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1 सितम्बर 2026
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कलीसिया अपने दिव्यांग सदस्यों की देखभाल कैसे कर सकती है?

How Can the Church Care for Its Disabled Members?

अपनी वर्तमान कलीसिया में बच्चों की सेवकाई के निदेशक के रूप में बुलाए जाने के कुछ ही सप्ताह बाद, एक एल्डर और उनकी पत्नी ने मुझसे मिलने का अनुरोध किया। उन्होंने एक गम्भीर प्रश्न से बातचीत आरम्भ की:

“क्या आप यहाँ हमारी कलीसिया के सभी बच्चों की सेवकाई करने आए हैं, या केवल अधिकाँश बच्चों की?”

सही उत्तर देने के बाद (निश्चय ही, सभी बच्चों की!), उन्होंने आगे पूछा कि मैं हमारी कलीसिया के उन पाँच बच्चों और उनके परिवारों की देखभाल कैसे करने की योजना बना रहा हूँ, जो किसी न किसी प्रकार की दिव्यांगता से प्रभावित थे। उनके इन चुनौतीपूर्ण प्रश्नों ने मेरे हृदय को झकझोर दिया और मेरी सेवकाई के दृष्टिकोण को पूरी तरह बदल दिया। यही वह आरम्भिक बिंदु था, जिसने आगे चलकर हमारी कलीसिया में एक फलती-फूलती दिव्यांग सेवकाई की नींव रखी।

कलीसिया में दिव्यांग व्यक्तियों और उनके परिवारों की देखभाल कैसे की जाए, इस प्रश्न का पहला उत्तर यह है कि हम यह पहचानें कि कलीसिया के सभी सदस्यों की देखभाल करना हमारी ज़िम्मेदारी है। दिव्यांग सेवकाई कोई वैकल्पिक सेवकाई नहीं है, चाहे आपकी कलीसिया में दिव्यांग लोगों की संख्या बहुत कम ही क्यों न हो। यह ऐसी सेवकाई नहीं है जिस पर हम बच्चों, युवाओं या अन्य “अधिक महत्वपूर्ण” सेवकाइयों के बाद ध्यान दें। लगभग प्रत्येक स्थानीय कलीसिया में कोई न कोई ऐसा व्यक्ति अवश्य होता है जो किसी न किसी प्रकार की दिव्यांगता से प्रभावित होता है—चाहे वह दिव्यांगता स्पष्ट रूप से दिखाई देती हो या दिखाई न देती हो। इसके अतिरिक्त,आसपास के  समाज में भी ऐसे बहुत से लोग हैं जो चाहते हैं कि कलीसिया उन्हें प्रेमपूर्वक अपनाए।

1 कुरिन्थियों 12 में प्रेरित पौलुस कलीसिया का वर्णन ख्रीष्ट की एक देह के रूप में करता है, जिसमें अनेक अंग हैं। यह बताने के बाद कि देह का प्रत्येक अंग अलग भी है और आवश्यक भी, वह लिखता है:

देह के वे अंग जो हमें निर्बल प्रतीत होते हैं, वास्तव में बहुत ही आवश्यक हैं… ताकि देह में फूट न पड़े, परन्तु अंग एक-दूसरे की समान चिन्ता करें।” (1 कुरिन्थियों 12:22, 25)

जब हम इन सत्यों को दिव्यांग लोगों पर लागू करते हैं, तो हमें केवल उनकी अच्छी देखभाल ही नहीं करनी है, वरन् यह भी पहचानना है कि वे ख्रीष्ट की देह के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।

पवित्रशास्त्र में कलीसिया को केवल ख्रीष्ट की देह ही नहीं, वरन् परमेश्वर का परिवार भी कहा गया है। इसलिए, यद्यपि हमें दिव्यांग लोगों की देखभाल ख्रीष्ट की देह के अंगों के रूप में करनी है, परन्तु हमें यह कार्य पारिवारिक प्रेम के साथ करना चाहिए। ख्रीष्ट में भाई-बहन होने के कारण हम एक पारिवारिक बंधन और परस्पर प्रेम साझा करते हैं। कलीसिया की इन दोनों चित्रों को ध्यान में रखते हुए, अब हम उन पाँच व्यावहारिक बातों पर विचार करेंगे जो यह बताती हैं कि दिव्यांगता से प्रभावित व्यक्तियों और उनके परिवारों की देखभाल किस प्रकार की जानी चाहिए।

समावेशिता 

एक कलीसिया-परिवार के रूप में हमारी यह इच्छा होनी चाहिए कि सभी लोग उसमें सम्मिलित हों। विभिन्न प्रकार की दिव्यांगताएँ लोगों के लिए कलीसिया के जीवन में सक्रिय रूप से जुड़ना और ख्रीष्ट की देह का कार्यशील अंग बनना कठिन बना सकती हैं। इसलिए हमें कलीसिया की प्रत्येक सेवकाई, आराधना, शिष्यता, मिशन आदि, की समीक्षा करनी चाहिए और यह पूछना चाहिए कि हम अपने सभी सदस्यों की सहभागिता कैसे सुनिश्चित कर सकते हैं। हमें हर सम्भव प्रयास करना चाहिए जिससे कि दिव्यांग व्यक्ति केवल सम्मिलित ही न हों, वरन् वास्तव में कलीसिया के परिवार के अपनेपन का अनुभव करें (इफिसियों 2:19)।

सुगम पहुँच

दिव्यांग लोगों की देखभाल करने का सबसे स्पष्ट तरीका यह है कि हम अपनी कलीसिया की इमारतों को उनके लिए सुगम बनाएँ। यदि हम एक साथ इकट्ठा ही नहीं हो सकते, तो सभी लोग एक साथ आराधना कैसे करेंगे और एक साथ शिष्यता में कैसे बढ़ेंगे? इसलिए हमारी सभी सुविधाओं को सुगम बनाना सदैव प्राथमिकता होनी चाहिए। 

परन्तु केवल भवन ही नहीं, हमारी सभी सेवकाई गतिविधियाँ भी सभी लोगों के लिए सुगम होनी चाहिए। हम उन लोगों का ध्यान कैसे रखें जो ठीक से सुन नहीं सकते, जो ठीक से देख नहीं सकते, जिन्हें शान्त वातावरण की आवश्यकता होती है, और जो बौद्धिक रूप से दिव्यांगता से प्रभावित हैं उनकी देखभाल कैसे करेंगे? क्या कुछ लोगों को रविवार का संडे स्कूल, बाइबल अध्ययन या अन्य सेवकाई कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए किसी सहायक साथी की आवश्यकता है? एक कलीसिया-परिवार के रूप में हमें यह प्रयत्न करना चाहिए कि प्रत्येक सदस्य को पारिवारिक जीवन में पूर्ण सहभागिता का अवसर मिले।

आत्मिक वरदानों की सहभागिता 

परमेश्वर के परिवार के प्रत्येक सदस्य को सामूहिक भलाई  के लिए आत्मिक वरदान दिए गए हैं (1 कुरिन्थियों 12:7)। इसमें दिव्यांग मसीही भी सम्मिलित हैं। इसलिए, जबकि हमें उनकी सेवा और देखभाल करनी चाहिए, हमें उन्हे शिष्य में बढ़ाना भी चाहिए और उन्हें इस योग्य बनाना चाहिए कि वे अपने आत्मिक वरदानों का उपयोग परमेश्वर की महिमा और दूसरों की सेवा के लिए करें। दिव्यांग लोगों के वरदानों के बिना कलीसिया-परिवार अधूरा है।

सच्चे सम्बन्ध

यह संसार प्रायः दिव्यांग लोगों को उनकी गरिमा से वंचित कर देता है। कभी-कभी मसीही भी व्यक्ति को नहीं, केवल उसकी दिव्यांगता को ही देखते हैं। परन्तु जब हम एक-दूसरे को परिवार के रूप में अपनाते हैं, तब हमारा उद्देश्य वास्तविक लोगों के साथ वास्तविक सम्बन्ध स्थापित करना होता है। हमें केवल दिव्यांग लोगों की “देखभाल करने” तक सीमित नहीं रहना चाहिए, वरन् वास्तव में उनकी चिन्ता करनी चाहिए। उनकी कहानी जानिए। उन्हें जानिए। उनसे प्रेम कीजिए।

देखभाल करने वालों को विश्राम 

दिव्यांगता से प्रभावित व्यक्तियों की देखभाल करने का एक और महत्वपूर्ण उपाय यह है कि उनकी देखभाल करने वालों की भी देखभाल की जाए। माता-पिता को कभी-कभी बाहर जाने का अवसर देना या निरन्तर देखभाल की जिम्मेदारियों से कुछ घण्टों का विश्राम उपलब्ध कराना दीर्घकालीन देखभाल के लिए अत्यन्त आवश्यक है। अधिकांश लोगों के लिए जीवन की चिंताओं से कुछ समय का विश्राम प्राप्त करना अपेक्षाकृत सरल होता है। परन्तु जिन परिवारों का जीवन दिव्यांगता से प्रभावित है, उन्हें अपने शरीर और आत्मा के नवीनीकरण तथा विश्राम के लिए अपने कलीसिया-परिवार की सहायता की आवश्यकता होती है।

निष्कर्ष

हमारे समय का संसार प्रायः अलगाव, विभाजन और संघर्ष से भरा हुआ दिखाई देता है। ऐसे वातावरण में मसीही भी सहज एक-दूसरे से दूर हो सकते हैं। परन्तु कलीसिया के रूप में हमें अपनी दोहरी पहचान के अनुसार जीवन जीना है: हम ख्रीष्ट की वह देह हैं, जिसके सभी अंग परस्पर जुड़े हुए हैं; और हम परमेश्वर का वह परिवार हैं, जिन्हें एक-दूसरे से प्रेम करने और एक-दूसरे की देखभाल करने के लिए बुलाया गया है। दिव्यांग सेवकाई का बुलावा वास्तव में परमेश्वर के सभी लोगों की देखभाल करने का बुलावा है।

 यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।