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5 बातें जो आपको पाप से लड़ने के विषय में जाननी चाहिए

5 Things You Should Know About Fighting Sin

1. खतरा वास्तविक है।

बाइबल स्पष्ट करती है कि हमें संसार, शरीर, और शैतान से गम्भीर प्रलोभनों का सामना करना पड़ता है। ये सब हमारे वास्तविक शत्रु हैं।

संसार हमारे पक्ष में नहीं है। संसार की व्यवस्था प्रायः हमें एक निश्चित दिशा में धकेलने का षड्यंत्र करती है। इसी कारण पौलुस सभी मसीहियों को चेतावनी देता है, “इस संसार के अनुरूप न बनो” (रोमियों. 12:2)। संसार के अनुरूप होना इस सम्बम्ध में कि संसार किसे महत्व देता है, किसे सहन करता है, और सफलता को कैसे परिभाषित करता है, यह संस्कृति के अनुसार बदल सकता है; परन्तु प्रत्येक स्थिति में इसे पवित्रशास्त्र की कसौटी पर परखा और आवश्यक हो तो उसका प्रतिरोध किया जाना चाहिए।

हमारा शरीर भी हमारे विरुद्ध युद्ध करता है। हम स्वभाव से पापी हैं, परमेश्वर से दूर और अपनी पापी कामुकताओं की ओर झुके हुए हैं। कभी-कभी, नए जन्म के आश्चर्यकर्म में, परमेश्वर अनुग्रह करके हमारी कुछ पापी प्रवृत्तियों को दूर कर देता है, परन्तु हमारे पापी जीवन के अवशेष बने रह जाते हैं। हम केवल अपने हृदय का अनुसरण कर यह अपेक्षा नहीं कर सकते कि वह हमें सही मार्ग पर ले जाएगा।

और फिर शैतान भी है। पवित्रशास्त्र हमें सावधान रहने की चेतावनी देते हैं, क्योंकि “तुम्हारा शत्रु शैतान गर्जने वाले सिंह की भाँति इस ताक में रहता है, कि किस को फाड़ खाए” (1 पतरस 5:8)। यदि आपको मारने के लिए किसी अभ्यस्त हत्यारे को नियुक्त किया गया हो तो आप निरन्तर सावधान रहेंगे। आप प्रत्येक द्वार पर ताला लगाएँगे और प्रत्येक कोने में उसकी उपस्थिति को देखेंगे। शैतान किसी भी मनुष्य से कहीं अधिक शक्तिशाली है। अतः हमें सदैव सचेत और संयमी रहना चाहिए।

2. प्रलोभन आपके जानने से पहले ही प्रारम्भ हो जाता है।

जब हम पाप में गिरते हैं, तो प्रायः ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हमने समय से पहले स्वयं की रक्षा नहीं की होती। हम अपनी सामान्य गतिविधियाँ में ऐसे नहीं लगे रह सकते हैं मानों हम पाप के प्रति संवेदनशील ही नहीं हैं। प्रायः,पाप से संघर्ष करने का सबसे अच्छा उपाय उन स्थानों और गतिविधियों से बचना है जो हमें प्रलोभन की ओर ले जाती हैं। कुछ लोगों के लिए, इसका अर्थ है कि उन्हें स्वयं को व्यस्त रखना चाहिए, क्योंकि अकेलापन और उबाउपन उन्हें प्रलोभन की ओर ले जाती हैं। कुछ लोगों को उन विशेष लोगों से दूर रहने की आवश्यक्ता है, जिनका प्रभाव उन्हें पाप के रास्ते पर डाल सकता है। कुछ को विशेष सुरक्षा उपायों की आवश्यकता होती है जिससे कि वे अनुचित विषयवस्तु से दूर रहें। कुछ वस्तुएँ हैं जिन्हें हम जानते हैं कि हमें कभी नहीं देखना चाहिए, कुछ स्थान हैं जहाँ हमें कभी नहीं जाना चाहिए, और कुछ ऐसे अवसर हैं जब हमें कभी अकेले नहीं होना चाहिए। यद्यपि ये लोग, स्थान और अवसर स्वयं में तात्कालिक रूप से पापमय न हों, परन्तु उनके साथ जुड़ने से हम प्रलोभन के प्रति संवेदनशील हो सकते हैं और पाप में गिरने के बड़े जोखिम में डाल सकता है। 

3. पाप के विरोध में संघर्ष को अवश्य ही हृदय को सम्बोधित करना चाहिए।

यीशु इस बात को स्पष्ट करता है कि पाप अन्दर से आता है (मत्ती. 15छ19)। हमारा हृदय ही स्रोत है, और इसलिए पाप से संघर्ष को अवश्य ही आन्तरिक मनुष्य को सम्बोधित करना चाहिए। हमें अवश्य ही सावधान रहना चाहिए कि हम अपने हृदय को परमेश्वर के वचन के अनुसार तैयार करें।

भजन 119:11 इसे संक्षेप में रखता हैः 

तेरे वचन को मैंने अपने हृदय में संचित किया है,
कि तेरे विरुद्ध पाप न करूँ।

भजनकार जानता था कि उसे पाप से बचे रहने के लिए अपने हृदय को परमेश्वर के वचन से भरा रखना होगा। यही सत्य हम सब पर भी लागू होता है।

इसीलिए प्रतिदिन बाइबल पढ़ना, बाइबल मुखाग्र करना और परमेश्वर के वचन के अनुसार प्रार्थना करना अत्यन्त आवश्यक है। हम जिसके विषय में विचार करते हैं, वह हमारे शब्दों और कर्यों में दिखेगा। इसी बात को ध्यान में रखते हुए, प्रेरित पौलुस लिखता है, “अतः हे भाइयो, जो जो बातें सत्य हैं, जो जो बातें आदरणीय हैं, और जो जो बातें न्यासंगत हैं, जो जो बातें पवित्र हैं, जो जो बातें मनोहर हैं, जो जो बातें मनभावनी हैं, अर्थात् जो जो उत्तम तथा प्रशंसनीय गुण हैं, उन्हीं का ध्यान किया करो” (फिलिप्पियों 4:8)।

4. त्रिएक परमेश्वर हमें सामर्थ देता है।

यद्यपि हम मसीही होने के कारण अनेक प्रलोभनों का सामना करते हैं, तथापि प्रभु हमारे पक्ष में है। बाइबल कहती है कि जो लोग नया जन्म लेते हैं वे, “सब खुले चेहरे से, प्रभु का तेज मानो दर्पण में देखते हिए, प्रभु अर्थात् आत्मा के द्वारा उसी तेजस्वी रूप में अश-अंश करके बदलते जाते हैं” (2 कुरिंथियों 3:18)। मसीहियों के पास यह प्रतिज्ञा है कि “जिसने तुम में भला कार्य प्रारम्भ किया है, वह मसीह यीशु के दिन तक उसे पूर्ण भी करेगा” (फिलिप्पियों 1:6)। और फिर, “क्योंकि स्वयं परमेश्वर अपनी सुइच्छा के लिए तुम्हारी इच्छा और कार्यों को प्रोत्साहित करने के लिए तुम में सक्रिय है” (फिलिप्पियों 2:13)।

इससे बढ़कर, हमें विशेष रूप से कहा गया हैः
तुम किसी ऐसी परीक्षा में नहीं पड़े जो मनुष्य के सहने से बाहर है। परमेश्वर तो सच्चा है जो तुम्हें सामर्थ्य से बाहर परीक्षा में नहीं पड़ने देगा, परन्तु परीक्षा के साथ साथ बचने का उपाय भी करेगा कि तुम उसे सह भी सको। (1 कुरिन्थियों 10:13)

जबकि हमारे शत्रु जिनका हम सामना करते हैं सामर्थी हैं, परन्तु परमेश्वर उनसे कहीं अधिक सामर्थी है। उसका पवित्र आत्मा—जिसने यीशु को मृतकों में से जीवित किया—आज हमारे शरीरों में कार्य कर रहा है। बाइबल मसीहियों को स्मरण दिलाती है कि “जो तुम में है, उस से जो संसार में है, कहीं बढ़कर है” (1 यूहन्ना 4:4)।

5. यह संघर्ष तब तक समाप्त नहीं होता जब तक हम महिमा में प्रवेश न करें।

जब तक हम अपने उद्धारकर्ता की उपस्थिति में नहीं पहुँच जाते, तब तक पाप के विरुद्ध यह संघर्ष चलता रहेगा। बाइबल यह स्पष्ट करती है कि “यदि हम कहें कि हम में कोई पाप नहीं, तो अपने आप को धोखा देते हैं, और हम में सत्य नहीं है” (1 यूहन्ना 1:8)।

पाप के विरुद्ध संघर्ष का अर्थ यह है कि पृथ्वी पर हमारा जीवन आत्मिक युद्ध का समय है। जब तक हम स्वर्ग अनन्त विश्राम में प्रवेश न करें, तब तक पूर्ण विश्राम की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए।

परन्तु एक दिन, हम बदल जाएँगे। जब यीशु हमें हमारे अनन्तकाल के घर में स्वागत करेगा, तब हम उसके सदृश होंगे। तब युद्ध समाप्त होगा और विजय पूर्ण होगी।

 यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

जोनाथन एल. मास्टर
जोनाथन एल. मास्टर
डॉ. जोनाथन एल. मास्टर ग्रीनविल, एस.सी. में ग्रीनविल प्रेस्बिटेरियन थियोलॉजिकल सेमिनरी के प्रेसिडेंट हैं, और अमेरिका में प्रेस्बिटेरियन चर्च में टीचिंग एल्डर हैं। वह कई किताबों के लेखक हैं, जिनमें ग्रोइंग इन ग्रेस और रिफॉर्म्ड थियोलॉजी शामिल हैं।