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धर्मी ठहराया जाना और पवित्रीकरण क्या हैं?

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विश्वास क्या है?

सेवकाई के पिछले पन्द्रह वर्षों में एक कथन जिसे मैंने स्वयं को बारम्बार दोहराते हुए पाया है वह है जे.आई. पैकर की परखी हुई टिप्पणी कि अर्ध-सत्य पूर्ण जब सत्य के रूप में प्रस्तुत किए जा रहे सम्पूर्ण झूठ हैं। पैकर का अवलोकन एक सुन्दर स्मारक है कि अर्ध-सत्य वही हैं: अर्ध सत्य। जब उन्हें इस रीति से प्रस्तुत किया जाता है कि जैसे कहने के लिए कुछ और नहीं बचा है, तो परिणाम यह होता है कि सत्य के साथ समझौता किया गया है। यह कहना कि यीशु सौ प्रतिशत मनुष्य है, सत्य है। किन्तु यह केवल आधी कहानी है। यीशु सौ प्रतिशत परमेश्वर भी है। यदि हम केवल यीशु के मनुष्यत्व पर ध्यान केन्द्रित करते हैं और कभी भी उसके परमेश्वरत्व के विषय में कुछ नहीं कहते हैं, तो हम एक अर्ध-सत्य को ऐसे प्रस्तुत करने के दोषी हैं मानो कि यह सम्पूर्ण सत्य है, तथा हम इस प्रकार एक सम्पूर्ण झूठ बोलते हैं।

मेरा डर यह है कि आज कलीसिया में हम में से अनेक लोग अपने सुसमाचार प्रचार में खतरनाक रूप से इस सिद्धान्त का उल्लंघन करने के समीप हो सकते हैं। इसमें कोई प्रश्न नहीं है कि सुसमाचार की बुलाहट यीशु ख्रीष्ट पर विश्वास करने के लिए है, जिसके कारण हमारे प्रचार को नियमित रीति से लोगों को विश्वास करने के लिए आह्वान देना चाहिए। परन्तु यदि हमारा प्रचार वही रुक जाता है, लोगों को बिना पश्चाताप की बुलाहट दिए, तो यह खतरनाक रूप से एक अर्ध-सत्य को ऐसे प्रस्तुत करने के समीप है, मानो कि वह सम्पूर्ण सत्य था। पश्चाताप और विश्वास अविभाज्य हैं। वे एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। विश्वास ख्रीष्ट की ओर फिरने का सकारात्मक पहलू है, और पश्चाताप पाप से पलटने का नकारात्मक पहलू है। ख्रीष्ट की ओर फिरना और पाप की ओर फिरना असम्भव है, जिस प्रकार एक ही समय में दो अलग-अलग दिशाओं में यात्रा करना असम्भव है। परिभाषा के अनुसार, पूर्व की ओर यात्रा करने का अर्थ है पश्चिम की ओर यात्रा न करना, और ख्रीष्ट की ओर फिरने का अर्थ है साथ में पाप की ओर न फिरना। विश्वास और पश्चाताप आवश्यक रीति से एक साथ चलते हैं।

हम विश्वास और पश्चाताप के मध्य इस अविभाज्य कड़ी को पवित्रशास्त्र के अनेक खण्डों में की देख सकते हैं। उदाहरण के लिए, प्रेरितों के काम 2:38 में, पतरस उन लोगों को प्रतिउत्तर देता है जिनके “हृदय छिद गए” और जिन्होंने पूछा, “भाइयों, हम क्या करें?” उनको यह बताते हुए कि “मन फिराओ और बपतिस्मा लो…यीशु ख्रीष्ट के नाम से कि तुम्हारे पापों की क्षमा हो।” वह उनसे नहीं कहता है कि “विश्वास करो और बपतिस्मा लो,” जैसा कि पौलुस प्रेरितों के काम 16:30-34 में फिलिप्पी के दारोगा के साथ लगभग एक ही जैसी परिस्थिति में कहता है, किन्तु “मन फिराओ और और बपतिस्मा लो।” कारण स्पष्ट प्रतीत होता है, विशेषकर जब हम पतरस और पौलुस को एक साथ लेते हैं: विश्वास और पश्चाताप अविभाज्य हैं। पश्चाताप करना परन्तु विश्वास न करना असम्भव है, और विश्वास करना किन्तु पश्चाताप करना न करना ​​असम्भव है।

हम इसको लूका 24:47 में पुनः देखते हैं, जब यीशु अपने शिष्यों से कहता है कि उनको “मन फिराव और पापों से क्षमा” का सुसमाचार का प्रचार करना है, और प्रेरितों के काम 3:19 में, जब उन शिष्यों में से एक उसके वचन को मानता है और वास्तव में सुनने वालों से कहता है कि “पश्चाताप करो… कि तुम्हारे पाप मिटाए जाएं।” दोनों घटनाओं में, हमें पुन: बताया गया है कि सुसमाचार का आह्वान केवल “विश्वास करो, और तुम क्षमा पाओगे” नहीं किन्तु “पश्चाताप करो, और तुम क्षमा पाओगे” है। इसका कारण है कि विश्वास और पश्चाताप साथ-साथ चलते हैं।

मरकुस इस सम्बन्ध को ख्रीष्ट के जीवन के विवरण में और भी स्पष्ट करता है। 1:14-15 में, मरकुस यीशु को एक ऐसे सुसमाचार की घोषणा करते हुए प्रस्तुत करता है, जो लोगों को प्रत्यक्ष रूप से “मन फिराने और विश्वास” करने के लिए बुलाता है। यीशु के लिए, विश्वास और पश्चाताप स्पष्ट रूप से एक साथ चलते हैं। सुसमाचार हमें दोनों के लिए बुलाता है।

यह विश्वास द्वारा धर्मी ठहराए जाने के सिद्धान्त को नहीं नकारता है। यीशु विश्वास के साथ कुछ भी नहीं जोड़ रहा है, बल्कि, परिभाषित कर रहा है कि विश्वास वास्तव में कैसा दिखता है। धर्मी ठहराने वाला विश्वास एक खाली या नग्न विश्वास नहीं, कहने के लिए, किन्तु एक पश्चातापी विश्वास है—अर्थात्, एक ऐसा विश्वास जिसके साथ सर्वदा पश्चाताप होता है। यह सुनिश्चित है कि, यह सम्भव है कि एक वास्तविक विश्वास कुछ समय के लिए अपश्चातापी हो जाए। बतशेबा के साथ पाप करने के बाद कुछ समय के लिए दाऊद का अपश्चात्तापी बने रहने का उदाहरण (2 शमूएल 11-12) इसी बात को दिखाता है। परन्तु एक अपश्चातापी आत्मा सदा के लिए नहीं बना रह सकता है। ख्रीष्टीय लोग हो सकता है तुरन्त पश्चाताप न करें, परन्तु वे अन्ततः पश्चातापी होंगे। परमेश्वर उसे सुनिश्चित करेगा, जैसा कि उसने दाऊद के साथ किया, क्योंकि विश्वास और पश्चाताप अनिवार्य रूप से एक साथ चलते हैं। जहाँ पर एक है, वहीं दूसरा भी होगा। 

वह सुसमाचार जो हमें विश्वास के लिए बुलाता है हमें पश्चाताप करने के लिए भी बुलाता है। यदि हम केवल विश्वास करने की बुलाहट पर ध्यान केन्द्रित करते हैं, तो हम सिक्के के केवल एक ही पहलू की ओर ध्यान दे रहे हैं और इस तथ्य को अनदेखा कर रहे हैं कि दूसरा पहलू है। यीशु की सबसे प्रसिद्ध शिक्षाओं में से एक के साथ समानान्तर का उपयोग करते हुए, बिना पश्चाताप के विश्वास की उद्घोषणा करना लोगों को  “जो कैसर का है वह कैसर को दो” सिखाने के बराबर है, बिना कभी यह कहे कि “जो परमेश्वर का है वह परमेश्वर को” दो (मत्ती 22:21)। हम खतरनाक रीति से एक अधूरे-सत्य को ऐसे प्रस्तुत करने के निकट हैं जैसे कि वह सम्पूर्ण सत्य है और ऐसा करने के द्वारा हम सम्पूर्ण झूठ बोलते हैं।

यह लेख मूलतः टेबलटॉक पत्रिका में प्रकाशित किया गया।

गाय एम. रिचर्ड

गाय एम. रिचर्ड

डॉ. गाय एम. रिचर्ड, अटलांटा में रिफॉर्म्ड थियोलॉजिकल सेमिनरी में विधिवत ईश्वरविज्ञान के कार्यकारी निदेशक और सहायक प्रोफेसर हैं। वह बपतिस्मा: ऑन्सर्स टू कॉमन क्वेस्चन्स सहित कई अन्य पुस्तकों के लेखक हैं।