सोला स्क्रिप्टुरा - लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़
दक्ष कहानीकार
19 अक्टूबर 2021
सीमित प्रायश्चित
26 अक्टूबर 2021

सोला स्क्रिप्टुरा

सम्पादक की टिप्पणी: यह टेबलटॉक पत्रिका श्रंखला का दूसरा अध्याय है: त्रुटिपूर्वक समझे गए सिद्धान्तद

1546 में, ट्रेन्ट के महासभा ने, जो एक रोमन कैथोलिक समिति थी जो मार्टिन लूथर की मृत्यु के कुछ ही समय बाद इकट्ठी हुई, पवित्रशास्त्र के सम्बन्ध में दो आदेश वितरित किए। पहले आदेश ने उन लोगों को शापित किया जिन्होंने पवित्रशास्त्र को स्वीकार नहीं किया। इसने उन लोगों को भी शापित किया जो कलीसिया की परम्पराओं की “जानबूझकर निन्दा” करते हैं। दूसरे आदेश ने सैद्धान्तिक या नैतिक बातों में “पवित्र शास्त्र” के तोड़-मरोड़ कर पढ़े जाने को मना किया। महासभा ने “पवित्र शास्त्र के विपरीत . . . पवित्र माता कलीसिया” या “पिताओं की सर्वसम्मत सहमति के विपरीत,” शिक्षाओं की निन्दा की और समझाया कि “पवित्रशास्त्र का सही अर्थ और व्याख्या का आँकने का कार्य” कलीसिया का है।

दो आदेश जटिल करने वाले उपधारा और कठिन वाक्यांशों से भरे हुए हैं। इसका एक कारण है: महासभा के बिशप पवित्रशास्त्र की व्याख्या करने के लिए उपयोग की जाने वाली कलीसिया की परम्पराओं और पवित्रशास्त्र के मध्य सम्बन्धों के विषय में असहमत थे, और उन्होंने इसके विषय तर्क दिया कि इसका किसी प्रकार समाधान कैसे किया जाए। इस विषय पर मतदान करने के इच्छुक लोगों में से, तैंतीस सदस्यों ने सोचा कि अधिकार में पवित्रशास्त्र और परम्परा “समान” हैं, ग्यारह ने सोचा कि वे “एक जैसे” हैं, परन्तु अधिकार में “समान” नहीं हैं, और तीन ने सोचा कि महासभा को केवल यह अपेक्षा करनी चाहिए कि परम्पराओं का सम्मान किया जाए। पवित्रशास्त्र और परम्परा के समान अधिकार की भाषा को हटा दिया गया।

एक अन्य समझौता में, महासभा ने एक और भेद किया: अड़तीस सदस्य चाहते थे कि महासभा उन लोगों की निन्दा करे जिन्होंने पवित्रशास्त्र या परम्परा को स्वीकार नहीं किया। परन्तु तैंतीस सदस्य मद्धिम मत चाहते थे। वे उन लोगों की निन्दा करने के लिए इच्छुक थे जिन्होंने पवित्रशास्त्र स्वीकार नहीं किया था, परन्तु परम्परा के सम्बन्ध में, बिशप केवल उन लोगों की निन्दा करने के लिए इच्छुक थे जिन्होंने सचेत रूप से कलीसिया की परम्पराओं की निंदा की थी। यहाँ कम संख्या वाले पक्ष ने वोट जीत किया, क्योंकि बहुमत पक्ष अपने सहयोगियों की चिन्ताओं की उपेक्षा करने को तैयार नहीं थी।

मैं यह कहानी इसलिए बताता हूँ क्योंकि यह सुनकर आश्चर्य होता है कि ट्रेन्ट की महासभा के कुछ सदस्यों ने ऐसी बाते कहीं जिनकी पुष्टि प्रत्येक धर्मसुधारक कर सकते थे (और जिनकी पुष्टि मैं सोचता हूँ कि प्रत्येक प्रोटेस्टेंट मसीही को करना चाहिए)। क्योंकि, प्रत्येक धर्मसुधारक इस बात से सहमत हो सकता था कि पवित्रशास्त्र को तोड़ा-मरोड़ा नहीं जाना चाहिए वह कहने के लिए जो हम चाहते। बाइबल परमेश्वर का वचन है: हमें इसके द्वारा निर्मित होना है; इसे हमारे द्वारा निर्मित नहीं किया जाना है। धर्मसुधारक ट्रेन्ट की महासभा के मतदान करने वाले छोटे समूह के साथ भी सहमत हो सकते थे: कलीसिया की परम्पराएं—निश्चित रूप से कलीसिया के लेख और आरम्भिक प्रथाएं—सम्मान के योग्य हैं। हाँ, कलीसिया के इतिहास में झूठे शिक्षक हुए हैं। परन्तु कलीसिया में उपयोगी शिक्षा का एक इतिहास भी है जो पवित्रशास्त्र के शिक्षा की पुष्टि और समर्थन करता है। जो हमसे पहले जा चुके हैं, उनसे सीखने के लिए बहुत कुछ है।

जैसा कि हुआ, धर्मसुधारकों ने देखा कि कलीसिया की प्रारम्भिक शताब्दियों के मसीही शिक्षकों के मध्य “सर्वसम्मति से सहमति” की रोमन कैथोलिक विचार का वास्तविकता में कोई आधार नहीं था। वास्तव में, 1530 ऑग्सबर्ग अंगीकार, ईश्वरविज्ञान का सबसे महत्वपूर्ण प्रारम्भिक लूथरन कथन, रोमी परम्परा के भीतर ही असहमति को प्रकट करता है, जिसमें कलीसिया की शिक्षाओं और मुख्य कलीसियाई पिताओं की शिक्षाओं के मध्य विरोधाभास सम्मिलित हैं। फिर भी, यह बात कि कलीसियाई पिताओं की शिक्षाएँ महत्वपूर्ण हैं, यह सभी के लिए स्पष्ट था। अंतिम अधिकार के रूप में, पवित्रशास्त्र, परमेश्वर का वचन होने के कारण अकेला खड़ा है। परन्तु, बुद्धिमान लोग पवित्रशास्त्र को अकेले नहीं किन्तु दूसरों के साथ पढ़ते हैं, जिनमें वे भी सम्मिलित हैं जो हमसे पहले जा चुके हैं।

मैं यह कहानी इसलिए भी बताता हूँ क्योंकि महासभा अन्य निष्कर्षों पर आई थी जिसे कोई धर्मसुधारक स्वीकार नहीं कर सकता था (और जिन्हें किसी भी प्रोटेस्टेन्ट मसीही को स्वीकार नहीं करना चाहिए)। मुख्य रूप से, धर्मसुधारक यह स्वीकार नहीं कर सकते थे कि कलीसिया का कार्य है “बाइबल का सही अर्थ और व्याख्या . . . न्याय करना है।” इस प्रकार के अधिकार को कलीसिया के हाथों में रखना कलीसिया के ऊपर बाइबल के स्थान पर कलीसिया को बाइबल के ऊपर रखना होगा। इस बात को दृढ़ता से कहना कि इस प्रकार की व्याख्या आवश्यक है यह घोषणा करना था कि बाइबल अपने आप में स्पष्ट नहीं है।

प्रोटेस्टेन्ट कलीसिया का पूरा इतिहास—लूथरवादियों और धर्मसुधारवादियों द्वारा समान रूप से प्रस्तुत अंगीकार और प्रश्नोत्तरी के सैकड़ों में देखा गया—पवित्रशास्त्र का सामर्थ्य और उपयोगिता की साक्षी है और कलीसियाओं को पवित्रशास्त्र के अनुसार सुधरने के लिए कहता है। ये अंगीकार कभी-कभी कलीसिया के इतिहास में महत्वपूर्ण लेखकों को उद्धृत करते हैं। प्रोटेस्टेन्ट लेखकों ने प्राय: ऐसा किया। परन्तु वे समझते थे कि केवल पवित्रशास्त्र ही में उद्धार से सम्बन्धित सभी बातों में आवश्यकता, पर्याप्तता, अन्तिम अधिकार और स्पष्टता के चिह्न हैं। अन्ततः, किसी अन्य लेख की प्रासंगिकता, उपयोगिता, सत्यवादिता, और प्रेरकता का आकलन केवल पवित्रशास्त्र के द्वारा ही किया जाना चाहिए।

1646 में, वेस्टमिंस्टर असेंबली ने, इंग्लैंड के लम्बे धर्मसुधार के अंत में लिखते हुए, घोषणा की,

सर्वोच्च न्यायाधीश जिसके द्वारा धर्म के सभी वाद-विवादों को निर्धारित किया जाना है, और महासभाओं के सभी आदेश, प्राचीन लेखकों की राय, मनुष्यों के सिद्धान्त और निजी आत्माओं की जाँच की जानी है; और जिसकी घोषणा में हमें विश्राम करना हैं; पवित्रशास्त्र में पवित्र आत्मा के बोलने को छोड़ कोई और नहीं हो सकता है। (वेस्टमिंस्टर विश्वास का अंगीकार 1.10)

यह केवल स्वयं पविशास्त्र के लेखकों के दृष्टिकोण को लिखने के लिए था, जिन्होंने अपने कई तर्कों को “प्रभु यों कहता है,” और उसके बाद पवित्रशास्त्र के एक उद्धरण के साथ प्रमाणित किया। क्या हमें महासभाओं के आदेशों का सम्मान करना चाहिए, प्राचीन लेखकों के लिए उच्च सम्मान रखना चाहिए, और अन्य पुरुषों की शिक्षाओं में उचित रुचि होनी चाहिए? हाँ। जैसा कि बुद्धिमान पुरुषों ने अतीत में उल्लेख किया है, कलीसिया में कई समस्याओं से बचा जा सकता था यदि मसीही न केवल वह सुनें जो हम सोचते हैं कि पवित्र आत्मा हमें सिखा रहा है परन्तु वह भी जो उसने दूसरों को सिखाया होगा। फिर भी, अंतर्दृष्टि और बुद्धि के इन स्रोतों में से कोई भी—पोपों की घोषणाओं की तो बात ही छोड़ दें—परमेश्वर के अपने वचन के अधिकार के स्तर तक नहीं बढ़ सकते हैं। यहाँ हमें खड़ा होना चाहिए। 

तो, क्या ऐसे “धर्म के विवाद” हैं जिनका समाधान किया जाना है? तब केवल एक मानक है जो हमारे उपयोग करने के लिए आवश्यक है, एक न्यायालय जिसके लिए प्रत्येक मसीही और कलीसिया को अपील करनी चाहिए। क्या ऐसे “महासभाओं की न्यायिक निर्णय” हैं जिनका मूल्यांकन करने की आवश्यकता है? तब केवल एक ही मापक है जिसके द्वारा इन महासभाओं और उनके आदेशों को आधिकारिक रूप से सही या त्रुटिपूर्वक माना जा सकता है। क्या आपको या आपके मित्रों को “प्राचीन लेखकों के विचारों” का भारीपन से सामना करना पड़ा है? केवल एक ही तराजू है जिसमें उन्हें तौला जा सकता है। क्या हम वार्तालाप, पढ़ने और प्रचार में “मनुष्यों के सिद्धान्तों” का सामना करते हैं? केवल एक ही प्रकाश है जिससे उनकी जाँच की जा सकती है। क्या कलीसिया में “निजी आत्माएं” हैं या व्यक्तिगत विचार हैं? तब केवल एकमात्र ही उपाय है जिसके द्वारा वे जाँचे जा सकते हैं। एक “घोषणा” है जिसमें “हमें विश्राम करना है।” और वह “पवित्रशास्त्र में पवित्र आत्मा के बोलने को छोड़ कोई और नहीं हो सकता है”

यह लेख मूलतः टेबलटॉक पत्रिका में प्रकाशित किया गया।
चैड वैन डिक्सहूर्न
चैड वैन डिक्सहूर्न
डॉ. चैड वैन डिक्सहूर्न फिलाडेल्फिया में वेस्टमिंस्टर थियोलॉजिकल सेमिनरी में कलीसिया इतिहास के प्राध्यापक और वेस्टमिंस्टर स्टैंडर्ड्स के अध्ययन के लिए क्रेग सेंटर के निर्देशक हैं। वे विश्वास का अंगीकार करना (Confessing the Faith) के लेखक हैं।