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बुद्धि साहित्य को कैसे पढ़ें

How-to-Read-Wisdom-Literature

“यहोवा का भय मानना ​​बुद्धि का आरम्भ है” (नीतिवचन 9:10; अय्यूब 28:28; भजन संहिता 111:10; नीतिवचन 1:7 भी देखें)। यद्यपि युगों से कई गहरी समझ रखने वाले गैर-मसीही शिक्षक हुए हैं, फिर भी सम्पूर्ण सच्चा ज्ञान अंततः “ऊपर से” आता है – अर्थात् त्रिएक परमेश्वर से आता है (इफिसियों 1:17; कुलुस्सियों 2:3; याकूब 3:15, 17)। बुद्धि केवल उन लोगों में अपनी सच्ची परिपूर्णता के साथ पायी जा सकती है जो एकमात्र सच्चे परमेश्वर का आदर तथा आराधना करते हैं।  

फिर भी अभी बहुत कुछ और कहने की आवश्यकता है, क्योंकि सभी मसीही विश्वासी लोग अपने जीवन से बुद्धिमानी नहीं दिखाते हैं। वास्तव में, मसीही विश्वासी प्रायः मूर्खतापूर्ण और अपना दायित्व पूरा न करते हुए कार्य करते हैं, जिसके कारण स्वयं उनकी और परमेश्वर के नाम की निन्दा होती है (उदाहरण के लिए देखें, यहेजकेल 36:20; रोमियों 2:24; 1 कुरिन्थियों 6:5; 1 कुरिन्थियों 15:34)। पवित्रशास्त्र कहता है कि बुद्धि माँगने वालों को बुद्धि दी जाएगी (याकूब 1:5)। विशेषरूप से पवित्र आत्मा ने नीतिवचन, अय्यूब और सभोपदेशक जैसी बुद्धि की विविध पुस्तकों को ठीक इसी उद्देश्य के लिए उत्प्रेरित किया है। इसलिए एक मसीही व्यक्ति को बुद्धि साहित्य को लाभप्रद रूप से कैसे पढ़ना चाहिए? 

1. यह स्वीकार करें कि अपनी दृष्टि में बुद्धिमान बनना कितना सरल है।

सर्वप्रथम, हमें बुद्धि साहित्य को इस मान्यता के साथ पढ़ना चाहिए कि पापियों के लिए “अपनी दृष्टि में बुद्धिमान” बनना कितना सरल होता है। नीतिवचन की पुस्तक अधिकाँशतः इस गम्भीर समस्या के विषय में बात करती है (नीतिवचन 3:7; 12:15; 26:5; 28:11; और यशायाह 5:21)। सच में जो व्यक्ति “अपनी दृष्टि में बुद्धिमान” है, वह बाइबल में “मूर्ख” से भी बढ़कर है (नीतिवचन 26:12)। इस आत्मिक रोग के लक्षणों में ईश्वरभक्त परामर्शदाताओं के परामर्श को सुनने से अस्वीकार करना सम्मिलित है (नीतिवचन 26:16) – विशेष रूप से अपने माता-पिता का परामर्श (नीतिवचन 1:8; 4:1; 23:22; 30:17) – और प्रत्येक तर्क को जीतने पर बल देना (सभोपदेशक 7:15-16)। आत्मिक रूप से परिपक्व विश्वासियों द्वारा चुनौती दिए जाने पर किसी को भी अपनी दृष्टि में “दुबारा” वही कार्य करने से सावधान रहना चाहिए। वरन् इसके बदले मसीहियों को हमेशा एक सीखने वाली भावना दिखानी चाहिए।

2. सामान्य नियमों और जीवन-प्रणालियों को पहचानें। 

दूसरा, व्यक्ति को बुद्धि साहित्य इसलिए पढ़ना चाहिए जिससे कि उसे सामान्यतः यह पता चल सके कि संसार किस प्रकार से कार्य करता है, तथा उसे भी उसी के अनुसार कार्य करना चाहिए। सामान्यतः कहें तो, जो लोग “प्रभु के भय” में चलते हैं और परमेश्वर के निर्देशों का पालन करना चाहते हैं, वे “उस वृक्ष के समान फलते-फूलते हैं जो जल-धाराओं के किनारे लगाया गया हो” (भजन 1:3)। पारम्परिक ज्ञान को कभी-कभी निन्दा के रूप में देखा जाता है, परन्तु वास्तव में, बाइबल स्वयं परमेश्वर के लोगों की आने वाली पीढ़ियों को देने के लिए ऐसी बुद्धि का एक समृद्ध भण्डार इकट्ठा करती है। पाठकों को इस प्रकार के पारम्परिक ज्ञान पर ध्यान देना चाहिए, न कि इसका दिखावा करना चाहिए, और यह मान लेना चाहिए कि वे चीजों के संचालन के सामान्य नियमों के अपवाद होंगे। उदाहरण के लिए, जो मसीही व्यक्ति यह सोचता है कि वह कलीसिया की सामूहिक सभाओं को अनदेखा करते हुए आत्मिक उन्नति कर सकता है, वह न केवल पवित्रशास्त्र के आग्रह को अनदेखा कर रहा है, वरन् युगों से अनगिनत विश्वासियों की बुद्धि को भी अनदेखा कर रहा है, जिन्होंने उस अनमोल आशीष का अनुभव किया है, जो केवल तभी मिल सकती है, जब कलीसिया ख्रीष्ट के नाम पर एकत्रित होती है (मत्ती 18:20)।

3. “नियमों” के अपवादों पर ध्यान दें।

तीसरा, व्यक्ति को “नियमों के अपवादों” को देखने के लिए बुद्धि साहित्य पढ़ना चाहिए, जो विवेक की आवश्यकता और प्रभु पर निरन्तर निर्भरता को प्रकट करता है। अय्यूब का अनुभव, और सभोपदेशक की पुस्तक की बार-बार दी गयी शिक्षा, इस बात की साक्षी देते हैं कि ऐसे समय भी आएँगे जब जीवन के सामान्य व्यवहार लागू नहीं होंगे। इस प्रकार, कभी-कभी धर्मी जन फलने-फूलने के बदले कष्ट उठाते हैं, और मूर्ख लोग कठिनाई झेलने के बदले सफलता का आनन्द उठाते हैं। नए नियम के एक उदाहरण में कुछ विकट परिस्थितियों में बाइबल यह परामर्श देती है कि विश्वासी विवाह से दूर रहें (1 कुरिन्थियों 7:25-26), यद्यपि सामान्यतः यह अपेक्षा की जाती है कि अधिकाँश विश्वासी एक “उपयुक्त सहायक” पाएँगे जिसके साथ वे परिवार बना सकेंगे और पृथ्वी पर प्रभुत्व करेंगे (उत्पत्ति 1:26-30; उत्पत्ति 2:18-25)। यह समझते हुए कि सामान्य नियमों के अपवाद भी होते हैं, विश्वासी को प्रत्येक परिस्थिति का सामना उसकी अपनी शर्तों पर करना चाहिए, प्रभु से बुद्धि और विवेक के लिए प्रार्थना करनी चाहिए, जिससे कि यह समझा जा सके कि उसकी महिमा के लिए किस प्रकार अच्छे ढँग से कार्य किया जाए।

4. विवेक का प्रयोग करना और प्रभु पर निर्भर रहना सीखें।

चौथा, किसी व्यक्ति को बुद्धि साहित्य इसलिए पढ़ना चाहिए जिससे यह सीखा जा सके कि किसी विशेष परिस्थिति में कौन से विकल्प “अच्छे” या “सर्वोत्तम” हैं, यह आवश्यक नहीं कि वही एकमात्र “ठीक” या “त्रुटिपूर्ण” कार्य हो। पवित्रशास्त्र वास्तव में इस सम्बन्ध में कई ठीक-ठीक नियम बताता है कि क्या ठीक है या क्या त्रुटिपूर्ण है, या कौन सी आज्ञा दी गई है और कौन सी वर्जित है। फिर भी जीवन में कई निर्णय केवल त्रुटिरहित या त्रुटिपूर्ण के विषय में विचार करने से कहीं अधिक महत्वपूर्ण होते हैं। उदाहरण के लिए, जो विश्वासी “प्रभु में” विवाह करने की बाइबल आधारित आवश्यकता को स्वीकार करता है (1 कुरिन्थियों 7:39; तुलना करें 2 कुरिन्थियों 6:14) उसके पास अभी भी जीवनसाथी चुनने के लिए बहुत सारे सम्भावित विकल्प होते हैं। एक मसीही व्यक्ति को बुद्धि और विवेक की आवश्यकता होगी जिससे कि वह यह तय कर सके कि कौन सा सम्भावित जीवन साथी उसके लिए अधिक उपयुक्त है। जीवन में कई अन्य निर्णय जैसे (शिक्षा, भविष्य, निवास स्थान, आदि) ठीक या त्रुटिपूर्ण विकल्पों के बीच सीधे चुनाव पर निर्भर नहीं होते हैं, परन्तु विभिन्न प्रकार के “अच्छे, बहुत अच्छे या सर्वोत्तम” विकल्पों के बीच होते हैं। प्रभु का धन्यवाद हो कि पवित्रशास्त्र में, प्रभु ने विश्वासियों को बुद्धि की शिक्षा का एक बड़ा भण्डार दिया है, और उन लोगों से आत्मा की आशीष की प्रतिज्ञा की है जो विनम्रता से माँगते हैं (लूका 11:13)।

यह लेख व्याख्याशास्त्रसंग्रह का भाग है।     

 यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

मैक्स रोगलैंड
मैक्स रोगलैंड
डॉ. मैक्स एफ. रोगलैंड, रोज हिल प्रेस्बिटेरियन चर्च के वरिष्ठ मंत्री हैं और कोलंबिया, एस.सी. में एर्स्किन थियोलॉजिकल सेमिनरी में पुराने नियम के सह-प्राध्यापक हैं।