
भय एवं अनिश्चितता
4 दिसम्बर 2025
तीर्थयात्री प्रजा
11 दिसम्बर 2025जीवन के लिये सच्चा पश्चात्ताप
पश्चात्ताप की धारणा पवित्रशास्त्र में व्यापक रूप से विद्यमान है, फिर भी उसे परिभाषित करना कठिन हो सकता है। एक ओर तो पश्चात्ताप वह सर्वथा स्वाभाविक कार्य है जिसे पापी कर सकते हैं; दूसरी ओर, पश्चात्ताप अत्यन्त आत्मिक कार्य भी है। एक ओर पश्चात्ताप क्षणिक क्रिया है; दूसरी ओर—जैसा कि मार्टिन लूथर ने अपनी पंचानबे शोध के प्रथम बिन्दु में लिखा—यह एक आजीवन की जाने वाली क्रिया है। एक ओर पश्चात्ताप स्वयं में कोई सराहनीय कार्य नहीं है; दूसरी ओर, यही वह अद्वितीय द्वार है जिसके द्वारा परमेश्वर का राज्य और उसके लाभ हमारे लिए उद्घाटित होते हैं, और इस कारण “उसके बिना कोई क्षमा की आशा न रखे” (वेस्टमिन्स्टर विश्वास अंगीकार (Westminster Confession of Faith) 15.3)। एक ओर यह एक सरल आमन्त्रण है; दूसरी ओर यह समस्त व्यक्तित्व—बुद्धि, हृदय, इच्छा, प्राण तथा शरीर—को समाहित कर लेता है।
ये जटिलताएँ इस तथ्य को उजागर करते हैं कि बाइबल की शिक्षा की समृद्धि को समझने के लिए विधिवत परिभाषाएँ कितनी सहायक होती हैं। वेस्टमिन्स्टर लघु प्रश्नोत्तरी (Westminster Shorter Catechism) प्रशंसनीय रीति से पश्चात्ताप को उन दो अविच्छिन्न अनुग्रहों में से एक के रूप में परिभाषित करता है जो सच्चे हृदय-परिवर्तन को निर्मित करते हैं:
“जीवन के लिये पश्चात्ताप उद्धारकारी अनुग्रह है, जिसके द्वारा पापी अपने पाप के सत्य बोध और ख्रीष्ट में परमेश्वर की दया के अभिज्ञान के कारण, अपने पाप के प्रति शोक और घृणा सहित, उससे फिरकर परमेश्वर की ओर मुड़ता है, और नये आज्ञापालन के पूर्ण अभिप्राय एवं उसके लिये परिश्रम सहित चलता है।” (प्रश्न–उत्तर 87)
हम प्रश्नोत्तरी से कुछ बातें ध्यान में रख सकते हैं कि सच्चा पश्चात्ताप क्या नहीं है और सच्चा पश्चात्ताप क्या है।
जीवन के लिये पश्चात्ताप क्या नहीं है
वेस्टमिन्स्टर मानकों के लेखक पश्चात्ताप को “जीवन के लिये पश्चात्ताप” कहकर वर्णित करते हैं। यह भाषा पवित्रशास्त्र से ग्रहण की गई है। उदाहरणतः प्रेरितों के कार्य 11:18 में हम पढ़ते हैं कि “परमेश्वर ने ग़ैरयहूदियों को भी जीवन के लिए मन-फिराव का वरदान दिया है।” इससे यह मान लिया जाता है कि एक ऐसा पश्चात्ताप भी है जो जीवन की ओर नहीं ले जाता—जिसका उल्लेख पौलुस तब करता है जब वह कहता है: “क्योंकि परमेश्वर के इच्छानुसार जो दुख होता है वह ऐसा पश्चात्ताप उत्पन्न करता है जिसका परिणाम उद्धार है, और जिस से पछताना नहीं पड़ता, परन्तु सांसारिक शोक तो मृत्यु उत्पन्न करता है” (2 कुरिन्थियों 7:10)। कैन (उत्पत्ति 4:12), एसाव (इब्रानियों 12:17) और यहूदा (मत्ती 27:3) इस प्रकार के सांसारिक शोक के उदाहरण हैं; उनकी दुःखद कथाएँ प्रकट करती हैं कि सच्चा पश्चात्ताप केवल खेद मात्र से बढ़कर होता है। यह मात्र अपराधबोध की तीव्र भावना नहीं है—जैसा कि धर्मनिष्ठ पुनःप्रवर्तनवाद (Pietistic Revivalism) में पाया जाता है। हम बिना पाप के कारण शोकित हुए और उससे फिरकर परमेश्वर की ओर मुड़े भी पाप के परिणामों के कारण दुःखी हो सकते हैं।
इसके अतिरिक्त, सच्चा पश्चात्ताप कायाक्लेश (Penance) नहीं है—जहाँ हमारे खेद की तीव्रता तथा उसके पश्चात् किए गए कार्यों के अनुसार हमें अवमोचन प्राप्त होता है। यह न सोचें कि कायाक्लेश केवल रोमन कैथोलिक परम्परा की विशेषता है; सुसमाचारवादी भी इस प्रलोभन से अछूते नहीं हैं कि वे अपने शोक की तीव्रता अथवा अपनी आत्मिक कमियों की पूर्ति करने के संकल्प पर विश्वास करने लगें। पश्चात्ताप केवल बौद्धिक प्रतिक्रिया भी नहीं है, जहाँ मन अपनी अपूर्णता को तो स्वीकार करता है, परन्तु नए आज्ञापालन का प्रयत्न नहीं करता। इसके विपरीत छोर पर हम एक सिद्धतावादी (perfectionist) की भाँति भी तर्क कर सकते हैं, यह सोचते हुए कि सच्चे पश्चात्ताप का अर्थ यह है कि हम फिर कभी पाप नहीं करेंगे, कम-से-कम उसी प्रकार से तो नहीं। परन्तु हठीले पाप को मारना (mortification) एक दीर्घ प्रक्रिया हो सकती है।
जीवन के लिये पश्चात्ताप क्या है
प्रश्नोत्तरी जीवन के लिये पश्चात्ताप को एक उद्धारकारी अनुग्रह कहता है। यह उद्धारकारी है क्योंकि यह उद्धार (नया जीवन) के परिणाम की ओर ले जाता है। यह अनुग्रह है क्योंकि यह केवल परमेश्वर ही देता है (देखें 2 तीमुथियुस 2:25)। पुनरुज्जीवन (Regeneration) में परमेश्वर नए मनुष्य को विश्वास और पश्चात्ताप प्रदान करता है। यह पश्चात्ताप सरल शब्दों में पाप से फिरना और विश्वास सहित परमेश्वर की ओर मुड़ना है। यह विश्वास उस अनुग्रह का अभिज्ञान है जो सुसमाचार में प्रदान किया जाता है, और इसके साथ वह पश्चात्ताप जुड़ा होता है जिसमें उस पाप के प्रति घृणा सम्मिलित है जिससे हम फिर रहे हैं। वह विश्वास उद्धार करता है जो पश्चात्तापी विश्वास है, और वह पश्चात्ताप जीवन की ओर ले जाता है जो विश्वासपूर्ण पश्चात्ताप है। ये दोनों अविच्छिन्न हैं, यद्यपि तर्कानुसार विश्वास पश्चात्ताप से पूर्व आता है। हर्मन बाविंक (Herman Bavinck) कहते हैं:
“हम परमेश्वर की ओर फिरने का साहस भी न करते यदि पवित्र आत्मा के द्वारा हमें अपने हृदय में यह विश्वास न होता कि वह पिता के समान हमारे पाप-अंगीकार को ग्रहण करेगा और हमें क्षमा करेगा। सच्चा पश्चात्ताप का सत्य उद्धारकारी विश्वास से अविच्छिन्न सम्बन्ध है।‘”
हम पाप से फिरकर उसी परमेश्वर की ओर तभी मुड़ते हैं जिसको हमने ठेस पहुँचाई है क्योंकि हमें यह निश्चय है कि वह हमें क्षमा करेगा। यद्यपि परमेश्वर पुनरुज्जीवित प्राण में विश्वास और पश्चात्ताप दोनों को एक साथ प्रदान करता है, फिर भी, जैसा कि गीर्हार्डस वॉस (Geerhardus Vos) लिखते हैं, “पश्चात्ताप में विश्वास पहले ही से विद्यमान रहता है और कार्यरत रहता है।”
अतः सच्चा पश्चात्ताप हृदय में आरम्भ होता है, परन्तु यह कभी केवल हृदय तक सीमित नहीं रहता। उचित समय पर वह बाहरी आचरण में प्रकट होता है—उस फल के समान जो पश्चात्ताप के योग्य होता है (मत्ती 3:8)। आत्मा द्वारा प्रदत्त विश्वास और पश्चात्ताप का यह संयुक्त उपहार एक नयी प्रकृति का अपरिहार्य प्रकटीकरण है, जिसके द्वारा पुनरुज्जीवित व्यक्ति पाप को मारने (Mortification) और धार्मिकता के जीवन्त करने (Vivification) के कार्य में सक्रिय होता है। इस प्रकार वास्तविक ख्रीष्टीय अवश्य पश्चात्ताप करेगा। पाप के प्रति हमारा सम्बन्ध परिवर्तित हो गया है। ख्रीष्टीय अपने पाप से अच्छी रीति से परिचित होता है और स्वयं को ख्रीष्ट में परमेश्वर की दया पर छोड़ देता है। ख्रीष्टीय अन्तर्निवासी पाप से लड़ते हैं, परन्तु उस पाप पर शोक भी करते हैं, और निरन्तर उससे फिरकर परमेश्वर की ओर मुड़ते रहते हैं—जैसे उड़ाउ पुत्र अपने पिता की ओर दौड़ता हुआ लौटता है। लूथर ने उचित ही कहा था कि पश्चात्ताप ख्रीष्टीय जीवन का आरम्भ है (जिसे हम हृदय-परिवर्तन के समय का पश्चात्ताप कह सकते हैं), और यह समस्त ख्रीष्टीय जीवन का लक्षण भी है (जिसे हम पवित्रीकरण में पश्चात्ताप कह सकते हैं)।
यद्यपि पश्चात्ताप का सार सबके लिये समान है, फिर भी पश्चात्ताप का हमारा अनुभव भिन्न हो सकता है। अतः प्रश्न उठता है, मैं कैसे जानूँ कि मेरा पश्चात्ताप सच्चा है? प्रश्नोत्तरी की परिभाषा हमें आत्म-परीक्षण करने वाले प्रश्न पूछने में सहायता करती है: क्या मुझे अपने पाप का बोध है और क्या मैं अपने पाप से घृणा करता हूँ? क्या मैं ख्रीष्ट में परमेश्वर की दया की ओर हाथ बढ़ाता हूँ? और क्या मैं, यद्यपि अपूर्ण रीति से, नये आज्ञापालन में चलने का प्रयास करता हूँ? प्रिय ख्रीष्टीय, यदि ऐसा है, तो आप आनन्दित हों। क्योंकि निश्चित रूप से आपको यीशु ख्रीष्ट में विश्वास और जीवन के लिये पश्चात्ताप के उद्धारकारी अनुग्रह प्रदान किए गए हैं।
यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

