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सम्पादक की टिप्पणी: यह टेबलटॉक पत्रिका श्रंखला का चौवथा अध्याय है: पीढ़ी से पीढ़ी

एक ख्रीष्टिय महाविद्यालय में कार्य के सिद्धांत के विषय में बोलने के बाद, एक छात्र ने आकर आग्रह किया कि क्या मैं उसे कुछ मार्गदर्शन दे सकता हूँ। वह यह सोचकर महाविद्यालय आया था कि वह एक पास्टर बनना चाहता है, परन्तु फिर उसे शिक्षक बनने की इच्छा हुई। “मैं कैसे जान सकता हूँ कि प्रभु मुझसे क्या चाहता है?” उसने पूछा।

मैंने उसको अपनी प्रतिभाओं को पहचानने के विषय में कुछ परामर्श दिया, पर फिर उसने एक प्रश्न पूछा जिसने अंतर्निहित विषय को प्रकट किया: “क्या होगा यदि मैं त्रुटिपूर्ण चुनाव करूं?” क्या होगा यदि मैं एक शिक्षक बनने का निर्णय करता हूँ, परन्तु परमेश्वर वास्तव में चाहता था कि मैं एक पास्टर बनूं? या क्या होगा यदि मैं एक पास्टर बनने का निर्णय लेता हूँ, परन्तु परमेश्वर वास्तव में मुझे वह नहीं बनाना चाहता था? मैं कैसे शिक्षा दे सकता या प्रचार कर सकता हूँ यदि मैं ऐसा करने में परमेश्वर की इच्छा के बाहर हो सकता हूँ? और मैं दोनों स्थितियों में कैसे जान सकता हूँ?

और फिर उत्तर मेरे पास आया। “तुम त्रुटिपूर्ण चुनाव नहीं कर सकते है,” मैंने उसे बताया। यदि तुम सेवकाई में जाने का निर्णय लेते हो—और, महत्वपूर्ण रूप से, क्योंकि बुलाहट हमारे बाहर से आते हैं, यदि आप सेमिनरी समाप्त करते हैं और एक मण्डली से एक बुलाहट प्राप्त करते हो—तो तुम सुनिश्चित हो सकते हो कि परमेश्वर ने तुम्हें उस उपदेश-मंच पर रखा है। यदि तुम शिक्षण में जाने का निर्णय लेते हो और एक विद्यालय तुम्हें काम पर रखता है, तो तुम सुनिश्चित हो सकते हैं कि परमेश्वर ने तुम्हें उस कक्षा में रखा है। परमेश्वर तुम्हें अभी कक्षा में रख सकता है और बाद में तुम्हें सेवकाई में भी बुला सकता है।

बहुत से लोग मानते हैं कि हमारे जीवन के लिए परमेश्वर की इच्छा कुछ ऐसी बात है जिसे हमें “खोजना” चाहिए और यदि हम त्रुटिपूर्ण “चुनाव” करते हैं, तो उसको पाने में असफल हो सकते हैं । परन्तु क्योंकि उनके पास वास्तव में यह जानने का कोई साधन नहीं है कि उनकी विशेष स्थिति में परमेश्वर की इच्छा क्या है, वे लकवाग्रस्त हैं, यह नहीं जानते हुए कि उन्हें क्या करना चाहिए, और इसलिए वे कुछ भी नहीं करते हैं।

धर्मसुधारवादी ख्रीष्टीय लोग जानते हैं कि सब कुछ को हमारे “चुनाव” में लेकर आने को आवश्यकता से अधिक ध्यान दिया जाता है। हाँ, हम चुनाव करते हैं, परन्तु ख्रीष्टियों के लिए, जिनका भरोसा ब्रह्माण्ड पर शासन करने वाले प्रभु में है, न तो हमारे उद्धार और न ही हमारे जीवन के मार्ग “हमारे नियंत्रण में” है।

क्या हम वास्तव में सोचते हैं कि परमेश्वर की इच्छा को विफल किया जा सकता है? यह सच है, कि हम उसकी प्रकट इच्छा या उसकी आज्ञाओं के विरुद्ध जा सकते हैं; पाप का अर्थ यही है। हमें उसकी धर्मी इच्छा को जानने के लिए परमेश्वर के वचन का अध्ययन करने की आवश्यकता है। हमें यह भी समझने की आवश्यकता है कि यह इच्छा प्रायः हमारी अपनी पतित इच्छा के विपरीत होगी। हमें अपने विश्वास में बढ़ना चाहिए, ताकि हम यीशु के साथ प्रार्थना कर सकें, “मेरी नहीं, परन्तु तेरी इच्छा पूरी हो” (लूका 22:42)। परन्तु अन्ततः, उसकी सृष्टि पर उसके शासन में, उसकी सम्प्रभु इच्छा पूरी होती है।

इसमें कोई सन्देह नहीं कि विद्यार्थी समझता था कि कुछ कार्य के मार्ग, जैसे कि विषाक्त पदार्थ बेचने वाला या अश्लील चित्र बनाने वाला, उसके लिए बन्द थे। परन्तु शिक्षक बनना कोई पाप नहीं है। न ही पास्टर बनना पाप है। उसके पास चुनने के लिए विकल्प है, और निर्णय लेने के लिए आत्म-जांच, व्यथित होना और प्रार्थना करना आवश्यक होगा। उसे सभी सामान्य कारकों को ध्यान में रखना होगा: वित्त, समय, पारिवारिक स्थिति। पर एक बार निर्णय हो जाने के बाद, वह आश्वस्त हो सकता है, कि परमेश्वर उसकी अगुवाई करता आ रहा है।

यही बात पवित्रशास्त्र सिखाता है। “मनुष्य अपने हृदय में युक्तियां बनाता है”—तो हमें योजना बनानी है—“परन्तु यहोवा ही उसके पैरों को स्थिर करता है।” (नीतिवचन 16:9)। परमेश्वर ही है जो हमारे कार्य को “स्थापित” करता है। “युद्ध के दिन घोड़ा तो तैयार किया जाता है, परन्तु विजय यहोवा ही से है” (21:31)। प्रभु आपको अपने उद्देश्यों में एक सहकर्मी बनाते हुए, परिणाम लाता है।

समृद्धि सुसमाचार की शिक्षाओं के विपरीत, यह आवश्यक नहीं है कि सांसारिक सफलता परमेश्वर की कृपा दृष्टि का संकेत है, न ही सफलता की कमी इस बात का संकेत है कि आप “परमेश्वर की इच्छा से बाहर” हैं। किसी के जीवन की यात्रा में प्राय: न केवल अवसर परन्तु असफलताएं सम्मिलित होती हैं, न केवल खुल रहे द्वार परन्तु आपके चेहरे पर बन्द किए गए द्वार भी। आपका कार्य निश्चित रूप से केवल आपकी “आत्म-पूर्ति” के विषय में नहीं है। कार्य क्षेत्र में यीशु का अनुसरण करने के लिए स्वयं का इनकार और प्रतिदिन स्वयं के त्याग की आवश्यकता है उन पड़ोसियों के लिए जिनकी हमारे कार्य सेवा करते हैं।

हमारे विभिन्न कार्यों में कठिनाइयाँ—परिवार, कलीसिया, और समुदाय, साथ ही कार्यस्थल में—परमेश्वर की इच्छा के एक अन्य पहलू का प्रमाण देता है: हमारे विश्वास और पवित्रता में बढ़ने के लिए उसकी इच्छा। “परमेश्वर की इच्छा है कि तुम पवित्र बनो” (1 थिस्सलुनीकियों 4:3)। ऐसा तब होता है जब हमारे जीवन में संघर्ष हमें उस पर और अधिक निर्भर होने का कारण बनते हैं।

वर्तमान समय में, हम नहीं जानते कि क्या होगा या हमारे चुनाव किस ओर हमें ले जाएंगे। पर जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं—विशेषकर जब समय बीत चुका होता है, जब हम बड़े होते हैं—हम उस ढ़ाँचे को देख सकते हैं कि कैसे परमेश्वर मार्ग के प्रत्येक चरण पर हमारी अगुवाई कर रहा था, यद्यपि हम उस समय इसके प्रति सचेत नहीं थे।

तब तक, हमें अवश्य ही कार्य करना चाहिए। परमेश्वर के प्रावधान पर भरोसा करना- न केवल परमेश्वर का नियन्त्रण, बल्कि यह कि परमेश्वर हमारे लिए “प्रावधान” कराता है- निष्क्रियता के लिए नहीं बल्कि स्वतन्त्रता के लिए एक सूत्र है। हम साहसपूर्वक उन अवसरों और सम्बन्धों की ओर बढ़ सकते हैं जो हमारे जीवन में आते है,  इस भरोसे के साथ कि वह हमारे साथ रहेगा।

यह लेख मूलतः टेबलटॉक पत्रिका में प्रकाशित किया गया।
जीन एडवर्ड वीथ
जीन एडवर्ड वीथ
डॉ. जीन एडवर्ड वीथ पर्ससेलविल, वर्जिनिया में पैट्रिक हेनरी कॉलेज में अध्यक्ष और साहित्य एमेरिटस के प्रोफेसर हैं। वे कई पुस्तकों के लेखक हैं, जिनमें गॉड एट वर्क और रीडिंग बिट्वीन द लाइन्स सम्मिलित हैं।