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धन्य हैं वे जो दयावन्त हैं

सम्पादक की टिप्पणी: यह टेबलटॉक पत्रिका श्रंखला का छठवां अध्याय है: धन्यवाणियाँ

दया वह उदारता, हृदय की कोमलता, और आत्मा की करुणा है जो कि दूसरों के दु:खों को कम करने के लिए प्रेरित होती है। यह उन विशेषताओं में से एक है जो परमेश्वर की सन्तानों को चिन्हित करती है, क्योंकि परमेश्वर स्वयं “दया का धनी” है (इफिसियों 2:4)। पवित्रशास्त्र परमेश्वर की दया के वर्णनों से भरा हुआ है, जिसकी “दया अनन्त है” (विलापगीत 3:22)। उसने स्वयं को मूसा पर “यहोवा परमेश्वर, दयालु और अनुग्रहकारी” के रूप में प्रकट किया (निर्गमन 34:6)। परमेश्वर का अनुग्रह वह करुणा है जो उन पर दिखायी जाती है जो दोषी हैं और दण्ड के योग्य हैं, और दया ऐसी करुणा है जो ऐसे लोगों को दिखायी जाती है जो दु:खों में हैं। यह तरस के समान है, और जो परमेश्वर के “धन्य” हैं दया के हृदय द्वारा चिन्हित किए जाते हैं उन लोगों के प्रति जो दु:खी हैं और राहत और सान्त्वना की आवश्यकता में हैं।

दयालु हृदय आता कहाँ से है?  स्वभाव से, हमारे हृदय सामान्यत: दूसरों के प्रति आत्म-लीन और कठोर होते हैं। दु:ख उठाने वालों की आवश्यकताएं स्वाभाविक रूप से हमें वैसे प्रेरित नहीं करती जैसा उन्हें करना चाहिए। कुछ लोग जिन्होंने परमेश्वर की बचाए जाने वाली दया का अनुभव नहीं किया है निश्चित ही दूसरों के प्रति एक प्रकार की दया को अनुभव और व्यक्त कर सकते हैं, परन्तु एक गहरी और स्थायी प्रकार की दया है जो कि केवल उन्हीं के हृदयों में जानी जाती है जो परमेश्वर के धन्य हैं।

वे जिनके जीवन गहरे और स्थायी दया के हृदय के द्वारा चिन्हित हैं ऐसे बनाए जाते हैं फिर से जन्म लेने की दया के अनुभव के द्वारा। यह परमेश्वर की “अपार दया के अनुसार” है कि “हमें नया जन्म दिया गया” (1 पतरस 1:3)। परमेश्वर की बचाने वाली दया परिवर्तित लोगों को जन्म देती है जो परिणामस्वरूप दूसरों पर इस दया को प्रतिबिम्बित करते हैं। दया परमेश्वर के लोगों के हृदयों में दया उत्पन्न करती है, जो परिणामस्वरूप दूसरो के प्रति दयालु कार्यों में परमेश्वर के अलौकिक कार्य को प्रतिबिम्बित करती है।

परमेश्वर की दया पर विचार करना वह माध्यम है जिससे परमेश्वर की सन्तानें दया के हृदय को उन्नत और विकसित कर सकती हैं। परमेश्वर की सन्तानों के लिए उस पाप की स्थिति और क्लेश के विषय में विचार करना जिसमें स्वाभाविक रूप से हम पापियों के रूप में जन्म लेते हैं नम्र बनने का करण है। यहाँ तक कि परमेश्वर की दया पर जो कि ख्रीष्ट के द्वारा हम पर उण्डेली गयी, उस पर विचार करना और भी अधिक नम्रता बनने का कारण है। हम दयनीय स्थिति में थे और परमेश्वर ने हम पर दया की। क्या हमें भी दूसरों के साथ ऐसा ही नहीं करना चाहिए? “जैसा तुम्हारा पिता दयालु है, वैसे ही तुम भी दयालु बनो” (लूका 6:36)।

वे जिनके हृदय में परमेश्वर की दया का अभाव है अन्तिम दिन पर परमेश्वर की दया की आशा नहीं कर सकते। यही बिन्दु है मत्ती 18:23-35 में निर्दयी दास के दृष्टान्त का। अपने संगी दास पर दया दिखाने से मना करने के पश्चात, निर्दयी सेवक अपने स्वामी द्वारा फटकारा गया: “मैंने जिस प्रकार से तुझ पर दया की, क्या उसी प्रकार तुझे भी अपने संगी दास पर दया नहीं करनी चाहिए थी?” (पद 33)। परमेश्वर की दया का अनुभव मांग करता है कि हम बदले में दया दिखाएं। वे जो विशिष्ट रूप से निर्दयी हैं प्रदर्शित करते हैं कि उन्होंने वह दया प्राप्त नहीं की है जो कि सुसमाचार में ख्रीष्ट की ओर से आती है।

वे जिनके पास दया के हृदय हैं प्रदर्शित करते हैं कि उन्होंने परमेश्वर की दया प्राप्त की है। एक बार जब व्यक्ति परमेश्वर की दया का अनुभव कर लेते हैं, परमेश्वर की दया सर्वदा उन पर बनी रहेगी, और वे दूसरों के प्रति दयालु बनकर यह दिखाएंगे कि परमेश्वर की दया उन पर है। भविष्य की दया का वायदा—“उन पर दया की जाएगी”—धन्यता की निश्चित नींव है। यह जानने से अधिक महान आशीष क्या हो सकती है कि परमेश्वर की दया सदैव आप पर बनी रहेगी?

यह लेख मूलतः टेबलटॉक पत्रिका में प्रकाशित किया गया।
गैरी स्टुअर्ड
गैरी स्टुअर्ड
डॉ. गैरी स्टुअर्ड कॉलराडो क्रिश्चियन यूनिवर्सिटी में इतिहास के सहायक प्राध्यापक हैं। वे प्रिन्सटन सेमिनेरी (1812-1929): उसके अगुवों के जीवन और कार्य (Princeton Seminary (1812-1929): It’s Leaders’ Lives and Works) के लेखक है।