धर्मीकरण का प्रोटेस्टेन्ट दृष्टिकोण

 
 

आधुनिक संस्कृति में बहुत से लोग धर्मीकरण की प्रोटेस्टेन्ट समझ में निहित दोहरे अभ्यारोपण की शिक्षा से असहज हो जाते हैं। वे कहते हैं कि परमेश्वर अपने पुत्र पर दूसरों के पापों को रखे और साथ ही ख्रीष्ट की योग्यता के आधार पर दोषियों को धर्मी ठहराए—यह बात मानवीय तर्क के विपरीत प्रतीत होती है और “जगतीय बाल शोषण” (cosmic child abuse) के समान लगती है।

परन्तु यह दृष्टिकोण तर्क की एक गम्भीर त्रुटि को प्रकट करता है, क्योंकि पिता अपने पुत्र का दुरुपयोग नहीं करता। इसके विपरीत, क्रूस पर हमारे अपराध ख्रीष्ट के कन्धों पर रखे गए, और उसने अपनी भेड़ों के लिए इस बोझ को स्वेच्छा से उठाया।

इसके अतिरिक्त, दोहरे अभ्यारोपण का विरोध करने वाला दृष्टिकोण परमेश्वर के अपनी सन्तानों के प्रति प्रेम को गम्भीर रूप से कम आँकता है। जैसा कि डॉ. स्प्रॉल इस पाठ में दिखाते हैं, यही प्रेम पापियों को निराशा की दशा से छुड़ाकर उद्धार में ले आता है।