Is Human Nature Basically Good or Completely Sinful?
क्या मनुष्य का स्वभाव मूलतः अच्छा है या पूर्णतः पापमय है?
9 अप्रैल 2026
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परमेश्वर का क्रोध क्या है?

What Is the Wrath of God?

परमेश्वर का क्रोध हमारे पवित्र और धर्मी परमेश्वर की वह प्रतिक्रिया है जो वह पाप और उन पापियों के विरुद्ध प्रकट करता है जिनके पाप ख्रीष्ट के प्रायश्चित्त से ढके नहीं गए हैं। यद्यपि बहुत से लोग परमेश्वर को क्रोध करने वाला मानना पसन्द नहीं करते, फिर भी पवित्रशास्त्र बार-बार दुष्टता के विरुद्ध प्रभु के क्रोध के प्रकट होने का उल्लेख करता है। पुराना और नया दोनों नियम पर्याप्त रीति से यह साक्ष्य देते हैं कि परमेश्वर अधर्म पर अपना क्रोध प्रकट करता है (देखें: व्यवस्थाविवरण 9:8; 2 राजा 23:26; भजन 21:9; 90:11; यशायाह 13:9; मीका 5:15; सपन्याह 1:18; यूहन्ना 3:36; रोमियों 1:18; इफिसियों 5:6; प्रकाशितवाक्य 16:1)।

ईश्वरीय क्रोध और परमेश्वर के गुण

परमेश्वर जो है उसके कारण अधर्म पर अपना क्रोध प्रकट करता है। पवित्रशास्त्र सिखाता है कि परमेश्वर धर्मी और न्यायी है (व्यवस्थाविवरण 32:4; दानिय्येल 9:14; रोमियों 1:17; प्रकाशितवाक्य 15:3)। यदि वह बुराई और बुराई करने वालों को दण्डित न करे, तो वह धर्मी और न्यायी नहीं रह सकता; इसलिए पाप पर उसका क्रोध उण्डेलना उसके धर्मी चरित्र के साथ पूर्णतः संगत है। पापियों को अपने अपराधों का दण्ड अवश्य भुगतना चाहिए, और परमेश्वर अपने न्यायपूर्ण क्रोध को प्रकट किए बिना दोषी को निर्दोष नहीं ठहरा सकता, अन्यथा वह स्वयं अधर्मी ठहरेगा (निर्गमन 34:6–9)। परमेश्वर प्रेम है (1 यूहन्ना 4:7–8), और जिन बातों से वह प्रेम करता है उनमें से एक धार्मिकता है (भजन 33:5)। क्योंकि परमेश्वर सिद्ध है, इसलिए धार्मिकता के प्रति उसका प्रेम भी सिद्ध होना चाहिए; परिणामस्वरूप, उसे “दुष्ट के मार्ग” से घृणा करनी ही चाहिए (नीतिवचन 15:9; यह भी देखें: व्यवस्थाविवरण 32:4)।

परमेश्वर तब तक क्रोध प्रकट नहीं कर सकता जब तक पाप न हो, और पाप तब तक नहीं हो सकता जब तक ऐसे प्राणी न हों जो पाप करते हैं। इसलिए सृष्टि और उसके पतन के बिना ईश्वरीय क्रोध का प्रगटीकरण सम्भव नहीं है। इसी कारण बहुत से ईश्वरविज्ञानी क्रोध को परमेश्वर का सापेक्ष ईश्वरीय गुण मानते हैं, न कि परम ईश्वरीय गुण। परम ईश्वरीय गुण वह गुण है जो परमेश्वर में तब भी प्रकट होता या कार्य करता यदि प्रभु ने कभी कुछ भी सृष्टि न की होती। परम अलौकिक गुणों में अनन्तता और सर्वज्ञान जैसे गुण सम्मिलित हैं। चाहे परमेश्वर ने कभी इस विश्व की सृष्टि की होती या नहीं, वह अनन्त और सर्वज्ञानी ही रहता।

सापेक्ष ईश्वरीय गुण तब तक प्रकट नहीं होते जब तक परमेश्वर के बाहर कोई ऐसी वस्तु न हो जिसके साथ वह सम्बन्ध रखे। जैसा ऊपर उल्लेख किया गया है, क्रोध एक सापेक्ष ईश्वरीय गुण है, क्योंकि यदि पापी न होते, तो ईश्वरीय क्रोध का प्रकट होना भी न होता। परन्तु ऐसा नहीं है कि क्रोध (या कोई अन्य सापेक्ष ईश्वरीय गुण) सृष्टि के कारण परमेश्वर को प्राप्त होता है। परमेश्वर अपने स्वभाव के कारण, जो कि भला और धर्मी है, पाप के प्रति क्रोध प्रकट करता है। ईश्वरीय क्रोध इसलिए प्रकट होता है क्योंकि सृष्ट प्राणी बदल गया है और पापी बन गया है, न कि इसलिए कि स्वयं परमेश्वर बदलता है। पापी उस समय क्रोध का अनुभव करते हैं जब वे उस स्वभावतः धर्मी परमेश्वर के सामने आते हैं, न कि इसलिए कि पतन के समय प्रभु ने कोई नया गुण धारण किया हो। वास्तव में तो, परमेश्वर परिवर्तित नहीं होता (मलाकी 3:6)।

परमेश्वर के क्रोध का अनुभव

पवित्रशास्त्र स्पष्ट करता है कि परमेश्वर का क्रोध अत्यन्त भयानक है। बाइबल प्रायः परमेश्वर के क्रोध की ज्वलन्त उष्णता का वर्णन करती है (निर्गमन 32:11; विलापगीत 4:11), और उन पापियों के लिए जो कभी अपने पाप से फिरकर ख्रीष्ट के पास नहीं आते, परमेश्वर के अनन्त क्रोध के स्थान को “आग की झील” के रूप में भी वर्णित करती है (प्रकाशितवाक्य 20:10)। यशायाह 66:24 को उद्धृत करते हुए, यीशु कहता है कि नरक में “उनका कीड़ा नहीं मरता” (मरकुस 9:42–49)। इस चित्र के द्वारा हमारा उद्धारकर्ता परमेश्वर के न्याय को पापी के निरन्तर और विनाशकारी भोग के रूप में प्रस्तुत करता है। नबी और प्रेरित “प्रभु के दिन” पर आने वाले महान् विनाश और न्याय का वर्णन करते हैं। यह अभिव्यक्ति इतिहास के कुछ विशेष समयों में परमेश्वर के न्याय के उण्डेले जाने के साथ-साथ समय के अन्त में होने वाले उसके अन्तिम न्याय को भी सूचित कर सकती है (यशायाह 13:6; यहेजकेल 30:3; योएल 1:15; 2 पतरस 3:10)।

उपर्युक्त वर्णनों के कारण बहुत से लोग सम्भवतः यह सोचते हैं कि परमेश्वर का क्रोध केवल अद्भुत और अग्निमय न्याय के प्रदर्शन में ही प्रकट होता है। परन्तु यह समझना आवश्यक है कि ऐसे प्रकट न्याय वास्तव में उस क्रोध की पराकाष्ठा हैं जो पहले से ही प्रकट हो रहा होता है। रोमियों 1:18–32 जैसे पद यह संकेत करते हैं कि परमेश्वर प्रायः अपना क्रोध एक ही बार में प्रकट नहीं करता, वरन् समय के साथ करता है। पौलुस हमें बताता है कि परमेश्वर का क्रोध इस बात में प्रकट होता है कि वह लोगों को उनके पाप के हवाले कर देता है और उन्हें उसमें और अधिक गहराई से उलझने देता है। परमेश्वर प्रायः हठी पापियों को उस पाप में लगे रहने देता है जिसकी वे इच्छा करते हैं, इससे पहले कि वह अन्ततः उसे अग्निमय न्याय में नष्ट करे। इस प्रकार, परमेश्वर अपने क्रोध में हठी पापियों को उनके पाप के ही अधीन कर देता है।

परमेश्वर के क्रोध के अधीन लोगों के लिए आशा

पापियों पर आने वाला क्रोध का एक अन्तिम दिन निश्चित है। परन्तु धन्यवाद की बात यह है कि परमेश्वर दयालु भी है, और उसने हमें आने वाले क्रोध से बचाने के लिए प्रभु यीशु ख्रीष्ट को प्रदान किया है (1 थिस्सलुनीकियों 1:10)। यीशु ख्रीष्ट परमेश्वर का पुत्र है, जो हमारे धर्मी परमेश्वर के पाप के विरुद्ध दण्ड को उठाने के लिए देहधारी हुआ। यीशु ख्रीष्ट में परमेश्वर ने अपना क्रोध उण्डेल दिया, और उसे स्वयं पर ले लिया। इस प्रकार वह अपने आपको धर्मी ठहराता है, क्योंकि पाप का दण्ड ख्रीष्ट में दिया गया; और साथ ही दयालु भी ठहरता है, क्योंकि ख्रीष्ट का प्रायश्चित्त यह सुनिश्चित करता है कि जो पापी अपने पाप से मन फिराते हैं और यीशु पर विश्वास करते हैं, उनके प्रति वह अब अनुकूल और प्रसन्न हो सकता है (रोमियों 3:21–31)। प्रभु अटल प्रेम और दया प्रकट करने में प्रसन्न होता है (मीका 7:18), और जो कोई भी उद्धार के लिए केवल यीशु पर ही भरोसा करता है वह परमेश्वर के अनन्त क्रोध से पूर्ण रीति से उद्धार पाएगा (इब्रानियों 7:25)।

 यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

रॉर्बट रॉथवेल
रॉर्बट रॉथवेल
रेव रॉबर्ट रोथवेल लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ के वरिष्ठ लेखक, टैबलेटटॉक पत्रिका के एसोसिएट एडिटर, रिफॉर्मेशन बाइबिल कॉलेज में रेजिडेंट एडजंक्ट प्रोफेसर और पोर्ट ऑरेंज, फ्लोरिडा में स्प्रूस क्रीक प्रेस्बिटेरियन चर्च के एसोसिएट पास्टर हैं।