
परमेश्वर का अटूट प्रेम
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13 जनवरी 2026परमेश्वर-मनुष्य क्यों?
ग्यारहवीं शताब्दी में कलीसिया के सबसे प्रतिभाशाली विचारकों में से एक, कैंटरबरी के महाधर्माध्यक्ष आन्सेल्म, ने तीन महत्वपूर्ण ग्रन्थ लिखे, जिनका प्रभाव कलीसिया पर आज तक बना हुआ है। मसीही दर्शन के क्षेत्र में उन्होंने हमें मोनोलोगिउम् (Monologium) और प्रोसलोगिउम् (Proslogium) दिए। और विधिवत ईश्वरविज्ञान के क्षेत्र में उन्होंने महान् मसीही कृति कुर देउस होमो (Cur Deus Homo) की रचना की, जिसका अनुवाद है: “परमेश्वर-मनुष्य क्यों?”
इस कृति में आन्सेल्म ने मसीह के प्रायश्चित्त (atonement) की कलीसियाई समझ के एक अत्यन्त महत्वपूर्ण पक्ष के लिए दार्शनिक और ईश्वरवैज्ञानिक आधार प्रस्तुत किया, विशेष रूप से प्रायश्चित के सन्तुष्टि-दृष्टिकोण के लिए। इसमें आन्सेल्म ने यह तर्क दिया कि परमेश्वर के न्याय को सन्तुष्ट करने के लिए प्रायश्चित का होना आवश्यक था। यह दृष्टिकोण मध्यकाल में, ख्रीष्ट के प्रायश्चित के कार्य की कलीसिया-सम्बद्ध समझ के सन्दर्भ में, मसीही शास्त्रसम्मत्ता का मुख्य केन्द्र बन गया। किन्तु तब से लेकर अब तक, प्रायश्चित के इस सन्तुष्टि-दृष्टिकोण के आलोचक भी रहे हैं।
मध्यकाल में यह प्रश्न उठाया गया कि क्या यह सोचना उचित है कि यीशु का प्रायश्चित इसलिए आवश्यक था कि विश्व के किसी अमूर्त नियम ने परमेश्वर के न्याय के सन्तुष्ट होने की माँग की। इसी से तथाकथित एक्स लेक्स (Ex Lex) विवाद उत्पन्न हुआ। इस एक्स लेक्स विवाद में यह प्रश्न उठाया गया कि क्या परमेश्वर की इच्छा किसी भी व्यवस्था से अलग, या व्यवस्था के बाहर कार्य करती है (ex lex), या फिर क्या परमेश्वर की इच्छा स्वयं किसी धार्मिक मानदण्ड या वैश्विक व्यवस्था के अधीन है, जिसका पालन करना परमेश्वर के लिए आवश्यक है, और इसलिए उसकी इच्छा व्यवस्था के अधीन प्रयोग में आती है (sub lego)। प्रश्न यह था: क्या परमेश्वर व्यवस्था से बाहर है, या वह व्यवस्था के अधीन है?
कलीसिया ने इस दुविधा का उत्तर यह कहकर दिया कि दोनों ही पक्षों को अस्वीकार किया जाना चाहिए। कलीसिया ने यह प्रतिपादित किया कि परमेश्वर न तो इस अर्थ में व्यवस्था से पूर्णतः परे है, और न ही इस अर्थ में व्यवस्था के अधीन है।वरन् कलीसिया ने यह स्वीकार किया कि एक अर्थ में परमेश्वर व्यवस्था से परे भी है और व्यवस्था के अधीन भी, इस प्रकार कि वह किसी ऐसी व्यवस्था के अधीन नहीं है जो उससे बाहर अस्तित्व रखती हो और उस पर बन्धन लगाती हो। इस अर्थ में वह व्यवस्था से पड़े है और व्यवस्था के अधीन नहीं। परन्तु साथ ही परमेश्वर मनमाना या चंचल नहीं है, वरन् वह अपनी ही प्रकृति की व्यवस्था के अनुसार कार्य करता है। कलीसिया ने यह घोषणा की कि परमेश्वर स्वयं अपने लिए व्यवस्था है। यह कथन परमेश्वर में अव्यवस्था की भावना को नहीं दर्शाता, वरन् यह दर्शाता है कि परमेश्वर के आचरण और उसकी इच्छा का मानक वही है, जिसे सत्रहवीं शताब्दी के शास्त्रसम्मत ईश्वरवैज्ञानिकों ने “परमेश्वर की स्वाभाविक व्यवस्था (natural law of God)” कहा।
परमेश्वर की स्वाभाविक व्यवस्था शब्द–प्रयोग को कभी-कभी उस व्यापक धारणा से भ्रमित कर दिया जाता है, जो राजनीति–दर्शन और ईश्वरविज्ञान में प्राकृतिक व्यवस्था (lex naturalis) के नाम से जानी जाती है। उस सामान्य अर्थ में, प्राकृतिक व्यवस्था उन बातों को बताता है जिन्हें परमेश्वर प्रकृति की दुनिया में नैतिकता के कुछ सिद्धान्तों के विषय में प्रकट करता है। इस सामान्य अर्थ से अलग, सत्रहवीं शताब्दी के वेस्टमिन्स्टर विद्वानों के मन में जब “परमेश्वर की स्वाभाविक व्यवस्था” की बात थी, तो उनका अभिप्राय यह था कि परमेश्वर अपनी ही प्रकृति की व्यवस्था के अनुसार कार्य करता है। अर्थात्, परमेश्वर कभी ऐसा कार्य नहीं करता जो उसकी अपनी पवित्रता, अपनी धार्मिकता, अपने न्याय, अपनी सर्वसामर्थतता आदि के विरोध में हो। परमेश्वर जो कुछ भी करता है, उसमें वह अपने ही अस्तित्व और अपने स्वभाव की परिपूर्णता से कभी समझौता नहीं करता।
जब कलीसिया यह अंगीकार करती है कि परमेश्वर की धार्मिकता के सन्तुष्ट होने की आवश्यकता है, तो यह आवश्यकता कोई ऐसी बात नहीं है जो परमेश्वर पर बाहर से लादी गई हो, वरन् यह आवश्यकता उसके अपने ही चरित्र और स्वभाव से उत्पन्न होती है। परमेश्वर के लिए—परमेश्वर बने रहने के लिए—यह आवश्यक है कि वह अपनी पवित्रता, अपनी धार्मिकता, या अपने न्याय से कभी समझौता न करे। इसी अर्थ में ऐसी प्रायश्चित्त–व्यवस्था आवश्यक ठहरती है, जो उसकी धार्मिकता को सन्तुष्ट करता है।
आधुनिक काल में कुछ चिन्तकों ने प्रायश्चित के सन्तुष्टि-दृष्टिकोण का इस आधार पर विरोध किया है कि यह परमेश्वर के निःशुल्क अनुग्रह और प्रेम को कम कर देता है। यदि परमेश्वर प्रेम का परमेश्वर है, तो वह अपने ही प्रेम और अनुग्रह की शुद्ध प्रेरणा से लोगों को निःशुल्क क्यों नहीं क्षमा कर देता, और इस बात की चिन्ता क्यों करे कि किसी प्रकार के न्याय को सन्तुष्ट किया जाए, चाहे वह उसके अपने स्वभाव का नियम हो या बाहर से थोपा गया कोई नियम? फिर से, प्रायश्चित का यह दृष्टिकोण इस बात को समझने में असफल रहता है कि पापियों को बचाने की अपनी इच्छा के बावजूद, परमेश्वर अपनी ही धार्मिकता पर कभी सौदा नहीं करेगा।
प्रायश्चित में हम देखते हैं कि परमेश्वर एक ओर हमारे प्रति अपना अनुग्रहपूर्ण प्रेम प्रकट करता है, और साथ ही उसी समय, अपनी ही धार्मिकता और न्याय के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को भी प्रकट करता है। न्याय, ख्रीष्ट के उस कार्य के द्वारा पूरा होता है जिसमें वे परमेश्वर की धार्मिकता की माँगों को सन्तुष्ट करता है, और इस प्रकार परमेश्वर की धार्मिकता और न्याय के प्रति निष्ठा बनी रहती है। परमेश्वर ने अपनी धार्मिकता की माँगों को इस प्रकार सन्तुष्ट किया कि उसने हमें एक प्रतिस्थापन दिया, जो हमारे स्थान पर खड़ा हुआ और हमारी ओर से वह सन्तुष्टि प्रस्तुत की। इस सन्तुष्टि के मध्य में परमेश्वर के अनुग्रह का अद्भुत प्रदर्शन दिखाई देता है। परमेश्वर का अनुग्रह इस प्रकार प्रकट होता है कि उसकी न्याय-सम्बन्धी सन्तुष्टि हमारे लिए उस व्यक्ति के द्वारा पूरी की गई जिसे उसने स्वयं नियुक्त किया। सम्पूर्ण पृथ्वी के न्यायी के रूप में, परमेश्वर के स्वभाव में यह बात निहित है कि वह वही करता है जो धर्मी है। और वह न्यायी, जो धर्मी कार्य करता है, वह कभी भी अपनी स्वयं की धार्मिकता के मानदण्डों का उल्लंघन नहीं करता।बाइबल क्रूस को दो बातों के द्वारा समझाती है: प्रकोप-शान्ति (propitiation) और पाप-निष्कृति (expiation)। ये ख्रीष्ट के वे दोहरे कार्य हैं जो उसने हमारी ओर से पूरे किए। प्रकोप-शान्ति का अर्थ विशेष रूप से यह है कि ख्रीष्ट परमेश्वर की धार्मिकता को सन्तुष्ट करता है। वह हमारे पापों के कारण हम पर आने वाले दण्ड का मूल्य हमारे लिए चुका देता है। हम ऐसे ऋणी हैं जो परमेश्वर की धार्मिकता के विरुद्ध अपने अपराध के कारण उठे नैतिक ऋण को कभी चुका नहीं सकते। और परमेश्वर का प्रकोप, हमारे लिए ख्रीष्ट द्वारा किए गए उस पूर्ण बलिदान से, शान्त और सन्तुष्ट हो जाता है। परन्तु यह कार्य का केवल एक पक्ष है। दूसरा है पाप-निष्कृति। पाप-निष्कृति में हमारे पाप हमसे दूर कर दिए जाते हैं, क्षमा कर दिए जाते हैं। यह इस प्रकार होता है कि हमारे पाप प्रत्यारोपित होकर ख्रीष्ट पर रखे जाते हैं, और वह हमारे स्थान पर प्रतिनिधिक रूप से दु:ख सहता है। परमेश्वर सन्तुष्ट होता है, और हमारे लिए हमारा पाप यीशु के पूर्ण प्रायश्चित में हटा दिया जाता है। यह उस दोहरे अर्थ को पूरा करता है, जिसके अनुसार पुरानी-वाचा के प्रायश्चित-दिन पर पापों का प्रायश्चित किया जाता था। एक ओर एक पशु के बलिदान के द्वारा, और दूसरी ओर प्रतीकात्मक रूप से लोगों के पापों को बलि-बकरे की पीठ पर स्थानान्तरित करके, जिसे फिर जंगल में भेज दिया जाता था, जिससे कि लोगों से पाप दूर कर दिए जाएँ।
यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

