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मत्ती 24, जिसे प्रायः जैतून पर्वत का उपदेश या छोटा रहस्योद्घाटन (Little Apocalypse) कहा जाता है, समय के संकेतों और युग के अन्त के विषय पर पवित्रशास्त्र में सबसे महत्वपूर्ण खण्डों में से एक है। परन्तु, यह व्याख्या करने के लिए भी पवित्रशास्त्र में सबसे कठिन खण्डों में से एक है।
आधुनिक काल में, कई आलोचक विद्वानों ने तर्क दिया है कि यीशु की भविष्यवाणी ने त्रुटि करते हुए 70 ईस्वी में यरूशलेम में मन्दिर के विनाश को उसके आगमन और युग के अन्त से जोड़ दिया। युगवादी (Dispensationalists) इस खण्ड की व्याख्या अधिकाँशतः भविष्यवादी रीति से करते हैं, यह तर्क देते हुए कि यह सात वर्ष के “महान क्लेश” (great tribulation) के समय यरूशलेम में एक पुनर्निर्मित मन्दिर के विनाश को सन्दर्भित करता है जो “मेघारोण” (rapture) के बाद होगा। कुछ धर्मसुधारवादी ईश्वरविज्ञानी मत्ती 24:1-34 की व्याख्या अतीतवादी (preterist) रीति से करते हैं और मानते हैं कि यीशु केवल मन्दिर के विनाश से पहले और उस समय की घटनाओं के विषय में भविष्यवाणी कर रहे हैं। केवल पद 36 और उसके बाद ही यीशु उन घटनाओं के विषय में बात करता है जो मन्दिर के विनाश के बाद होंगी। कुछ अन्य धर्मसुधारवादी ईश्वरविज्ञानी मत्ती 24-25 की व्याख्या ख्रीष्ट के पहले और दूसरे आगमन के बीच छुटकारे के इतिहास की पूरी अवधि का वर्णन करने के लिए करते हैं। उनके अनुसार, यीशु का उपदेश, यहाँ तक कि मत्ती 24:1-34 में भी, न केवल 70 ईस्वी में मन्दिर के विनाश का वर्णन कर रहा है, वरन् जीवित और मृतकों का न्याय करने के लिए ख्रीष्ट के अन्तिम आगमन तक इस वर्तमान युग के चरित्र का भी वर्णन कर रहा है।
जैतून पर्वत के उपदेश की जटिलता के कारण, यहाँ दी गई व्याख्या इस जागरूकता के साथ प्रस्तुत की गई है कि यह कुछ प्रश्नों को अनुत्तरित छोड़ सकती है। जबकि हम पवित्रशास्त्र की स्पष्टता की पुष्टि कर सकते हैं, हमें इस बात पर बल देने की आवश्यकता नहीं है कि हर खण्ड “एक जैसा स्पष्ट” है (वेस्टमिंस्टर विश्वास अंगीकार 1.7)।
एक दोहरा प्रश्न: एक व्याख्यात्मक कुंजी
मत्ती 24-25 की व्याख्या की कुंजी उस प्रश्न में निहित है जिसे शिष्यों ने यीशु से तब पूछा जब उसने भविष्यवाणी की कि यरूशलेम का मन्दिर नष्ट हो जाएगा। यीशु की भविष्यवाणी सुनकर, शिष्य अकेले में यीशु के पास आए और उन्होंने पूछा, “हमें बता ये बातें कब होंगी, और तेरे आने का तथा इस युग के अन्त का क्या चिह्न होगा?” (24:3; मरकुस 13:4 भी देखें)। यीशु से पूछा गया प्रश्न दो अलग-अलग बातों पर केन्द्रित करता है: (1) यरूशलेम के मन्दिर के विनाश का समय, और (2) वे घटनाएँ या परिस्थितियाँ जो यीशु के आने और इस वर्तमान युग के समाप्त होने का संकेत देंगे।
जबकि यह सम्भावना है कि चेलों के प्रश्न में यह मान लिया गया था कि मन्दिर का विनाश और इस वर्तमान युग के अन्त में ख्रीष्ट का आना एक ही समय की घटनाएँ थीं, फिर भी वे अलग-अलग हैं। इस बात के महात्व को घटाया नहीं जा सकता है। जब मत्ती 24-25 में उपदेश पढ़ते समय, यह पूछना सदैव अवश्यक है: क्या यीशु अपने चेलों के प्रश्न के पहले भाग को सम्बोधित कर रहा है जो मन्दिर के विनाश के विषय में है? या क्या वह चेलों के प्रश्न के दूसरे भाग को सम्बोधित कर रहा है जो उसके आने और इस वर्तमान युग के समाप्त होने के विषय में है?
मत्ती 24-25 के उपदेश को तीन भागों में बाँटा जा सकता है: मत्ती 24:4-14 उन समय के संकेतों का वर्णन करता है जो ख्रीष्ट के पहले और दूसरे आगमन के बीच इतिहास के इस वर्तमान समय को चिह्नित करेंगे; मत्ती 24:15-25 “महान क्लेश” के समय का वर्णन करता है जो इस्राएल पर आएगा और इसमें यरूशलेम में मन्दिर का विनाश सम्मलित है; और मत्ती 24:26-25:46 विशेष रूप से युग के अन्त में मनुष्य के पुत्र के आने पर केन्द्रित करता है और इसमें उसके आने तक जागते रहने का आह्वान सम्मलित है।
समयों के संकेतों और अन्तर-आगमन (Intradvent) काल
उपदेश का पहला भाग (24:4-14) विभिन्न संकेतों का वर्णन करता है जो ख्रीष्ट के आने से पहले इतिहास को चिह्नित करेंगे: झूठे ख्रीष्ट (पद 5), युद्ध और युद्ध की अफवाहें (पद 6), अकाल और भूकम्प (पद 7), क्लेश (पद 9), धर्मत्याग (पद 10), झूठे नबी (पद 11), अराजकता (पद 12), और सभी राष्ट्रों को सुसमाचार का प्रचार (पद 14)। अतीतवादी तर्क देते हैं कि ये सभी संकेत यरूशलेम में मन्दिर के विनाश से पहले हुए थे। वे अतीत की घटनाएँ हैं और उन परिस्थितियों का उल्लेख नहीं करते हैं जो ख्रीष्ट के पहले और दूसरे आगमन के बीच की पूरी अवधि के समय होंगी। भविष्यवादी (Futurists) तर्क देते हैं कि भले ही इनमें से कुछ परिस्थितियाँ अन्तर-आगमन काल की विशेषता हो सकती हैं, वे विशेष रूप से ख्रीष्ट के दूसरे आगमन से ठीक पहले “अन्त समय” की घटनाओं का उल्लेख करती हैं।
इनमें से कोई विचार सही नहीं है। इन पदों में, यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि यीशु अपने आने और युग के अन्त के विषय में चेलों के प्रश्न के दूसरे भाग का उत्तर दे रहे हैं। उपदेश के प्रारम्भिक भाग में बार-बार आने वाला एक विषय यह है कि चेलों को “अन्त” आने से पहले कुछ समय बीतने की अपेक्षा करनी चाहिए। यीशु जिन परिस्थितियों की पहचान करता है, वे “जन्म की पीड़ा के आरम्भ मात्र हैं” (पद 8; रोमियों 8:20-25 भी देखें)। जब ऐसा हो तो उनके चेलों को “घबराना” नहीं चाहिए (मत्ती 24:6)। न ही उन्हें समय से पहले यह निष्कर्ष निकालना चाहिए कि “अन्त” निकट है। “अन्त तभी आएगा” जब राज्य का सुसमाचार “राज्य का यह सुसमाचार सारे जगत में प्रचार किया जाएगा” (पद 14)। इसलिए, यीशु के उपदेश के इस भाग की सबसे सम्भावित व्याख्या यह है कि वह युग के अन्त में अपने आने से पहले छुटकारे के इतिहास का एक व्यापक दृश्य दे रहा है।
मन्दिर का विनाश
उपदेश के दूसरे भाग (पद 15-25) में, यीशु अपना ध्यान चेलों के प्रश्न के पहले भाग पर ले जाता है: मन्दिर कब नष्ट होगा? यद्यपि भविष्यवादी (युगवादी) लेखक मानते हैं कि मन्दिर के विनाश के विषय में यीशु की भविष्यवाणी एक भविष्य की घटना को बताती है जो ख्रीष्ट के आने और कलीसिया के “मेघारोण” के बाद होगी, यीशु की भविष्यवाणी का सन्दर्भ और लूका 21:20 में समानान्तर खण्ड इस विचार के विरुध निर्णायक रूप से तर्क देते हैं। उपदेश के इस भाग का स्पष्ट सन्दर्भ चेलों का यह प्रश्न है कि मन्दिर कब नष्ट होगा। यीशु जिस भाषा का उपयोग करता है, जिसमें दानिय्येल 9:17 में उसके भविष्यवाणी का सन्दर्भ भी सम्मलित है (मत्ती 24:15), वह इतनी विशिष्ट और स्पष्ट है कि इसे AD 70 में मन्दिर के विनाश के समय जो हुआ, उसके भविष्यसूचक वर्णन के अतरिक्त किसी और रीति से नहीं समझा जा सकता। इसके अतरिक्त, जब यीशु पद 34 में कहता है कि “जब तक ये सब बातें पूरी न हो जाएँ इस पीढ़ी का अन्त न होगा” (विशेष बल दिया गया), तो वह मन्दिर के विनाश के अपने जीवन्त वर्णन के तुरन्त बाद ऐसा करता है। इसी कारण से, धर्मसुधारवादी व्याख्याकारों ने इस उपदेश के इस भाग को मन्दिर के विनाश के समय के विषय में चेलों के प्रश्न का यीशु का उत्तर माना है।
मनुष्य के पुत्र का आगमन: समय का प्रश्न
परन्तु जैतून पर्वत के उपदेश में व्याख्या करने के लिए सबसे कठिन भाग उस भाग में है जिसे मैंने इसका तीसरा भाग कहा है। उपदेश के इस भाग में, यीशु चेलों के प्रश्न के दूसरे भाग पर लौटते हैं: “तेरे आने का तथा इस युग के अन्त का क्या चिह्न होगा?”
उपदेश के इस भाग और मत्ती 24 और मत्ती 25 के शेष भागों में जो कुछ आता है, उसके संबंध में, धर्मसुधारवादी व्याख्याकारों ने दो पूर्णतः अलग-अलग विचार अपनाए हैं। कुछ लोग तर्क देते हैं कि “मनुष्य के पुत्र का आगमन,” विशेषकर जैसा कि 24:27-31 में वर्णित है, AD 70 में मन्दिर के विनाश के समय अविश्वासी इस्राएल पर न्याय के लिए यीशु के आने को सन्दर्भित करता है। उनके विचार में, मत्ती 24:4-34 का पूरा भाग उस समय जो होगा, उसका एक भविष्यसूचक वर्णन है। केवल पद 34 के बाद ही यीशु अपने दूसरे आगमन के विषय में बात करना आरम्भ करता है। दूसरे लोग तर्क देते हैं कि इस समय यीशु चेलों के प्रश्न के दूसरे भाग पर लौट रहा है। उनके अनुसार, इस समय मनुष्य के पुत्र के आने को (जैसा कि मत्ती 24-25 के शेष भागों में है) ख्रीष्ट का दूसरा आगमन मानने के लिए पर्याप्त कारण हैं। बात को अधिक सरल बनाने के जोखिम पर, दो तर्क दूसरे व्याख्या का समर्थन करते हैं।
पहला, 24:27-31 में मनुष्य के पुत्र के आने का वर्णन करने के लिए उपयोग की गई भाषा कई बाइबल के खण्डों के समानान्तर है जो ख्रीष्ट के दूसरे आगमन का उल्लेख करते हैं। इन पदों में मनुष्य के पुत्र का आना एक सार्वजनिक घटना है, जैसे बिजली जो पूरब से पश्चिम तक चमकती है (पद 27)। इसे “पृथ्वी की सभी जातियाँ” देखेंगी, जो “मनुष्य के पुत्र को सामर्थ्य तथा बड़े वैभव सहित आकाश के बादलों पर आते देखेंगे” (पद 30)। यीशु स्पष्ट रूप से इस आगमन को “मनुष्य के पुत्र के चिन्ह” से जोड़ता है, जो स्पष्ट रूप से पद 3 में चेलों के प्रश्न के दूसरे भाग का संकेत है। इसके अतरिक्त, इस आगमन के साथ होने वाली घटनाएँ—राष्ट्रों को इकट्ठा करने के लिए अपने स्वर्गदूतों को भेजना, एक ज़ोरदार तुरही की आवाज़, सूर्य के प्रकाश के विफल होने और स्वर्ग के हिलने के बड़े संकेत, राष्ट्रों का विलाप (पद 29, 31)—ख्रीष्ट के अन्तिम आगमन और जीवित और मृतकों के न्याय के सामान्य नए नियम के वर्णनों के समानान्तर हैं (जैसे, मत्ती 13:40–41; 16:27; 25:31; 1 कुरिंथियों 11:26; 15:52; 16:22; 1 थिस्सलुनीकियों 4:14–17; 2 थिस्सलुनीकियों 2:1–8; 2 पतरस 3:10–12; प्रकाशितवाक्य 1:7)।
दूसरा, मत्ती 24:34 और 24:36 के बीच का अन्तर इस बात का तर्क देता है कि यरूशलेम में मन्दिर के नष्ट होने के समय और ख्रीष्ट के दूसरे आगमन के समय के बीच एक स्पष्ट अन्तर है। चेलों के प्रश्न के दोहरे केन्द्र के भाग से, पद 34 इस बात की पुष्टि करता है कि मन्दिर का विनाश उस पीढ़ी के जीवनकाल में होगा जिससे वह बात कर रहे था, जबकि पद 36 सिखाता है कि “उस दिन” का समय कोई नहीं जानता जब वह युग के अन्त में आएगा। जैसा कि जॉन मुर्रे इन पदों के विषय में कहते हैं:
पद 36 के क्रम को अन्देखा करना और पद 34 को उसी के अनुसार उसे समझने में विफल रहना एक महान् चूक होगी। इससे चेलों को यरूशलेम के विनाश और उससे जुड़ी घटनाओं के बीच, एक ओर, और उनके आगमन के दिन के बीच, दूसरी ओर अन्तर स्पष्ट हो जाता है।
यद्यपि जैतून पर्वत के उपदेश की सबसे अच्छी व्याख्या के विषय में प्रश्न बने रह सकते हैं, एक बात निश्चित है: मन्दिर के विनाश के विषय में यीशु की भविष्यवाणी पूरी हुई, और उनकी यह चेतावनी कि हमें उनके पुन: आने के लिए तैयार रहना चाहिए, उस पर ध्यान देना चाहिए।
यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

