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शिमशोन कौन था? शिमशोन न्यायियों की पुस्तक में वर्णित बारहवाँ, अन्तिम तथा महत्वपूर्ण न्यायी था जैसा कि न्यायियों की पुस्तक अध्याय 13-14 में पाया जाता है। उसका परिवार दान गोत्र से था (न्यायियों 13:2)। एक न्यायी के रूप में, शिमशोन ने मूसा की वाचा के अन्तर्गत एक अधिकारी के रूप में सेवा की तथा वह ख्रीष्ट का एक प्रतिरूप भी था । यह दावा कि शिमशोन ख्रीष्ट का प्रतिरूप था, दो प्रकार से सिद्ध होता है। पहला, न्यायियों की पुस्तक के सभी न्यायी अपने पद के स्वभाव के कारण ख्रीष्ट के प्रतिरूप थे। दूसरा, शिमशोन के जीवन के विशिष्ट घटनाएँ उसे यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले से जोड़ते हैं जो आने वाले राजा का अग्रदूत था, तथा उसे परमेश्वर के उस साधन के रूप में प्रस्तुत करते हैं जिसके द्वारा परमेश्वर ने इस्राएल राष्ट्र को उनके पाप के दासत्व तथा आसपास के राष्ट्रों की अधीनता से छुड़ाया।
शिमशोन, न्यायियों की पुस्तक के सभी प्रमुख न्यायियों के समान, न्यायी पद के कारण ख्रीष्ट का एक प्रतीक के रूप में चित्रित किया गया है। न्यायियों को यहोशू के उत्तराधिकारी के रूप में पहचाना गया है (न्यायियों 1:1; 2:6–10, 16), जिसने मूसा के बाद मूसाई वाचा का मध्यस्थ होने का कार्य सम्भाला था (व्यवस्थाविवरण 31:23; 34:9; यहोशू 1:1–9) एक लेखक इस प्रकार सारांशित करता है:
“इस प्रकार, मूसा और यहोशू के उत्तराधिकारी के रूप में, न्यायियों को सबसे व्यापक अर्थ में वाचा के मध्यस्थ होना था, जिसका केन्द्र बिन्दु परमेश्वर की विशिष्ट आराधना और उसकी विधियों का पालन करना था।
न्यायियों की पुस्तक की दूसरी भूमिका में, न्यायी पद के पाँच प्रमुख कार्य बताए गए हैं (न्यायियों 2:6–3:6)। ये व्यक्ति इस प्रकार थे:
- यहोवा द्वारा ठहराए गए (न्यायियों 2:16, 18);
- यहोवा के आत्मा से सामर्थ्य प्राप्त किए हुए (न्यायियों 2:18; साथ ही देखें 3:10; 4:14; 6:34; 11:29; 13:25; 14:6, 19; 15:14);
- परमेश्वर की प्रजा को छुड़ाने (उद्धार करने) के लिए (न्यायियों 2:16; साथ ही देखें 3:9);
- देश में शान्ति स्थापित करने के लिए (न्यायियों 2:18; साथ ही देखें 3:11; 8:28);
- और इस्राएल को वाचा के प्रति विश्वासयोग्य बनाए रखने के लिए (न्यायियों 2:17–19)।
न्यायियों की पुस्तक में वर्णित न्यायियों के कार्य के प्रत्येक आयाम हमें नए नियम में प्रस्तुत यीशु ख्रीष्ट के व्यक्ति और कार्य की ओर संकेत करता है। यीशु:
- पिता के द्वारा ठहराया गया (यूहन्ना 5:36–37; रोमियों 6:4; गलातियों 1:1);
- पवित्र आत्मा द्वारा सामर्थ्य प्रदान किया गया (मत्ती 3:16; 12:18);
- परमेश्वर के लोगों का उद्धार करने आया (मत्ती 1:21; 1 यूहन्ना 4:14);
- शान्ति प्रदान करने के लिए (मत्ती 11:28–29);
- और परमेश्वर की प्रजा की आज्ञाकारिता को सुनिश्चित करने के लिए (रोमियों 5:19)।
न्यायी पद के अतिरिक्त, शिमशोन के जीवन के विवरण उसे आने वाले राजा का अग्रदूत और उसी राजा का प्रतिरूप ठहराते हैँ। न्यायी के रूप में, शिमशोन को प्रभु ने नियुक्त किया था जैसा कि न्यायियों 13:5 में लिखा है: “ और वह पलिश्तियों के हाथ से इस्राएलियों को छुड़ाना आरम्भ करेगा”। इस प्रकार, शिमशोन का सम्बन्ध राजा दाऊद से जुड़ा हुआ है, जो उस कार्य को पूरा करेगा जो शिमशोन ने आरम्भ किया था (1 शमूएल 17; 2 शमूएल 7:1)
दाऊद राजा के आगमन के अग्रदूत के रूप में यह ध्यान देने योग्य है कि नए नियम की सुसमाचार की पुस्तकों के लेखकों ने न्यायियों की पुस्तक में शिमशोन के जीवन-वृत्तान्त को यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाले के जीवन के वर्णन का आदर्श बनाया, जो स्वयं आनेवाले दाऊदीय राजा का एक और अग्रदूत था। दोनों विवरण समान प्रकार की जन्म-कथाओं से आरम्भ होता है। (न्यायियों 13; लूका 1:5–25)। दोनों की माताएँ बाँझ थीं (न्यायियों 13:2; लूका 1:7)। दोनों के विषय में यह निर्देश दिया गया कि जन्म से पहले ही उन्हें दाखमधु और मदिरा से दूर रखा जाए (न्यायियों 13:3–5; लूका 1:15)। दोनों ही विवरणों में प्रभु का एक स्वर्गदूत जन्म की घोषणा करता है (न्यायियों 13:3; लूका 1:11)। दोनों के पिता प्रभु के स्वर्गदूत द्वारा दी गई इस सूचना पर विश्वास करने में संघर्ष करते हैं (न्यायियों 13:16–17; लूका 1:18–20)। दोनों जन्म-कथाएँ सम्बन्धित व्यक्ति के लिए नियुक्ति या कार्य-विवरण का वर्णन करती हैं (न्यायियों 13:5; लूका 1:16–17)। आगे चलकर, शिमशोन और यूहन्ना बपतिस्मा देने वाला स्त्रियों द्वारा विश्वासघात का शिकार होते हैं (क्रमशः दलिला और हेरोदेस की बेटी), जिसके परिणामस्वरूप उसकी अन्ततः मृत्यु होती है (न्यायियों 16; मत्ती 14:1–12)। अन्त में, दोनों ही व्यक्ति उस राजा के आगमन के अग्रदूत के रूप में सेवा करते हैं, जो परमेश्वर की प्रजा के लिए इससे भी महान् विश्राम प्रदान करेगा (2 शमूएल 7:1; मत्ती 11:28)।
इसके अतिरिक्त, शिमशोन को उन लोगों के द्वारा धोखा दिया जाता है जिनसे वह प्रेम करता है, और अपने ही लोगों के द्वारा शत्रु के हाथों सौंप दिया जाता है। उसकी सामर्थ्य के कार्य और शत्रु पर उसकी विजय यहोवा के आत्मा के द्वारा पूरा हुआ। वास्तव में, न्यायियों की पुस्तक में किसी भी अन्य न्यायी से अधिक, शिमशोन के सन्दर्भ में आत्मा के कार्य का वर्णन चार बार किया गया है (न्यायियों 13:25; 14:6, 19; 15:14)। यद्यपि उसके जीवन में अनेक असफलताएँ थीं, जो उससे महान् किसी और न्यायी की आवश्यकता की ओर संकेत करती हैं, फिर भी शिमशोन पलिश्तियों को पराजित करने के लिए अपने बुलाहट के प्रति मृत्यु तक विश्वासयोग्य रहा। अपनी मृत्यु में ही शिमशोन ने शत्रु पर अपनी सबसे बड़ी विजय प्राप्त की; और यह विजय उसके अपमान के सन्दर्भ में आई जो सच्ची सामर्थ्य का सर्वोच्च प्रकटीकरण है। न्यायियों की पुस्तक में शिमशोन ख्रीष्ट का प्रतिरूप है, न कि हमारा। शिमशोन और यीशु उद्धारकर्ता हैं, और हम वे हैं जिन्हें उद्धार की आवश्यकता है। न्यायियों की पुस्तक में शिमशोन के जीवन के महत्व को रेखांकित करते हुए, बैरी वेब ने यह टिप्पणी की है:
उसका जन्म पहले से ही एक स्वर्गदूत के द्वारा घोषित किया गया। उसका गर्भधारण आलौकिक था। उसे अपने ही लोगों के द्वारा अस्वीकार किया गया। उसके अगुवों ने उसे बाँधा और अपने मूर्तिपूजक शासकों के हाथों सौंप दिया (16:13)। उसका उद्धारकारी कार्य उसकी मृत्यु में पूर्ण होता है, एक ऐसी मृत्यु जिसमें वह दागोन को गिरा देता है और भविष्य में और अधिक पूर्ण रूप से प्रकट होने वाले उद्धार की नींव रखता है। दूसरे शब्दों में, यहाँ इस अत्यन्त असम्भव प्रतीत होने वाले पात्र में हम सम्भवतः पूरे पुराने नियम में कहीं और की अपेक्षा अधिक स्पष्ट रूप से आने वाली बातों का आकार देखते हैं।
शिमशोन कौन था? शिमशोन ख्रीष्ट का प्रतिरूप था और आज भी है (इब्रानियों 11:32–40)।
यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

