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मसीही शिष्यता क्या है?

गेब्रियल एन.ई. फ्लुहरर

हमारे नए नियम में शिष्य शब्द यूनानी भाषा के एक शब्द से आया है जिसका अर्थ है “शिक्षार्थी” या “अनुयायी।” इसलिए, जब हम पूछते हैं कि मसीही शिष्यता क्या है, तो हम यह पूछ रहे हैं कि यीशु से सीखने और उसका अनुसरण करने का क्या अर्थ है। इसलिए मैं मसीही शिष्यता की कुछ प्रमुख विशेषताओं को संक्षेप में बताना चाहता हूँ।

प्रारम्भ में ही हमें यह समझ लेना चाहिए कि सुसमाचार-प्रचार और शिष्यता के बीच जो एक दृढ़ विभाजन सामान्यतः किया जाता है, वह बाइबिल की गहराई से जाँच-पड़ताल पर खरा नहीं उतरेगा। हमारे जीवन में और बाइबल में भी, सुसमाचार-प्रचार के बाद शिष्यता का कोई सुसंगत और क्रमबद्ध घटनाक्रम सम्भवतः ही कभी मिलता है। अधिकतर इन दोनों के बीच की सीमाएँ धुँधली होती हैं।

उदाहरण के लिए, हम मत्ती 28:18-20 में यीशु के महान् आदेश को केवल सुसमाचार-प्रचार करने की आह्वान के रूप में (त्रुटिपूर्वक) पढ़ते हैं। परन्तु यीशु ने क्या कहा? “इसलिए जाओ और चेले बनाओ ।” प्रभु ने हमें केवल विश्वास के लिए बुलावा देने और फिर छोड़ देने के लिए नहीं भेजा। निश्चित रूप से हमें सुसमाचार-प्रचार करना है। परन्तु महान् आदेश हमें केवल हृदयपरिवर्तन के लिए नहीं, वरन् शिष्य बनाने के लिए कहती है।      

इस भ्रम को दूर करके हम मसीही शिष्यता को समझना शुरू कर सकते हैं। आइए इसे सरल शब्दों में परिभाषित करें: मसीही शिष्यता का अर्थ है कि यीशु के साथ मिलन में जीवन जीना, जो स्वयं जीवन है (यूहन्ना 14:6)। इस परिभाषा से तीन आवश्यक विशेषताएँ उभर कर सामने आती हैं।

  1. मसीही शिष्यता जीवन जीने का मार्ग है, न कि केवल एक बार का निर्णय या आधा-अधूरा समर्पण।

ऐसे समय में जब तथाकथित “जीवन शैली के ढँग” हमारे बाज़ारों पर प्रभावी हो रहे हैं, तो ऐसे में यीशु चाहता है कि हम मसीही शिष्यता की जीवन शैली को समझें। एक शब्द में, यह क्रूस-उठाना है। इसलिए शिष्यता सरल नहीं है। जब यीशु हमें उसका अनुसरण करने के लिए बुलाता है, तो वह हमें सोचने, जीने और विश्वास करने के अपनी पुरानी रीति को त्यागने के लिए कहता है। केवल परमेश्वर के अनुग्रह से हम अपने पिछले जीवन को क्रूस पर चढ़ाते हैं और क्रूस उठाने की ईश्वरीय बुलाहट का पालन करते हैं: “यदि कोई मेरे पीछे आना चाहता है, तो वह स्वयं अपना इनकार करे, प्रति दिन अपना क्रूस उठाए और मेरा अनुसरण करे” (लूका 9:23)।

यीशु के शब्दों में “जीवनशैली” का अर्थ स्पष्ट दिखाई देता है। अपने पुराने स्वभाव को त्यागना और यीशु का अनुसरण करके प्रतिदिन का समर्पण है – यह जीवन जीने का एक मार्ग है। मसीही शिष्यता का आरम्भ यीशु के द्वारा हमें उसका अनुसरण करने के लिए बुलाए जाने से होता है। वहाँ से, हम नए जीवन का आनन्द उठाते हैं, साथ ही पहले के स्वभाव के लिए प्रतिदिन मरते हैं।

  1. मसीही शिष्यता का अर्थ है कि विश्वास द्वारा जीना।

यीशु के साथ मिलन में जीने का यही अर्थ है कि, मृतकों में से जी उठे परमेश्वर के पुत्र में विश्वास के द्वारा जीना। यीशु के क्रूस उठाने की बुलाहट की गूँज को सुनते हुए, पौलुस ख्रीष्ट के साथ हमारे मिलन का वर्णन इस प्रकार करता है: “क्योंकि तुम तो मर चुके हो, और तुम्हारा जीवन ख्रीष्ट के साथ परमेश्वर में छिपा हुआ है” (कुलुस्सियों 3:3)।

विश्वास एक ईश्वरीय दान है (इफिसियों 2:8-10), इसलिए शिष्यता केवल विश्वास के द्वारा, परमेश्वर के अनुग्रह से ही आरम्भ होता है और निरन्तर बना रहता है। शिष्य के जीवन का आधार ही विश्वास है: “विश्वास बिना उसे प्रसन्न करना असम्भव है” (इब्रानियों 11:6)।

  1. मसीही शिष्यता का परिणाम वर्तमान और आने वाले संसार दोनों में ही अनन्त जीवन है।

यीशु के सुसमाचार निमंत्रण में हमारे लिए बहुतायत का जीवन है (यूहन्ना 10:10)। शिष्य यहाँ और अभी अनन्त जीवन का अनुभव करता है (यूहन्ना 5:24), ठीक वैसे ही जैसे वह भविष्य के लिए अनन्त जीवन की प्रतीक्षा करता है (मत्ती 19:29)। अनन्त जीवन का वर्तमान आनन्द और भविष्य की सम्भावना इसलिए सम्भव है क्योंकि हम विश्वास के द्वारा उससे जुड़े हुए हैं जो “मार्ग, सत्य और जीवन” है (यूहन्ना 14:6)।

परमेश्वर शिष्यता में हमारी सहायता कैसे करता है?

इसका उत्तर वेस्टमिंस्टर लघु प्रश्नोत्तरी, प्रश्न और उत्तर 88 से लिए गए शब्दों में निहित है, जो हमें “अनुग्रह के साधनों” के विषय में बताता है: अर्थात् परमेश्वर का वचन, कलीसियाई-विधियाँ और प्रार्थना। इन्हें अनुग्रह के साधन इसलिए कहा जाता है क्योंकि ये वे साधन हैं जिनका उपयोग परमेश्वर एक उद्देश्य के लिए करता है – कि हम यीशु का अनुसरण करते हुए उसके स्वरूप में हो जाएँ (रोमियों 8:29)।

व्यावहारिक रूप से कहें तो, मसीही शिष्यता के लिए इनमें से प्रत्येक साधन महत्वपूर्ण है। सबसे पहले, यीशु का शिष्य परमेश्वर के वचन से प्रेम करेगा। उसे इसे पढ़ना, इसका अध्ययन करना और इसका प्रचार सुनना भाएगा। बाइबल उसका सर्वोच्च अधिकार होगा और उसका पूरा जीवन इसकी शिक्षाओं के अधीन रहेगा।

दूसरा, यीशु का शिष्य बपतिस्मा और प्रभु भोज के कलीसियाई-विधियों में भाग लेगा। ख्रीष्ट ने अपनी कलीसिया को उसके आत्मिक पोषण के लिए ये कलीसियाई-विधियाँ दिए हैं। बपतिस्मा शिष्य के रूप में हमारी पहल का प्रतीक है, जबकि प्रभु भोज हमें जीवन में स्वर्गीय पोषण प्रदान करता है। शिष्य को केवल कलीसियाई-विधियों पर भरोसा नहीं होता है, परन्तु विश्वास के द्वारा, वह ख्रीष्ट में आत्मा के द्वारा परमेश्वर के अनुग्रह को प्राप्त करता है, तब वह अन्य मसीही लोगों के साथ संगति में उनका उचित उपयोग करता है।

तीसरा, यीशु का शिष्य प्रार्थना करेगा। जैसा कि नए-नए विश्वास में आए हुए पौलुस के विषय में कहा गया था, वैसे ही सभी सच्चे शिष्यों के बारे में भी कहा जाएगा कि, “देखो, वह प्रार्थना कर रहा है” (प्रेरितों के काम 9:11)। प्रार्थना में, शिष्य पवित्र आत्मा के सामर्थ्य में, पुत्र की मध्यस्थता के द्वारा अपने स्वर्गीय पिता के साथ घनिष्ठ संगति का आनन्द उठाता है।

मसीही शिष्यता परमेश्वर के अनुग्रहकारी चुनाव से आरम्भ होता है और आरम्भ से अन्त तक त्रिएक परमेश्वर के द्वारा बनाए रखा जाता है। इसलिए, एक शिष्य का जीवन आनन्द से भरा हुआ होता है। क्या यीशु से बढ़कर कोई अन्य गुरु हो सकता है? क्या अनन्त जीवन से बड़ा कोई वरदान हो सकता है? क्या परमेश्वर के द्वारा हमें दिए गए अनुग्रह के साधनों से बढ़कर हम किसी अन्य प्रावधान की कल्पना कर सकते हैं? मसीही शिष्यता वह जीवन है जिसे पाप से नाश हुए संसार में जीना आना चाहिए। इसलिए, जब हम यीशु का अनुसरण करते हैं, तो “आओ, हम अपनी आशा के अंगीकार को अचल होकर दृढ़ता से थामे रहें, क्योंकि जिसने प्रतिज्ञा की है, वह विश्वासयोग्य है” (इब्रानियों 10:23)।

यह लेख मसीही शिष्यता की मूल बात संग्रह का हिस्सा है।                   

 यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।