
कार्यों की वाचा
13 जनवरी 2026कलीसिया में अगुवाई
यह सत्य है कि पौलुस प्रेरित था और हम नहीं हैं। फिर भी, पौलुस एक सेवक था, और जो लोग कलीसिया में सेवा करते हैं वे भी सेवक ही हैं। मसीही अगुवाई में परिश्रम करने वाले सभी पुरुषों और स्त्रियों और प्रेरित पौलुस के बीच एक सम्बन्ध है। हम उससे सेवा की विधियों, कार्य-प्रणालियों और प्राथमिकताओं के विषय में बहुत कुछ सीख सकते हैं।
पौलुस 1 कुरिन्थियों 2:1–5 में लिखता है:
भाइयो, जब मैं तुम्हारे पास परमेश्वर के विषय में गवाही देता हुआ आया तो शब्दों या ज्ञान की उत्तमता के साथ नहीं आया। क्योंकि मैंने यह ठान लिया था कि तुम्हारे बीच यीशु ख्रीष्ट वरन् क्रूस पर चढ़ाए गए ख्रीष्ट को छोड़ और किसी बात को न जानूँ। मैं निर्बलता और भय के साथ थरथराता हुआ तुम्हारे साथ रहा। मेरा सन्देश और मेरा प्रचार ज्ञान के लुभाने वाले शब्दों में नहीं था, परन्तु आत्मा और सामर्थ्य के प्रमाण में था, जिससे कि तुम्हारा विश्वास मनुष्यों के ज्ञान पर नहीं परन्तु परमेश्वर के सामर्थ्य पर आधारित हो।
पौलुस कहता है कि वह कुरिन्थियों के पास “शब्दों या ज्ञान की उत्तमता” के साथ नहीं आया। दूसरे शब्दों में, पौलुस यह कह रहा था: “जब मैं तुम्हारे पास आया, तो मैंने तुम्हें प्रभावित करने का प्रयास नहीं किया। मैं श्रेष्ठता के भाव के साथ तुम्हारे पास नहीं आया। मैंने अपने अगुवाई के पद का प्रयोग घमण्ड या स्वयं की महिमा के सन्दर्भ में नहीं किया।”
भक्ति-पूर्ण सेवकाई और अगुवाई का पहला सिद्धान्त यही होना चाहिए—कि हम हमारे बोलने में, हमारे आचरण में, या हमारे दृष्टिकोण में, अपने आप को ऊँचा मानने के भाव को न अपनाएँ। इसमें कोई सन्देह नहीं है कि पौलुस अपने ज्ञान, अपने वरदानों और अपने व्यक्तित्व की दृढ़ता के अनुसार उत्तम था, किन्तु उसने अपने आप को ऊँचा दिखाने वाले के रूप में प्रस्तुत नहीं किया। उसने निर्बलता के सन्दर्भ में सेवा की, जैसा कि वह आगे जाकर समझाता है।
“क्योंकि मैंने यह ठान लिया था कि तुम्हारे बीच यीशु ख्रीष्ट वरन् क्रूस पर चढ़ाए गए ख्रीष्ट को छोड़ और किसी बात को न जानूँ” (1 कुरिन्थियों 2:2)। एक अर्थ में पौलुस यहाँ अतिशयोक्ति का प्रयोग कर रहा था, क्योंकि उसने केवल क्रूस के विषय में ही नहीं, परन्तु और भी बहुत-सी बातों के विषय में शिक्षा दी। उसने सम्पूर्ण ईश्वरविज्ञान, अर्थात् परमेश्वर की सम्पूर्ण इच्छा के विषय में बात की। फिर भी, उसकी प्राथमिकताओं और केन्द्रीय ध्यान के स्तर पर, वह आधार जो उसकी हर प्रत्येक बात को दिशा देती थी, वह ख्रीष्ट और उसका क्रूस था। उसने यह ठान लिया था कि वह और कुछ न जाने। यहाँ “जानने” के लिए प्रयुक्त यूनानी शब्द केवल बौद्धिक समझ का नहीं, किन्तु एक गहन, आत्मीय और गहरे बोध को प्रकट करता है। वह ख्रीष्ट को जानना चाहता था, और ख्रीष्ट का यह ज्ञान ही उसे उसकी अगुवाई की भूमिका में प्रेरित करता था।
पद 3 हमें पौलुस कोे एक सेवक, पास्टर तथा मसीही अगुवा के रूप में उसके सफलता के विषय में वर्णन करता है: “मैं निर्बलता और भय के साथ थरथराता हुआ तुम्हारे साथ रहा।” सेवकाई के सन्दर्भ में पौलुस जो कुछ भी था, वह निरन्तर अपने लोगों की निर्बलताओं, उनके भय और उनके थरथराने के साथ स्वयं को जोड़ता रहा। मसीही अगुवाई में, विशेषकर समूह की गतिशीलता के सन्दर्भ में, प्राय: यह प्रश्न उठता है कि जो लोग अगुवाई का कार्य कर रहे हैं, क्या उन्हें अपने भय और चिन्ताओं को छिपा लेना चाहिए। क्या उन्हें शान्ति और आत्मविश्वास का ऐसा रूप धारण करना चाहिए कि मानो सब कुछ उनके नियन्त्रण में है और कोई समस्या नहीं है? या फिर उन्हें स्वयं को असुरक्षित और संवेदनशील होने देना चाहिए?
इस प्रश्न का उत्तर देना सर्वदा कठिन होता है। निश्चय ही, हमें किसी प्रकार का दिखावा करने के लिए नहीं बुलाया गया है और न ही ऐसा नाटक करने के लिए कि सब कुछ नियन्त्रण में है, जबकि वास्तव में ऐसा नहीं है। ऐसा करना सच्चाई का जीवन नहीं है। दूसरी ओर, इसका यह भी अर्थ नहीं है कि किसी समुह का अगुवा प्रत्येक सम्भव चिन्ता और भय को जो वह सभा की अगुवाई करते समय अनुभव कर रहा है, सबके सामने बार-बार व्यक्त करे। यदि ऐसा होने लगे, तो एक साथ एकत्र होने का उद्देश्य ही नष्ट हो जाएगा, क्योंकि वह स्थान अगुवे के लिए अपनी असुरक्षाओं और चिन्ताओं को व्यक्त करने का मंच बन जाता है। लोगों के साथ निर्बलता और भय में रहने का यह अर्थ यह नहीं है किन्तु सच्चाई से अगुवाई करने की बुलाहट है। अगुवों को यह बुलाहट है कि वे अपने आप को वह दिखाने का ढोंग न करें जो वे हैं नहीं, और न ही ऐसी भूमिका निभाएँ जिसके लिए वे बनाए ही नहीं गए हैं।
यदि परमेश्वर ने आपको अगुवाई करने की भूमिका में रखा है, तो निश्चय ही उसने आपको वहाँ आगे बढ़ने और विकसित होने के लिए रखा है। परन्तु साथ ही उसने आपको उस पद के लिए जैसे आप अभी हैं, वैसे ही बुलाया है। यदि किसी भी अर्थ में परमेश्वर का ईश्वरीय प्रावधान उस बुलाहट के पीछे है, तो वह वह आपको उन वरदानों, गुणों तथा योग्यताओं के कारण बुला रहा है जो आपके पास इस समय हैं। इस अर्थ में, आपको यह दिखावा करने की आवश्यकता नहीं है जो आप नही हैं। वह आपको जैसे आप हैं, वैसे ही बुलाता है। वह नहीं चाहता है कि आप वहीं रुक जाएँ। वह चाहता है कि आप बढ़ें, आगे बढ़ें, प्रगति करें— किन्तु ऐसी प्रगति जिसमें चिन्ता न हो, जिसमें आपकी निर्बलताओं को लेकर तनाव न हो।
पौलुस ने अन्यत्र कहा है, “अतः मैं सहर्ष अपनी निर्बलताओं पर घमण्ड करूँगा। जिससे कि ख्रीष्ट का सामर्थ्य मुझमें निवास करे।” (2 कुरिन्थियों 12:9)। पौलुस के सम्मुख सदा यह बात स्पष्ट थी कि उसके पास जो भी सामर्थ्य, जो भी वरदान तथा जो भी योग्यताएँ थीं, उनका वास्तविक स्रोत ख्रीष्ट में था न कि स्वयं पौलुस में। यह किसी भी प्रकार की अगुवाई की स्थिति में व्यक्ति के लिए सान्त्वना देने वाली बात है। परन्तु जब पौलुस लोगों की सेवा कर रहा था, तो उसका मुख्य ध्यान उसकी अपनी निर्बलताओं, असक्षमताओं और भय पर नहीं था। वह दूसरों के भय और निर्बलताओं के प्रति अधिक चिन्तित था, और मेरा मानना है कि यही एक मसीही अगुवे की पहचान है।
जब पौलुस कुरिन्थियों के बीच सेवा करने आया, तो वह कहता है, “मैं निर्बलता और भय के साथ थरथराता हुआ तुम्हारे साथ रहा” (2 कुरिन्थियों 2:3)। दूसरे शब्दों में, पौलुस अपने लोगों के भय, उनकी निर्बलताओं और उनके थरथराने में सम्मिलित होने के प्रति चिन्तित था। यह बात केवल किसी प्रेरित या सेवक के लिए ही नहीं परन्तु प्रत्येक उस व्यक्ति के लिए सत्य होनी चाहिए जो मसीही अगुवाई की किसी भी स्थिति में है। इसका अर्थ संवेदनशील होना है। इसका अर्थ सुनना है। इसका अर्थ उन लोगों पर ध्यान देना है जिनकी आप अगुवाई कर रहे हैं। इसका अर्थ यह सुनना और समझना है कि वे किस स्थिति में हैं और कहाँ उन्हें चोट पहुँची है, उनकी निर्बलताएँ और उनके भय क्या हैं, और उनके प्रति संवदेनशील होना है।
जो व्यक्ति ख्रीष्ट की बुद्धि से युक्त हो और जिसे पवित्रशास्त्र का ज्ञान हो, उसे मनुष्य की जीवन की आधारभूत समस्याओं से निपटने में सक्षम होना चाहिए। यदि यह सत्य नहीं है, तो फिर मसीही विश्वास के पास कहने के लिए वास्तव में बहुत कम रह जाता है। यदि सुसमाचार सम्पूर्ण मनुष्य के सन्दर्भ में चंगाई का सुसमाचार नहीं है, तो वह सुसमाचार ही नहीं है।
ताड़ना देने, प्रोत्साहित करने, आत्मिक निर्माण करने, सान्त्वना देने, दिलासा देने और सामर्थ्य प्रदान करने का कार्य सम्पूर्ण कलीसिया को सौंपा गया है, और पौलुस ने विश्वासियों को एक-दूसरे को प्रोत्साहित करने, ताड़ना देने, शिक्षा देने, सलाह देने तथा एक दूसरे का मार्गदर्शन करने के लिए कहा है। मसीहियत यह मानती तथा आदेश देती है कि सभी सामान्य विश्वासी सेवकाई में सहभागी हों, परन्तु हम अपने देश की कलीसियाओं में इस बात को नहीं देखते हैं। हम झूठे रूप से इस विचार को पकड़े रहते हैं कि कलीसिया की अगुवाई केवल पास्टरों पर आधारित है, जबकि नए नियम में यह विचार पाया नहीं जाता है। प्रत्येक मसीही को यह उत्तरदायित्व दिया गया है, क्योंकि परमेश्वर ने हमें एक-दूसरे की देखभाल करने के लिए आवश्यक संसाधन प्रदान किए हैं।
यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

