
परमेश्वर-मनुष्य क्यों?
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15 जनवरी 2026कार्यों की वाचा
वाचा-ईश्वरविज्ञान अनेक कारणों से अत्यन्त महत्वपूर्ण है। यद्यपि वाचा-ईश्वरविज्ञान सहस्राब्दियों से विद्यमान रहा है, फिर भी उसका अधिक परिष्कृत और विधिवत रूप प्रोटेस्टेन्ट धर्मसुधार के समय सामने आया। हमारे समय में इसकी महत्ता इसलिए और बढ़ गई है, क्योंकि इसका सम्बन्ध उस ईश्वरविज्ञान से है जो अपेक्षाकृत नया है। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त में “युगवाद (डिस्पेन्सेशनलिज़्म)” कहलाने वाला ईश्वरविज्ञान बाइबल को समझने के एक नये दृष्टिकोण के रूप में उभरा। पुरानी स्कोफ़ील्ड-सन्दर्भ-बाइबल (Scofield Reference Bible) ने युगवाद को पवित्र शास्त्र में सात भिन्न-भिन्न व्यवस्थाओं या काल-खंडों के रूप में परिभाषित किया। प्रत्येक युग को इस प्रकार परिभाषित किया गया कि वह “ऐसा समय है जिसमें मनुष्य को परमेश्वर की इच्छा के किसी विशिष्ट प्रकाशन के प्रति आज्ञाकारिता में परखा जाता है।” स्कोफ़ील्ड ने सात युगों को अलग किया, जिनमें निष्कलंकता, विवेक, नागरिक शासन, प्रतिज्ञा, व्यवस्था, अनुग्रह और राज्य-युग आता है। छुटकारे का इतिहास के इस विविधीकृत दृष्टिकोण के विपरीत, वाचा-ईश्वरविज्ञान छुटकारे की एकता का स्पष्ट चित्र प्रस्तुत करना चाहता है। यह एकता उन वाचाओं की निरन्तरता में दिखाई देती है जिन्हें परमेश्वर ने इतिहास के दौरान दिया, और यह भी कि वे किस प्रकार ख्रीष्ट के व्यक्ति और ख्रीष्ट के कार्य में पूरी होती हैं।
पवित्र शास्त्र के प्रकाशन की मूल संरचना के विषय में परम्परावादी युगवादियों और धर्मसुधारवादी ईश्वरविज्ञान के बीच चल रही चर्चा से भी आगे, हमारे समय में छुटकारे की समझ के विषय में एक और गम्भीर समस्या उत्पन्न हो गई है। यह समस्या हमारे धर्मीकरण के सिद्धान्त की समझ में प्रत्यारोपण की भूमिका पर केन्द्रित है। जैसे सोलहवीं शताब्दी में सुधारकों और रोमन कैथोलिकों के बीच धर्मीकरण की समझ पर हुए विवाद में प्रत्यारोपण का सिद्धान्त मुख्य प्रश्न था, वैसे ही अब प्रत्यारोपण का प्रश्न फिर से उठ खड़ा हुआ है, यहाँ तक कि उन सुसमाचारवादियों के बीच भी जो प्रत्यारोपण की धर्मसुधार-सम्बद्ध समझ को अस्वीकार करते हैं। धर्मीकरण और प्रत्यारोपण से जुड़े इस प्रश्न के केंद्र में, जिसे कार्यों की वाचा कहा जाता है, उसके अस्वीकार की समस्या निहित है । ऐतिहासिक वाचा -ईश्वरविज्ञान कार्यों की वाचा और अनुग्रह की वाचा के बीच एक महत्वपूर्ण भेद करता है। कार्यों की वाचा उस वाचा को सन्दर्भित करती है जो परमेश्वर ने पतन से पहले, आदम और हव्वा के साथ उनकी मूल निष्कलंक अवस्था में की थी, जिसमें परमेश्वर ने उनकी आज्ञाकारिता के अनुसार उन्हें आशीष देने का प्रतिज्ञा किया था। पतन के बाद, यह तथ्य कि परमेश्वर ने उन प्राणियों को, जिन्होंने कार्यों की वाचा का उल्लंघन किया था, निरंतर छुटकारे की प्रतिज्ञा दिया, उसी निरंतर छुटकारे के प्रतिज्ञा को अनुग्रह की वाचा के रूप में परिभाषित किया जाता है।
तकनीकी दृष्टि से, एक कोण से देखा जाए तो, जिन-जिन वाचाओं को परमेश्वर अपनी सृष्टि के साथ करता है, वे सब अनुग्रहपूर्ण हैं, क्योंंकि परमेश्वर अपनी सृष्टि से कोई भी प्रतिज्ञा करने के लिए बाध्य नहीं है। परन्तु कार्यों की वाचा और अनुग्रह की वाचा के बीच जो भेद किया जाता है, वह अत्यन्त महत्वपूर्ण विषय को छूता है, क्योंकि उसका सम्बन्ध सीधे सुसमाचार से है। अनुग्रह की वाचा यह दर्शाती है कि परमेश्वर ने हमें बचाने की प्रतिज्ञा की है, यहाँ तक कि तब भी जब हम सृष्टि में दी गई जिम्मेदारियों को पूरा करने में असफल हो जाते हैं। यह बात विशेष रूप से यीशु के कार्य में दिखाई देती है, जो नया आदम है। बार-बार नया नियम यह भेद और तुलना स्पष्ट करता है कि मूल आदम की आज्ञा-उल्लंघन द्वारा मानवजाति पर जो असफलता और विनाश आया, उसके विपरीत, नए आदम अर्थात् यीशु की आज्ञाकारिता के कार्य के द्वारा जो लाभ बहते हैं, वे विश्वासियों को प्राप्त होते हैं। यद्यपि नए आदम और पुराने आदम के बीच स्पष्ट भेद है, फिर भी उनके बीच जो निरंतरता का बिन्दु यह है कि दोनों को परमेश्वर के प्रति पूर्ण आज्ञाकारिता के अधीन रहने के लिए बुलाया गया था।
जब हम नये नियम में ख्रीष्ट के छुटकारे के कार्य को समझते हैं, तो हम मुख्यतः उसके दो पक्षों पर ध्यान केन्द्रित करते हैं। एक ओर, हम प्रायश्चित को देखते हैं। नया नियम स्पष्ट करता है कि प्रायश्चित्त में यीशु अपने लोगों के पापों को उठाता है और हमारे स्थान पर उनके लिए दण्ड भोगता है। अर्थात्, अर्थात्प्रायश्चित्त प्रतिनिधिक और स्थानापन्न है। इस अर्थ में, क्रूस पर मसीह ने पुरानी वाचा की नकारात्मक दण्ड–व्यवस्थाओं को अपने ऊपर ले लिया। अर्थात् उसने न केवल मूसा की व्यवस्था का उल्लंघन करने वालों के लिए देय दण्ड को, वरन् उस व्यवस्था के उल्लंघन का भी दण्ड अपने शरीर में सहा, जो अदन में ठहराई गई थी। उसने अपने ऊपर वह शाप ले लिया जो उन सब के योग्य है जो परमेश्वर की व्यवस्था का उल्लंघन करते हैं। इसे धर्मसुधारवादी ईश्वरविज्ञान “यीशु की निष्क्रियआज्ञाकारिता” के रूप में वर्णित करता है। यह इस बात की ओर संकेत करता है कि उसने हमारे स्थान पर परमेश्वर के शाप को सह लेने के लिए स्वेच्छा से अपने आप को समर्पित किया।
कार्यों की वाचा की नकारात्मक पूर्ति से भी आगे, अर्थात् उन लोगों के लिए ठहराए गए दण्ड को अपने ऊपर लेने से, जिन्होंने उस वाचा की अवज्ञा की, यीशु उस सकारात्मक पक्ष को भी प्रदान करता है जो हमारे छुटकारे के लिए अत्यन्त अनिवार्य है। वे कार्यों की वाचा की आशीष को आदम की उस समस्त सन्तान के लिए अर्जित करता है जो अपना भरोसा यीशु पर रखते हैं। जहाँ आदम वाचा-भंगकर्ता था, वहाँ यीशु वाचा-पालनकर्ता हैं। जहाँ आदम जीवन-के-वृक्ष की आशीष प्राप्त करने में असफल रहा, वहाँ ख्रीष्ट अपनी आज्ञाकारिता के द्वारा उस आशीष को अर्जित करता है और वही आशीष वह उन सब को प्रदान करता है, जो उस पर भरोसा रखते हैं।
हमारे स्थान पर, हमारे लिए, वाचा को पूरी करने के इस कार्य को, ईश्वरविज्ञान ख्रीष्ट की सक्रिय आज्ञाकारिता कहता है। अर्थात् , ख्रीष्ट के छुटकारा देने वाले कार्य में केवल उनकी मृत्यु ही नहीं, वरन् उसका सम्पूर्ण जीवन भी सम्मिलित है। उसकी पूर्ण आज्ञाकारिता का जीवन ही हमारे धर्मीकरण का एकमात्र आधार बनता है। उसकी वही पूर्ण धार्मिकता, जो उसकी पूर्ण आज्ञाकारिता के द्वारा प्राप्त हुई, उन सब को प्रत्यारोपित की जाती है जो अपना भरोसा उस पर रखते हैं। अतः, ख्रीष्ट की सक्रिय आज्ञाकारिता किसी भी व्यक्ति के धर्मीकरण के लिए पूर्णतः अनिवार्य है। यदि ख्रीष्ट की कार्यों की वाचा के प्रति सक्रिय आज्ञाकारिता न हो, तो प्रत्यारोपण का कोई आधार नहीं रह जाता और धर्मीकरण का भी कोई ठोस आधार नहीं बचता। यदि हम कार्यों की वाचा को हटा दें, तो हम यीशु की सक्रिय आज्ञाकारिता को हटा देते हैं। और यदि हम यीशु की सक्रिय आज्ञाकारिता को हटा दें, तो हम उसकी धार्मिकता के हमारे ऊपर होने वाले प्रत्यारोपण को भी हटा देते हैं। यदि हम ख्रीष्ट की धार्मिकता के हमारे ऊपर होने वाले प्रत्यारोपण को हटा दें, तो हम केवल विश्वास के द्वारा धर्मीकरण को भी हटा देते हैं। और यदि हम केवल विश्वास के द्वारा धर्मीकरण को हटा दें, तो हम सुसमाचार को भी हटा देते हैं, और तब हम अपने पापों में ही रह जाते हैं। तब हम आदम की दयनीय सन्तान बने रह जाते हैं, जो अपनी ही अवज्ञा के कारण परमेश्वर के शाप की सम्पूर्ण तीव्रता को भोगने की प्रतीक्षा के अलावा और कुछ नहीं कर सकते। हमारे उद्धार का आधार ख्रीष्ट की आज्ञाकारिता है, क्रूस पर उसकी निष्क्रिय आज्ञाकारिता में भी, और उसके जीवन की सक्रिय आज्ञाकारिता में भी। यह सब कुछ अभिन्न रूप से बाइबिल की उस समझ से जुड़ा है जिसमें यीशु को नए आदम के रूप में बताया गया है (रोमियों 5:12–20), जिसने वहाँ सफलता प्राप्त की जहाँ मूल आदम असफल हुआ, जिसने वहाँ विजय पाई जहाँ मूल आदम पराजित हुआ। इस विषय में दाँव पर हमारा उद्धार स्वयं लगा हुआ है, इससे कम कुछ भी नहीं।
यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

