से नहीं रोकता, यहाँ तक कि कलीसिया के भीतर भी नहीं। किन्तु, वह उन्हें उस समय सार्वजनिक रूप से परमेश्वर के वचन का प्रचार और शिक्षा देने से मना करता है जब कलीसिया सार्वजनिक आराधना के लिए एकत्र होती है। यह कार्य कलीसिया के एल्डरगण का है (देखें 1 तीमुथियुस 3:2; 4:11–16)। दूसरी बात है पुरुषों पर अधिकार चलाना। अगले अध्याय में पौलुस आत्मिक अधिकार कलीसिया के एल्डरगण को सौंपता है, जो योग्य पुरुष होते हैं और जिन्होंने अपने परिवार का सुचारु संचालन करने की क्षमता सिद्ध की होती है (देखें 1 तीमुथियुस 3:5)। इस प्रकार, हम पद 12 में पौलुस के निषेध को संक्षेप में इस प्रकार कह सकते हैं: स्त्रियों को कलीसिया में एल्डर के पद को धारण करने या उसके कार्यों को निभाने की अनुमति नहीं दी गई है।

पद 13-14 में ही पौलुस, पद 11-12 में दिए गए अपने निर्देशों का कारण बताता है। पौलुस तीमुथियुस को उस क्रम को स्मरण दिलाता है जिसमें परमेश्वर ने आदम और हव्वा को बनाया था: “क्योंकि आदम पहिले और हव्वा बाद में बनाई गई” (1 तीमुथियुस 2:13)। फिर पौलुस उसे यह भी स्मरण दिलाता है कि हमारे प्रथम माता -पिता किस रीति से पाप मे गिरे: “आदम बहकावे में न आया, परन्तु स्त्री अधिक बहकावे में आकर अपराधिनी हुई” (1 तीमुथियुस 2:14)। पौलुस यहाँ आदम को पाप के लिए दोषमुक्त नहीं ठहरा रहा है। इसके विपरीत, आदम का पाप परमेश्वर के वचन के स्पष्ट ज्ञान के विरुद्ध था (देखें उत्पत्ति 2:15)। न ही पौलुस यह कह रहा है कि हव्वा कोई सरलता से बहकने वाली स्त्री थी। वह केवल बाइबल की इस शिक्षा की ओर संकेत कर रहा है कि हव्वा ने सर्प के द्वारा धोखा खाए जाने के बाद वर्जित फल खाया। 

1 तीमुथियुस 2:13–14 में पौलुस के ये शब्द पद 11–12 में दिए गए उसके आदेशों का समर्थन कैसे करते हैं? वे कम से कम दो प्रकार से ऐसा करते हैं। पहला, पद 12 में स्त्रियों को शिक्षा देने और अधिकार चलाने से रोके जाने का आधार इस बात में निहित है कि परमेश्वर ने मनुष्य को किस प्रकार बनाया (1 तीमुथियुस 2:13)। अर्थात्, यह सृष्टि में स्थापित व्यवस्था पर आधारित है। इसलिए पौलुस का यह निषेध केवल इफिसुस की परिस्थिति तक सीमित नहीं है, और न ही यह केवल पहली शताब्दी के लिए है। हम इसे किसी पहली शताब्दी के यहूदी पुरुष की सीमित सोच का परिणाम भी नहीं मान सकते। यह निषेध उस व्यवस्था को दर्शाता है जिसे परमेश्वर ने सृष्टि में पुरुष और स्त्री के लिए स्थापित किया।

दूसरा, पद 12 में पौलुस का निषेध पद 14 में एक चेतावनीपूर्ण उदाहरण में मिलता है। जब हव्वा ने “परमेश्वर के समान होने” का प्रयास किया और परमेश्वर के वचन के प्रति अनाज्ञाकारिता की, तो उसका परिणाम विनाशकारी हुआ (उत्पत्ति 3:5)। परमेश्वर ने हमारी भलाई के लिए जो सही क्रम स्थापित किया है, उससे भटकने से कभी भी सही परिणाम नहीं निकलता है। इसलिए, पौलुस आगे कहता है कि स्त्रियों को उन बातों का पीछा नहीं करना चाहिए जिन्हें परमेश्वर ने मना किया है। उन्हें स्वयं को उन कार्यों के लिए समर्पित करना चाहिए जिनके लिए परमेश्वर ने उन्हें बुलाया है। परमेश्वर अधिकाँश स्त्रियों को (परन्तु सभी को नहीं) विवाह और सन्तान उत्पन्न करने के लिए बुलाता है (1 तीमुथियुस 2:15)। जब एक विश्वासी स्त्री “विश्वास, प्रेम, पवित्रता और संयम” के साथ इस बुलाहट को ग्रहण करती है, तब वह उस उद्धार के प्रति आश्वासन पा सकती है जो परमेश्वर ने उसे ख्रीष्ट में सेंतमेत में दिया है। 

आज कलीसिया में हमें पौलुस के इन वचनों की आवश्यकता है। ये वचन हमें उस क्रम और नमूने को दिखाते हैं जिसे परमेश्वर ने अपनी कलीसिया में पुरुषों और स्त्रियों के लिए ठहराया है। ये वचन हमें उस संकट के विषय में भी सचेत करते हैं जो इस क्रम से भटकने पर उत्पन्न होता है। परन्तु ये केवल कलीसिया के लिए निषेधात्मक बातें ही प्रस्तुत नहीं करते, किन्तु ये एक आकर्षक और प्रेरणादायक दृष्टि भी देते हैं कि परमेश्वर ने स्त्रियों को क्या बनने और क्या करने के लिए बुलाया है। एक ऐसे युग में, जहाँ प्राय: स्त्रियों को बौद्धिक और नैतिक रूप से पुरुषों से हीन समझा जाता था, पौलुस ने तीमुथियुस से कहा कि स्त्रियों को भी, पुरुषों की रीति, ख्रीष्ट के विद्यालय में सीखने का अधिकार है (1 तीमुथियुस 2:11)। उन्हें स्वयं को ईश्वरभक्तिपूर्ण स्वभाव से सजाना है—केवल तब ही नहीं जब वे कलीसिया के साथ आराधना के लिए एकत्रित होती हैं (1 तीमुथियुस 2:9), परन्तु अपने दैनिक जीवन में भी, विशेषकर अपने बच्चों की देखभाल के साधारण कार्यों में (1 तीमुथियुस 2:15)। यही वे शान्त और साधारण जीवन के क्षण हैं जिनमें परमेश्वर अपनी अनुग्रह की अद्भुत योजनाओं को पूरा करता है। और यह प्रत्येक युग में परमेश्वर के सभी लोगों के लिए शुभ समाचार है।

 यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

गाय प्रेन्टिस वाटर्स

गाय प्रेन्टिस वाटर्स

डॉ. गाय प्रेन्टिस वाटर्स जैक्सन मिसिसिपी के रिफॉर्म्ड थियोलॉजिकल सेमिनरी में जेम्स बेय्र्ड जूनियर प्रोफेसर ऑफ न्यू टेस्टामेन्ट हैं, और प्रेस्बिटेरियन चर्च इन अमेरिका में शिक्षक प्राचीन हैं। वह हाउ जीज़स रन्ज़ द चर्च और द लाइफ एंड थियोलॉजी ऑफ पौल के लेखक हैं।