“पवित्र” का क्या अर्थ है? - लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ %
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“पवित्र” का क्या अर्थ है?

मेरी युवावस्था के दिनों में मुझे स्मरण है कि फिलाडेल्फिया में चलने वाली लोकल ट्रेन में, जब भी ट्रेन चेस्टर मार्ग पर स्थित अति धन्य संस्कार की कलीसिया (Church of the Most Blessed Sacrament) भवन के सामने से होकर निकलती थी, कैथोलिक भक्त स्वयं पर क्रूस का चिह्न बनाते थे। जिस पवित्रता को उन्होंने पहचाना था वह न केवल भवन के लिए थी परन्तु विशेष रीति से वहाँ रखे गए संस्कार (sacraments) के तत्वों के लिए थी। पश्चिमी फिलाडेल्फिया में अधिकाँशतः आयरलैंड लोग रोमन कैथोलिक थे। शेष उत्तरी आयरलैंड से थे, और वेस्टमिंस्टर प्रिसबुतिरवादी कलीसिया में आराधना करते थे।

जब प्रोटेस्टेंट लोग कलीसिया जाने के विषय में बात करते हैं, तो वे किसी भवन की नहीं परन्तु मण्डली के विषय में विचार करते हैं। भवन नहीं किन्तु मण्डली पवित्र है। स्कॉटलैंड के कवि रॉबर्ट बर्न्स इस बात से अवगत थे कि बाइबल परमेश्वर के लोगों को “सन्त” कहकर सम्बोधित करती है, यद्यपि वह उस जूँ से ध्यान नहीं हटा पा रहा था जो कलीसिया में उसके सामने बैठे एक सन्त की टोपी के ऊपर चल रही थी।

जब आराधकों का इतनी सरलता से ध्यान भटक जाता है, तो वे परमेश्वर के पवित्र नाम का भय भूल जाते हैं।

वे मात्र श्रोतागण नहीं हैं; वे मण्डली के रूप में इसलिए एकत्रित हुए हैं क्योंकि वे पवित्र जन के द्वारा बुलाए गए हैं। कलीसिया पवित्र है क्योंकि मण्डली परमेश्वर का निवास स्थान है। पुराने नियम में परमेश्वर ने मूसा को अपने लोगों के मध्य में अपने निवास का प्रतीक दिया था। जब इस्राएल मिस्र से प्रतिज्ञा के देश की ओर यात्रा करके जा रहा था तब परमेश्वर ने इस्राएल की छावनी के मध्य में अपना पवित्र तम्बू स्थापित किया था। इस्राएल के बराह गोत्र अपने कुलों और परिवारों के साथ, परमेश्वर के तम्बू के चारों ओर निवास कर रहे थे। जब मूसा सीनै पर्वत पर दस आज्ञाओं और परमेश्वर के तम्बू की योजना को प्राप्त कर रहा था, तब इस्राएल सोने का बछड़ा बनाकर दूसरी आज्ञा को तोड़ रहा था। फिर वे उस मूर्ती की आराधना भी कर रहे थे। वे कहने लगे, “हम नहीं जानते कि मूसा को क्या हो गया। यही हमारा ईश्वर है जो हमें मिस्र से निकाल कर लाया है।”

परमेश्वर ऐसे लोगों के साथ क्या कर सकता था? परमेश्वर कहता है कि वह ऐसे “हठीली” लोगों के मध्य में नहीं रह सकता है। वह पवित्र है, और उसकी पवित्रता उनके लिए बहुत बड़ी विपत्ति का कारण थी। उसका न्याय उनको क्षणभर में नाश कर सकता था। वह उनके आगे-आगे तो जाएगा परन्तु उनके मध्य में निवास नहीं करेगा। परमेश्वर मूसा से छावनी के बाहर तम्बू में मिलता था जहाँ यहोशू रहता था। फिर भी मूसा ने परमेश्वर के सम्मुख उसी के शब्दों को दोहराया। उसने प्रार्थना की कि परमेश्वर उनके मध्य में रहे और विशेष रीति से उनका परमेश्वर हो क्योंकि वह हठीले पापी लोग थे। उन्हें क्षमाशील अनुग्रह में उसकी उपस्थिति की आवश्यकता थी।

क्योंकि परमेश्वर पवित्र है, इसलिए परमेश्वर के लोगों को भी पवित्र होना चाहिए। यह कैसे सम्भव है? मार्गदर्शन के लिए, परमेश्वर ने उन्हें व्यवस्था और प्रायश्चित और शुद्धिकरण का प्रावधान दिया। पाप के कारण दोष और अशुद्धता दोनों आए। पाप की मज़दूरी मृत्यु है। जब पापी अपने हाथ को अपने प्रतिस्थापक मेमने के सिर पर हाथ रखकर पापों का अंगीकार करता था तब वह मेमना बलिदान किया जाता था। पाप दूषित भी करता है। तम्बू के प्रवेश द्वार पर पानी का पात्र था जो याजक परमेश्वर के सम्मुख पवित्र स्थान में प्रवेश करने से पहले अपने दूषण को दूर करने के प्रतीक स्वरूप उपयोग करता था।
फरीसी यीशु के शिष्यों की निन्दा कर रहे थे क्योंकि उन्होंने भोजन करने से पहले अपने हाथों को नहीं धोया। समस्या स्वच्छता की नहीं परन्तु विधि-सम्बन्धी शुद्धता की है। यीशु ने अपने शिष्यों का बचाव किया। उन्होंने जो अपने मुँह में डाला उसने उनको अशुद्ध नहीं किया था; भोजन तो उनके पेट के लिए ही था। जो उनके मुँह से बाहर आता था वह उनको अशुद्ध करता था। उनके मुँह के शब्द उनके हृदय की दुष्टता को प्रकट करते थे।

यीशु ने रीति-विधि (ceremonial) की व्यवस्था को परिवर्तीत कर दिया जैसा कि उसने उसकी पूर्ति को दिखाया। उसने व्यवस्था को किनारे नहीं कर दिया। उसे कहा कि व्यवस्था का एक भी कण या बिन्दु नहीं टलेगा जब तक कि सब पूरा न हो जाए। “जोट”, “य” (योध) इब्रानी वर्णमाला का सबसे छोटा अक्षर है, जो लिखने की रेखा से ऊपर होता है, यह तो अन्य अक्षरों जितना स्थान नहीं लेता है। बिन्दु इब्रानी भाषा का एक पूर्ण अक्षर भी नहीं है, परन्तु “क” के नीचे से निकलने वाली नोक है जो इसे “ब” की ध्वनि देता है।

यीशु ने पुराने नियम की अभिप्रेरणा का समर्थन किया, न केवल “पूर्ण” या “सम्पूर्ण” रीति से परन्तु “शाब्दिक” भी अर्थात् शब्दों के अक्षर भी प्रेरिणा से भरे हुए थे। यहूदी शास्त्रियों ने सभी अक्षरों को गिनकर और खण्ड के केन्द्र में अक्षर को चिह्नित करके पवित्रशास्त्र की अपनी प्रतियों की सटीकता की जाँच की है। किन्तु जो यीशु ने कहा उसका अर्थ, खण्ड की शाब्दिक व्याख्या का समर्थन करना नहीं था, क्योंकि उसने मात्र यह नहीं कहा कि हर एक अक्षर संरक्षित होगा परन्तु हर एक अक्षर पूरा किया जाएगा। वचन की पूर्ती पवित्र वचन के नबूवत की प्रकृति के विषय में बात करती है। दस आज्ञाएँ यीशु की शिक्षा के द्वारा परिवर्तित हो गई हैं। निसन्देह, यीशु ने सिद्ध रीति से व्यवस्था को पूरा किया। उसकी सिद्ध धार्मिकता हमारे खाते में डाली गई, वैसे ही जैसे हमारे पाप उसके खाते में डाले गए। उससे बढ़कर यीशु ने न केवल अपनी शिक्षा में परन्तु अपने जीवन के द्वारा भी व्यवस्था को परिवर्तित कर दिया। यीशु ने आने वाले राज्य के बारे में उद्घोषणा की।

अपने पहाड़ी उपदेश में, यीशु ने दिखाया कि सच्ची धार्मिकता अवश्य ही शुद्ध हृदय से आरम्भ होगी। पहली आज्ञा है कि अपने प्रभु परमेश्वर से अपने पूरे हृदय और प्राण से प्रेम करो। दूसरी आज्ञा, इसी के समान और इसी से प्रभावित है कि अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम करो। उसका सारांश यह था कि: “सिद्ध बनो, जैसे तुम्हारा स्वर्गीय पिता सिद्ध है।”

यीशु जिस पवित्रता की माँग कर रहा है वह उसके पिता की पवित्रता से किसी भी रीति से कम नहीं है। यीशु जो परमेश्वर का पवित्र जन है अपने पिता की पवित्रता को दिखाता है। वह पवित्रता पाप के विद्रोह के विरुद्ध जलती है। फिर भी उसी पवित्रता के कारण जो प्रेम द्वारा ज्वलित है उसने अपने पुत्र को क्रूस पर बलिदान कर दिया। कलवरी के उस अन्धकार में, पिता ने अपने पुत्र को त्याग दिया क्योंकि ख्रीष्ट उस प्रकोप को सह रहा था जिसके पात्र हम थे। जब हम परमेश्वर के शत्रु ही थे, ख्रीष्ट हमारे लिए मरा। हमारे प्रति (जो उसके शत्रु थे) अपने प्रेम के कारण पिता ने अपने पुत्र को भी न छोड़ा, परन्तु हमारे लिए उसको बलिदान कर दिया।

पुराने नियम में परमेश्वर के मन्दिर को पृथक करना, परमेश्वर का अपने लोगों के मध्य में निवास करने का प्रतीक था। यीशु ने व्यवस्था को पूरा करते हुए उसको परिवर्तित किया। तम्बू और मन्दिर का होना यीशु में पूरा होता है। देहधारी ख्रीष्ट में होकर प्रभु हमारे मध्य निवास करता है, क्योंकि वह परमेश्वर का पवित्र जन है। अपने स्वयं की देह के विषय में बात करते हुए यीशु ने कहा, “इस मन्दिर को ढा दो और मैं इसे तीन दिन में फिर खड़ा कर दूँगा” (यूहन्ना 2:19)।
ख्रीष्ट के साथ मिलन इस बात का केन्द्रिय सिद्धान्त है कि परमेश्वर हमारे मध्य कैसे निवास करता है। यह मिलन पवित्र आत्मा का कार्य है, जो महिमा में ख्रीष्ट के सिंहासन से भेजा गया है। ख्रीष्ट से हमारा मिलन मात्र हमारे प्रतिनिधि के रूप में ही नहीं हुआ है, जो हमारे लिए जिया, मरा और फिर से जी उठा; पवित्र आत्मा की उपस्थिति के कारण ख्रीष्ट के साथ हमारा महत्वपूर्ण रीति से मिलन हुआ है। उसने हमें अनाथ नहीं छोड़ा है। वह हमारे निकट आता है, और वह हमारे मध्य हमारे ह़़ृदयों में और कलीसियाई सभा में निवास करता है।

हम उसके वचनों को सुनने के लिए, आराधना में सही प्रतिउत्तर करने के लिए, उसका स्तुति-गान करने के लिए, कलीसिया और संसार के लिए प्रार्थना करने हेतु, उसके राज्य के कार्य में सहयोग करने के लिए, और जब हम प्रभु-भोज में रोटी और प्याले में सहभागी होते हैं तो एक दूसरे का शान्ति से अभिवादन करते हैं। सब कुछ उद्धारकर्ता की ओर से, उसके आत्मा के द्वारा और उसके पिता की महिमा के लिए है। जैसे कि शिष्य पहाड़ पर बादलों को देख रहे थे, हम किसी साधारण मनुष्य को नहीं परन्तु यीशु को ही देखते हैं।

 यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।