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सम्पादक की टिप्पणी: यह टेबलटॉक पत्रिका श्रंखला का तीसरा अध्याय है: पीढ़ी से पीढ़ी

बीसवीं शताब्दी के अन्तिम भाग में सेवकों की एक पीढ़ी पर विलियम स्टिल के प्रभाव को मापना असम्भव होगा। यद्यपि स्टिल ख्रीष्ट के साथ महिमा में हैं, उनकी सेवकाई इक्कीसवीं सदी में अटलांटिक के दोनों किनारों पर सेवकों को निरन्तर प्रभावित कर रही है। मुझे इसमें कोई सन्देह नहीं है कि यह आने वाले दशकों तक—यहाँ तक कि शताब्दियों तक—भी जारी रहेगा। स्कॉटलैंड के ग्लासगो में गिलकॉमस्टन साउथ चर्च में उनकी बावन वर्ष की सेवकाई ने, व्याख्यात्मक प्रचार और पास्टरीय सेवकाई पर विश्व-भर में प्रभाव डाला। यह इस तथ्य के कारण से था—कम से कम आंशिक रीति से—कि स्टिल ने सेवकाई के लिए तैयार हो रहे युवाओं के जीवनों में स्वयं को उण्डेला। संसार भर से सबसे अधिक गुणी और प्रिय सेवकों में से कुछ ने गिलकॉमस्टन साउथ में स्टिल से सीखने में समय बिताया। सब विवरणों से, विलियम स्टिल सर्वोत्कृष्ट सेवकाई सम्बन्धित मार्गदर्शक थे।

एक युवा सेमिनरी विद्यार्थी के रूप में, मैंने प्रायः सिनक्लेयर फर्ग्यूसन को उस प्रभाव के विषय में बोलते हुए सुना, जो अभी भी उनके स्वयं के जीवन और सेवकाई की तैयारी पर था। जब वे स्नेह के साथ अपने मार्गदर्शक के लिए कृतज्ञता व्यक्त किया कि उन्होंने कैसे उन में उण्डेला था, उसी धन्य अनुभव को पाने की लालसा मेरे अपने हृदय में बढ़ती थी। किन्तु, ऐसा प्रतीत हुआ कि इसमें दो बाधाएं थीं। पहला अस्वीकार किए जाने का भय था। मैं उन पुरुषों से पूछने के लिए बहुत संकोच करता था, जिनकी मैं प्रशंसा करता था, क्योंकि मैं जानता था कि वे अस्वीकार कर सकते हैं। दूसरा था अरोचकता की अनुभूति। जिन सेवकों की मैं सबसे अधिक प्रशंसा करता था, वे अपने स्वयं के अपने सेवकाई में सेवकाई के लिए तैयार हो रहे युवाओं का मार्गदर्शन करने में बहुत अधिक लगे हुए थे। वह भय जितना भी सही या त्रुटिपूर्वक था—या मेरी अनुभूति जितनी सच्ची या झूठी थी—इतना तो मैं जानता था: मैं पूछ नहीं रहा था, और वे पीछा नहीं कर रहे थे। पिछले कई वर्षों में अन्य सेवकों के साथ हुई चर्चाओं में, यह एक सामान्य रूप से साझा अनुभव है।

बढ़ते हुए, मेरे पिता प्रार्थना किया करते थे कि प्रभु “हमें अपने वर्षों से अधिक समझदार बनाइए।” इस प्रकार की प्रार्थनाओं का उत्तर देने के लिए प्रभु का एक साधन है बुद्धिमान और अनुभवी व्यक्तियों को हमारे जीवन में हमें मार्गदर्शन करने के लिए लाना। हमें उन लोगों की बुद्धि की अति आवश्यकता है, जो राज्य की बढोत्तरी के लिए उपयोग किए गए हैं और जिन्होंने हम से पहले आन्धी को झेला है। जैसा कि आइज़क न्यूटन ने अच्छी रीति से व्यक्त किया, “यदि मैंने आगे देखा है, तो यह केवल दिग्गजों के कंधों पर खड़ा होकर देखा है।” यदि यह उन बातों के सम्बन्ध में सच है जिन्हें हम उन लोगों के लेखन को पढ़ने से प्राप्त करते हैं जो हमसे पहले आए थे, यह उतना ही सच है जब हम उन लोगों के द्वारा मित्रता और मार्गदर्शन पाते हैं जो स्वयं को हम में उण्डेलते हैं।

मार्गदर्शन का पवित्रशास्त्र में एक आधार है। चाहे व्यवस्था, बुद्धि का साहित्य, भविष्यवक्ताओं, सुसमाचारों, प्रेरितों के काम या नया नियम की पत्रियों में हो, मार्गदर्शन करने का बाइबलीय उदाहरण प्रचुर मात्रा में हैं। उदाहरण के लिए, मूसा ने यहोशू का मार्गदर्शन किया, दाऊद ने सुलैमान का मार्गदर्शन किया (नीतिवचन में वर्णित दस पिता-पुत्र की वार्तालाप पर विचार करें), एलिय्याह ने एलिशा का मार्गदर्शन किया, यीशु ने चेलों का मार्गदर्शन किया, पतरस ने यूहन्ना मरकुस का मार्गदर्शन किया, और प्रेरित पौलुस ने अपने जीवन को उण्डेला—न केवल कलीसिया की सेवा करने में, पर अपने आत्मिक पुत्र, तीमुथियुस का मार्गदर्शन करने में भी।

कलीसियाई इतिहास भी कलीसिया में मार्गदर्शन के महत्वपूर्ण भूमिका के लेखों से भरा हुआ है। प्रेरित यूहन्ना ने आरम्भिक कलीसिया के पास्टर और ईश्वरविज्ञानी पॉलीकार्प का मार्गदर्शन किया, जिसने लियोन के इरेनेयुस का मार्गदर्शन किया। मिलान के एम्ब्रोस ने हिप्पो के अगस्टीन का मार्गदर्शन किया। जैसा अगस्टीन ने अंगीकार किया:

उस परमेश्वर के जन ने मुझे एक पिता के जैसे स्वीकार किया, और मेरे निवास के परिवर्तन पर एक उदार और बिशप जैसी दयालुता के साथ देखा। और मैं उससे प्रेम करने लगा . . . एक ऐसे पुरुष के रूप में जो मेरे प्रति मित्रतापूर्ण था। और मैंने लोगों को प्रचार करते हुए उसे ध्यानपूर्वक सुना . . . मैंने उसके शब्दों को ध्यान से थामा। 

मार्टिन लूथर के पीछे जोहान वेन स्टाउपिट्ज़ थे। जॉन केल्विन विलियम फेरल के चरणों में बैठे थे। यह सूची लम्बी होती जाती है।

हमें व्यग्रता के साथ वृद्ध, ईश्वरभक्त, तथा बुद्धिमान पुरुषों और महिलाओं की आवश्यकता है जो त्यागपूर्वक अपने घरों, हृदयों, मस्तिष्कों, और जीवनों को युवा पुरुषों और महिलाओं के लिए खोलेंगे। हमें ऐसे पुरुषों और महिलाओं की आवश्यकता है जो हमें सिखाएंगे कि उन्होंने वर्षों में क्या सीखा है और जो हमारे लिए एक उदाहरण स्थापित करें। परन्तु, सम्भवतः इससे भी अधिक, हमें उन वृद्ध पुरुषों और महिलाओं की आवश्यकता है जो जीवन और सेवकाई में प्रतिदिन आने वाले चुनौतियों के मध्य मित्रों के समान हमारे साथ चलेंगे। कृपया, हमारा मार्गदर्शन करें।

यह लेख मूलतः टेबलटॉक पत्रिका में प्रकाशित किया गया।
निकोलस टी. बैट्ज़िग
निकोलस टी. बैट्ज़िग
रेव्ह. निकोलस टी. बैट्ज़िग (@Nick_Batzig) लिग्नियर सेवकाई के एक सहयोगी संपादक हैं। वे फीडिंग ऑन क्राइस्ट (Feeding on Christ) पर ब्लॉग करते हैं।