Who Was Abraham?

अब्राहम कौन था?

21 अगस्त 2026
Who Was Abraham?

अब्राहम कौन था?

21 अगस्त 2026

क्या विवाह अनन्तकाल तक बना रहता है ?

Is Marriage Eternal?

कुछ ही प्रश्न हैं जो हमारे हृदय को इस प्रश्न के समान गहराई से स्पर्श करते हैं: क्या स्वर्ग में भी मेरा अपने जीवनसाथी के साथ विवाह का सम्बन्ध बना रहेगा? पवित्रशास्त्र में, हम विवाह की उत्पत्ति, पति-पत्नी के आपसी सम्बन्ध और इस मिलन से परमेश्वर की महिमा कैसे होती है, इसके विषय में पढ़ते हैं। परन्तु एक प्रश्न जो प्रायः मन में आता है कि क्या विवाह अनन्तकाल तक बना रहता है?  क्या मैं तब भी विवाहित रहूँगा? क्या मैं स्वर्ग में विवाह कर सकता हूँ? यदि इस जीवन में मेरे एक से अधिक जीवनसाथी रहे हों, तो क्या होगा? क्या मैं अपने पृथ्वी के विवाह के विषय में सब कुछ भूल जाऊँगा? इनमें से कुछ प्रश्नों का उत्तर पाने के लिए, हमें सबसे पहले यह समझना होगा कि परमेश्वर ने आरम्भ में विवाह की स्थापना क्यों की।

पाप में पतन से पहले, जब परमेश्वर ने संसार की सृष्टि की ते उसने दो संस्थाओं की स्थापना की। विवाह दूसरी संस्था थी, परन्तु पहली सब्त थी। छह दिनों में संसार की रचना पूरी करने के पश्चात्, परमेश्वर ने सातवें दिन विश्राम किया (उत्पत्ति 2:2–3)। ऐसा करके, परमेश्वर ने दिखाया कि हमें छह दिन काम करना है और सातवें दिन विश्राम करते हुए उसकी आराधना करनी है (निर्गमन 20:8–11)। इससे भी बढ़कर, साप्ताहिक सब्त नई सृष्टि का पूर्वाभास था, एक ऐसा युग जब परमेश्वर अपने लोगों के लिए सिद्ध और अनन्तकाल के उद्धार को पूर्ण करेगा (यशायाह 66:23)। नया नियम बताता है कि सब्त हमें ख्रीष्ट के कार्य की ओर ले जाता है, क्योंकि वही हमें इस अनन्त विश्राम में प्रवेश कराता है, अभी भी और आनेवाले युग में भी (इब्रानियों 4:9–11)। दूसरे शब्दों में, ख्रीष्ट हमें आत्मिक सब्त के विश्राम में प्रवेश करा चुका है, परन्तु हम अभी भी इसका पूरी रीति से पूर्ण होने की प्रतिक्षा कर रहे हैं। इसी कारण हम सप्ताह के पहले दिन सब्त और उस हमेशा के विश्राम की प्रतिक्षा करते हैं जिसकी ओर वह संकेत करता है (प्रेरितों के काम 20:7; 1 कुरिन्थियों 16:1–2)।

उसी प्रकार, परमेश्वर ने पतन से पहले ही सृष्टि में विवाह की स्थापना अपने साथ वाचागत सम्बन्ध की ओर संकेत करने के लिए की थी। मनुष्य का अकेला रहना अच्छा नहीं था (उत्पत्ति 2:18), इसलिए परमेश्वर ने आदम के लिए एक पत्नी बनाई। परन्तु वह वैवाहिक सम्बन्ध अपने आप में अन्तिम उद्देश्य नहीं था, क्योंकि इसका अभिप्राय परमेश्वर और उसकी प्रजा के मध्य होने वाले विवाह का एक प्रत्यक्ष चित्र प्रस्तुत करना था। पुराने नियम में बार-बार परमेश्वर स्वयं को अपनी उस प्रजा का पति बताता है जिसने उसके विरुद्ध व्यभिचार किया है (यशायाह 62:5; यिर्मयाह 2:2; 3:6–8; यहेजकेल 16:8–21; होशे 2:2)। इसी प्रकार,  यीशु भी अनेक अवसरों पर स्वयं को अपने अनुयायियों का दूल्हा कहता है (मत्ती 9:15; 22:2; 25:1–13; यूहन्ना 3:29)। यीशु के उदाहरण पर चलते हुए, पौलुस बताता है कि विवाह एक गहरा रहस्य है जो ख्रीष्ट और उसकी कलीसिया की ओर संकेत करता है। जैसे कलीसिया ख्रीष्ट का आदर करती है और उसके अधीन रहती है, वैसे ही पत्नी अपने पति का आदर करती है और उसके अधीन रहती है; और जैसे ख्रीष्ट कलीसिया के लिए, वैसे ही पति अपनी पत्नी से प्रेम करता है और उसके लिए स्वयं को बलिदान करता है (इफिसियों 5:22–33; 1 कुरिन्थियों 11:2–3)। प्रकाशितवाक्य में, यूहन्ना ख्रीष्ट और उसकी कलीसिया के फिर से एक होने के अन्तिम स्वर्गीय समारोह को विवाह-भोज के रूप में वर्णन करता है (प्रकाशितवाक्य 19:7–9; 21:2; 22:16–17)।

सब्त और विवाह, दोनों सृष्टि की वे व्यवस्थाएँ हैं जिनका आनन्द हम वर्तमान समय में परमेश्वर के महान् आशीषों के रूप में लेते हैं, परन्तु ये दोनों ही स्वर्ग की उन वास्तविकताओं की ओर संकेत करते हैं जिन्हें हम आने वाले युग में पूरा होते देखना चाहते हैं। मसीही होने के कारण हम मसीही सब्त के दिन आराधना के लिए इसलिए इकट्ठा होते हैं क्योंकि हम अभी भी ख्रीष्ट में मिलने वाले अपने अनन्त सब्त-विश्राम के पूरा होने की प्रतिक्षा कर रहे हैं। ठीक इसी प्रकार, हम इस संसार में विवाह करते हैं और अपने पुत्र-पुत्रियों का विवाह करते हैं, क्योंकि हम मेमने के साथ होने वाली अपने अनन्त विवाह की पूर्ण परिपूर्ति की प्रतिक्षा कर रहे हैं। परन्तु जब वास्तविकता पूरी रीति से सामने आ जाती है, तो परछाईं मिट जाती है।

इसीलिए, धोखा दिए जाने से पहले जब यीशु यरूशलेम में था, तो उसने विवाह के विषय में एक बहुत आवश्यक बात कही थी। सदूकी, जो यहूदी उच्च वर्ग वाले लोगों का एक समूह था और मृत्यु के बाद के जीवन को नकारते था, उन्होंने यीशु से विवाह के विषय में प्रश्न पूछा (मत्ती 22:23–33; मरकुस 12:18–27; लूका 20:27–38)। मरे हुओं के जी उठने की बात को अर्थहीन सत्यापित करने के प्रयास में, उन्होंने यीशु से पूछा कि यदि किसी का छह बार विवाह हुआ हो और उसके सभी जीवनसाथी मर गए हों, तो क्या होगा। क्या स्वर्ग में उस व्यक्ति के अनेक  जीवनसाथी होंगे? प्रतिउत्तर में, यीशु ने न केवल उन्हें मरे हुओं के जी उठने की सच्चाई बताई, अपितु यह भी समझाया कि पृथ्वी पर होने वाला विवाह अनन्तकाल तक बना नहीं रहता: “क्योंकि जब लोग मृतकों में से जी उठते हैं तो वे न विवाह करते हैं और न ही वे विवाह में दिए जाते हैं वरन वे स्वर्ग में दूतों के समान होते हैं (मरकुस 12:25)। यीशु के अनुसार, जो लोग पृथ्वी पर विवाहित हैं, वे स्वर्ग में अपने जीवन-साथी के साथ विवाहित नहीं रहेंगे। उस समय उनकी एकमात्र चिंता वही होगी जो स्वर्गदूतों की होती है: अन्नतकाल तक परमेश्वर की आराधना करना और उसकि महिमा करना। दूसरे शब्दों में, स्वर्ग में  जिस एकमात्र विवाह के लिए हम चिंतित होंगें वह है प्रभु यीशु ख्रीष्ट के साथ हमारा आत्मिक विवाह।

तो क्या विवाह अनन्तकाल तक बना रहता है? केवल ख्रीष्ट और उसकी कलीसिया का विवाह ही सदा बना रहता है। यदि हम सोचते हैं कि पृथ्वी का विवाह अनन्तकाल तक बना रहेगा, तो हमने विवाह के वास्तविक उद्देश्य को ही नहीं समझा है। पृथ्वी पर जीवनसाथी परमेश्वर का दिया हुआ एक अनमोल वरदान है, जिसका हमें आदर करना और प्रेमपूर्वक उसकी देखभाल करनी चाहिए। परन्तु मेरा विश्वास है कि यद्यपि हम स्वर्ग में अपने पृथ्वी के विवाहों को स्मरण रखेंगे, फिर भी वहाँ हम पति-पत्नी के रूप में नहीं रहेंगे। वास्तविकता अपनी छाया से कहीं श्रेष्ठ होती है। जब हम सिंहासन के सामने एकत्रित होंगे, तो हम अपने पृथ्वी के जीवनसाथी के साथ खड़े तो होंगे, परन्तु एक-दूसरे से विवाहित जोड़े के रूप में नहीं, वरन् ख्रीष्ट के साथ विवाहित उसकि कलीसिया के रूप खड़े होंगे। महिमा की उस अवस्था में, इस संसार के सभी विवाह मेमने के साथ हमारे भव्य विवाह के प्रकाश में फीके पड़ जाएँगे।

 यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

लेवी बर्नटसन

लेवी बर्नटसन

डॉ. लेवी बर्नटसन सैनफोर्ड, फ्लोरिडा में रिफॉर्मेशन बाइबल कॉलेज में थियोलॉजी के एसोसिएट प्रोफेसर और प्रेस्बिटेरियन चर्च इन अमेरिका में टीचिंग एल्डर हैं।
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कुछ ही प्रश्न हैं जो हमारे हृदय को इस प्रश्न के समान गहराई से स्पर्श करते हैं: क्या स्वर्ग में भी मेरा अपने जीवनसाथी के साथ विवाह का सम्बन्ध बना रहेगा? पवित्रशास्त्र में, हम विवाह की उत्पत्ति, पति-पत्नी के आपसी सम्बन्ध और इस मिलन से परमेश्वर की महिमा कैसे होती है, इसके विषय में पढ़ते हैं। परन्तु एक प्रश्न जो प्रायः मन में आता है कि क्या विवाह अनन्तकाल तक बना रहता है?  क्या मैं तब भी विवाहित रहूँगा? क्या मैं स्वर्ग में विवाह कर सकता हूँ? यदि इस जीवन में मेरे एक से अधिक जीवनसाथी रहे हों, तो क्या होगा? क्या मैं अपने पृथ्वी के विवाह के विषय में सब कुछ भूल जाऊँगा? इनमें से कुछ प्रश्नों का उत्तर पाने के लिए, हमें सबसे पहले यह समझना होगा कि परमेश्वर ने आरम्भ में विवाह की स्थापना क्यों की।

पाप में पतन से पहले, जब परमेश्वर ने संसार की सृष्टि की ते उसने दो संस्थाओं की स्थापना की। विवाह दूसरी संस्था थी, परन्तु पहली सब्त थी। छह दिनों में संसार की रचना पूरी करने के पश्चात्, परमेश्वर ने सातवें दिन विश्राम किया (उत्पत्ति 2:2–3)। ऐसा करके, परमेश्वर ने दिखाया कि हमें छह दिन काम करना है और सातवें दिन विश्राम करते हुए उसकी आराधना करनी है (निर्गमन 20:8–11)। इससे भी बढ़कर, साप्ताहिक सब्त नई सृष्टि का पूर्वाभास था, एक ऐसा युग जब परमेश्वर अपने लोगों के लिए सिद्ध और अनन्तकाल के उद्धार को पूर्ण करेगा (यशायाह 66:23)। नया नियम बताता है कि सब्त हमें ख्रीष्ट के कार्य की ओर ले जाता है, क्योंकि वही हमें इस अनन्त विश्राम में प्रवेश कराता है, अभी भी और आनेवाले युग में भी (इब्रानियों 4:9–11)। दूसरे शब्दों में, ख्रीष्ट हमें आत्मिक सब्त के विश्राम में प्रवेश करा चुका है, परन्तु हम अभी भी इसका पूरी रीति से पूर्ण होने की प्रतिक्षा कर रहे हैं। इसी कारण हम सप्ताह के पहले दिन सब्त और उस हमेशा के विश्राम की प्रतिक्षा करते हैं जिसकी ओर वह संकेत करता है (प्रेरितों के काम 20:7; 1 कुरिन्थियों 16:1–2)।

उसी प्रकार, परमेश्वर ने पतन से पहले ही सृष्टि में विवाह की स्थापना अपने साथ वाचागत सम्बन्ध की ओर संकेत करने के लिए की थी। मनुष्य का अकेला रहना अच्छा नहीं था (उत्पत्ति 2:18), इसलिए परमेश्वर ने आदम के लिए एक पत्नी बनाई। परन्तु वह वैवाहिक सम्बन्ध अपने आप में अन्तिम उद्देश्य नहीं था, क्योंकि इसका अभिप्राय परमेश्वर और उसकी प्रजा के मध्य होने वाले विवाह का एक प्रत्यक्ष चित्र प्रस्तुत करना था। पुराने नियम में बार-बार परमेश्वर स्वयं को अपनी उस प्रजा का पति बताता है जिसने उसके विरुद्ध व्यभिचार किया है (यशायाह 62:5; यिर्मयाह 2:2; 3:6–8; यहेजकेल 16:8–21; होशे 2:2)। इसी प्रकार,  यीशु भी अनेक अवसरों पर स्वयं को अपने अनुयायियों का दूल्हा कहता है (मत्ती 9:15; 22:2; 25:1–13; यूहन्ना 3:29)। यीशु के उदाहरण पर चलते हुए, पौलुस बताता है कि विवाह एक गहरा रहस्य है जो ख्रीष्ट और उसकी कलीसिया की ओर संकेत करता है। जैसे कलीसिया ख्रीष्ट का आदर करती है और उसके अधीन रहती है, वैसे ही पत्नी अपने पति का आदर करती है और उसके अधीन रहती है; और जैसे ख्रीष्ट कलीसिया के लिए, वैसे ही पति अपनी पत्नी से प्रेम करता है और उसके लिए स्वयं को बलिदान करता है (इफिसियों 5:22–33; 1 कुरिन्थियों 11:2–3)। प्रकाशितवाक्य में, यूहन्ना ख्रीष्ट और उसकी कलीसिया के फिर से एक होने के अन्तिम स्वर्गीय समारोह को विवाह-भोज के रूप में वर्णन करता है (प्रकाशितवाक्य 19:7–9; 21:2; 22:16–17)।

सब्त और विवाह, दोनों सृष्टि की वे व्यवस्थाएँ हैं जिनका आनन्द हम वर्तमान समय में परमेश्वर के महान् आशीषों के रूप में लेते हैं, परन्तु ये दोनों ही स्वर्ग की उन वास्तविकताओं की ओर संकेत करते हैं जिन्हें हम आने वाले युग में पूरा होते देखना चाहते हैं। मसीही होने के कारण हम मसीही सब्त के दिन आराधना के लिए इसलिए इकट्ठा होते हैं क्योंकि हम अभी भी ख्रीष्ट में मिलने वाले अपने अनन्त सब्त-विश्राम के पूरा होने की प्रतिक्षा कर रहे हैं। ठीक इसी प्रकार, हम इस संसार में विवाह करते हैं और अपने पुत्र-पुत्रियों का विवाह करते हैं, क्योंकि हम मेमने के साथ होने वाली अपने अनन्त विवाह की पूर्ण परिपूर्ति की प्रतिक्षा कर रहे हैं। परन्तु जब वास्तविकता पूरी रीति से सामने आ जाती है, तो परछाईं मिट जाती है।

इसीलिए, धोखा दिए जाने से पहले जब यीशु यरूशलेम में था, तो उसने विवाह के विषय में एक बहुत आवश्यक बात कही थी। सदूकी, जो यहूदी उच्च वर्ग वाले लोगों का एक समूह था और मृत्यु के बाद के जीवन को नकारते था, उन्होंने यीशु से विवाह के विषय में प्रश्न पूछा (मत्ती 22:23–33; मरकुस 12:18–27; लूका 20:27–38)। मरे हुओं के जी उठने की बात को अर्थहीन सत्यापित करने के प्रयास में, उन्होंने यीशु से पूछा कि यदि किसी का छह बार विवाह हुआ हो और उसके सभी जीवनसाथी मर गए हों, तो क्या होगा। क्या स्वर्ग में उस व्यक्ति के अनेक  जीवनसाथी होंगे? प्रतिउत्तर में, यीशु ने न केवल उन्हें मरे हुओं के जी उठने की सच्चाई बताई, अपितु यह भी समझाया कि पृथ्वी पर होने वाला विवाह अनन्तकाल तक बना नहीं रहता: “क्योंकि जब लोग मृतकों में से जी उठते हैं तो वे न विवाह करते हैं और न ही वे विवाह में दिए जाते हैं वरन वे स्वर्ग में दूतों के समान होते हैं (मरकुस 12:25)। यीशु के अनुसार, जो लोग पृथ्वी पर विवाहित हैं, वे स्वर्ग में अपने जीवन-साथी के साथ विवाहित नहीं रहेंगे। उस समय उनकी एकमात्र चिंता वही होगी जो स्वर्गदूतों की होती है: अन्नतकाल तक परमेश्वर की आराधना करना और उसकि महिमा करना। दूसरे शब्दों में, स्वर्ग में  जिस एकमात्र विवाह के लिए हम चिंतित होंगें वह है प्रभु यीशु ख्रीष्ट के साथ हमारा आत्मिक विवाह।

तो क्या विवाह अनन्तकाल तक बना रहता है? केवल ख्रीष्ट और उसकी कलीसिया का विवाह ही सदा बना रहता है। यदि हम सोचते हैं कि पृथ्वी का विवाह अनन्तकाल तक बना रहेगा, तो हमने विवाह के वास्तविक उद्देश्य को ही नहीं समझा है। पृथ्वी पर जीवनसाथी परमेश्वर का दिया हुआ एक अनमोल वरदान है, जिसका हमें आदर करना और प्रेमपूर्वक उसकी देखभाल करनी चाहिए। परन्तु मेरा विश्वास है कि यद्यपि हम स्वर्ग में अपने पृथ्वी के विवाहों को स्मरण रखेंगे, फिर भी वहाँ हम पति-पत्नी के रूप में नहीं रहेंगे। वास्तविकता अपनी छाया से कहीं श्रेष्ठ होती है। जब हम सिंहासन के सामने एकत्रित होंगे, तो हम अपने पृथ्वी के जीवनसाथी के साथ खड़े तो होंगे, परन्तु एक-दूसरे से विवाहित जोड़े के रूप में नहीं, वरन् ख्रीष्ट के साथ विवाहित उसकि कलीसिया के रूप खड़े होंगे। महिमा की उस अवस्था में, इस संसार के सभी विवाह मेमने के साथ हमारे भव्य विवाह के प्रकाश में फीके पड़ जाएँगे।

 यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।