The Christian Life as Pilgrimage
मसीही जीवन यात्रा के समान है
4 नवम्बर 2025
Who Were the Westminster Divines?
वेस्टमिन्स्टर ईश्वरविज्ञानी कौन थे?
11 नवम्बर 2025
The Christian Life as Pilgrimage
मसीही जीवन यात्रा के समान है
4 नवम्बर 2025
Who Were the Westminster Divines?
वेस्टमिन्स्टर ईश्वरविज्ञानी कौन थे?
11 नवम्बर 2025

उत्पत्ति 6 में “परमेश्वर के पुत्र” कौन हैं?

Who Are the “Sons of God” in Genesis 6?

बीसवीं शताब्दी में, जर्मन बाइबलीय विद्वान रूडोल्फ बुल्टमान (Rudolf Bultmann) ने पवित्रशास्त्र की एक व्यापक आलोचना प्रस्तुत की। उन्होंने यह तर्क दिया कि बाइबल मिथक संदर्भों से भरी हुई है, जिन्हें हटाए बिना इसे हमारे युग में सार्थक रूप से लागू नहीं किया जा सकता। बुल्टमान की मुख्य चिन्ता विशेषकर नए नियम के उन वर्णनों को लेकर थी, जिनमें चमत्कारों का उल्लेख मिलता है, जिन्हें वह असम्भव मानते थे। तथापि, अन्य विद्वानों ने यह भी दावा किया है कि पुराने नियम में भी कुछ मिथक तत्व पाए जाते हैं। इसके समर्थन में पहला उदाहरण सामान्यतः उस वर्णन का दिया जाता है जो, कुछ लोगों के अनुसार, प्राचीन यूनानी और रोमी मिथक कथाओं के समानांतर है, जहाँ देवता और देवियाँ कभी-कभी मनुष्यों के साथ संबंध बना कर संतान उत्पन्न करते हैं।

उत्पत्ति अध्याय 6 में हम यह विवरण पढ़ते हैं: फिर ऐसा हुआ कि जब मनुष्य पृथ्वी पर बढ़ने लगे और उनकी पुत्रियां उत्पन्न हुईं, तब परमेश्वर के पुत्रों ने मनुष्य की पुत्रियों को देखा कि वे सुन्दर हैं, और उन्होंने जिस-जिस को चाहा उस उस को अपनी पत्नी बना लिया…. उन दिनों में पृथ्वी पर नफिली रहा करते थे और बाद में उस समय भी थे जब परमेश्वर के पुत्रों ने मनुष्यों की पुत्रियों के पास जाकर उनसे सन्तान उत्पन्न की। ये प्राचीन काल के शूरवीर और सुप्रसिद्ध मनुष्य थे। (उत्पत्ति 6: 1-4)

यह विवरण मूलतः उस जलप्रलय के वर्णन की प्रस्तवाना है जिसे परमेश्वर ने पृथ्वी से सभी मनुष्यों को नष्ट करने के लिए भेजा था, केवल नूह और उसके परिवार को छोड़कर। स्वयं जलप्रलय के प्रसंग को  प्रायः मिथक कथा के रूप में माना जाता है; परन्तु यह प्रारंभिक भाग, उत्पत्ति 6, जहाँ हम “परमेश्वर के पुत्रों” और “मनुष्यों की पुत्रियों” के बीच विवाह का उल्लेख पढ़ते हैं, उसे और भी स्पष्ट रूप से एक मिथक के रूप में देखा जाता है।

इस व्याख्या का आधार यह मान्यता है कि “परमेश्वर के पुत्र” स्वर्गदूत हैं। लेकिन कुछ बाइबल व्याख्याकार ऐसा अनुमान क्यों लगाते हैं? इसका सरल उत्तर यह है कि पवित्रशास्त्र में कई स्थानों पर स्वर्गदूतों को “परमेश्वर के पुत्र” कहा गया है, और इसलिए यह मान लिया गया है कि उत्पत्ति 6 में भी यही अर्थ है। यह निश्चय ही एक संभव निष्कर्ष है जिसे निकाला जा सकता है,  परन्तु क्या यह आवश्यक निष्कर्ष है? मेरा उत्तर है — नहीं। मेरा मत है कि यह पाठ अनिवार्य रूप से स्वर्गदूतों और मनुष्यों के मध्य शारीरिक संबंधों की शिक्षा नहीं देता।

इस कठिन खण्ड को समझने के लिए हमें “परमेश्वर के पुत्रों” वाक्याँश के व्यापक अर्थ पर ध्यान देना होगा। सबसे पहले, यह वाक्याँश स्वयं यीशु ख्रीष्ट के लिए प्रयोग किया गया है — वह परमेश्वर का पुत्र है। जैसा पहले उल्लेख किया गया, कभी-कभी यह स्वर्गदूतों के लिए भी प्रयुक्त होता है (अय्यूब 1:6; 21:1; भजन संहिता 29:1)। इसके अतिरिक्त, कभी-कभी यह ख्रीष्ट के अनुयायियों के लिए भी प्रयोग होता है (मत्ती 5:9; रोमियों 8:14; गलातियों 3:26)। इसलिए, पवित्रशास्त्र में “परमेश्वर की पुत्रता” का विचार सर्वदा शारीरिक या अस्तित्वगत सम्बन्ध से नहीं जुड़ा होता है। वरन्, यह मुख्य रूप से आज्ञाकारिता के सम्बन्ध को प्रकट करने के लिए प्रयोग किया गया है। इसका अर्थ यह है कि उत्पत्ति अध्याय 6 में सम्भवतः उन लोगों के बीच विवाह का वर्णन है जो अपने जीवन में परमेश्वर की आज्ञा का पालन करते थे और उन लोगों के बीच जो अधर्मी या मूर्तिपूजक जीवनशैली का पालन करते थे। दूसरे शब्दों में कहें तो, यह खण्ड सम्भवतः विश्वासियों और अविश्वासियों के बीच हुए विवाहों का वर्णन करता है।

उत्पत्ति अध्याय 6 का तात्कालिक संदर्भ भी इस निष्कर्ष का समर्थन करता है। उत्पत्ति अध्याय 3 में पतन की कथा के पश्चात्, बाइबल दो वंश-रेखाओं पर ध्यान केंद्रित करती है — कैन और सेत के वंशजों का। कैन की वंशावली उत्पत्ति अध्याय 4 में दी गई है, और यह वंश बढ़ती हुई दुष्टता को दर्शाती है, जिसका चरम लेमेक में दिखाई देता है, जो पहला बहुपत्नीवादी था (उत्पत्ति 4:19) और जिसने हत्या और प्रतिशोध में तलवार के प्रयोग पर घमंड किया (उत्पत्ति 4:23–24)। इसके विपरीत, सेत की वंशावली जो उत्पत्ति अध्याय 5 में दी गई है, धार्मिकता को दर्शाती है। इस वंश में हनोक भी सम्मिलित है, जो “परमेश्वर के साथ-साथ चलता था; फिर वह लोप हो गया, क्योंकि परमेश्वर ने उसे उठा लिया।” (उत्पत्ति 5:24)। सेत की वंश-रेखा में ही नूह का जन्म हुआ, जो “एक धर्मी मनुष्य था, अपने समय में निर्दोष था” (उत्पत्ति 6:9; देखें उत्पत्ति 5:28)। इस प्रकार, हम दो वंशों को देखते हैं, एक जो परमेश्वर की आज्ञा का पालन करता था, और दूसरा जो जान-बूझकर उसकी अनाज्ञाकारिता करता था।


अतः, अनेक इब्रानी विद्वान यह मानते हैं कि उत्पत्ति अध्याय 6 में स्वर्गदूतों और स्त्रियों के बीच विवाह का नहीं, वरन् कैन और सेत के वंशजों के बीच विवाह का वर्णन किया गया है। ये दोनों वंश — एक धर्मी और दूसरा अधर्मी— आपस में मिल गए, और अचानक सब लोग बुराई के पीछे लग गए, यहाँ तक कि “मनुष्य के हृदय की हर कल्पना लगातार केवल बुराई ही करती रही” (उत्पत्ति 6:5)। इस अध्याय को समझाने के लिए हमें स्वर्गदूतों के पृथ्वी पर उतरने की कल्पना करने की आवश्यकता नहीं।

उत्पत्ति अध्याय 6 की व्याख्यात्मक कठिनाइयों का समाधान हमें यह स्मरण दिलाता है कि हमें पवित्रशास्त्र से ऐसे निष्कर्ष नहीं निकालने चाहिए जो उसके द्वारा स्पष्ट रूप से न सिखाए गए हों। परमेश्वर के पुत्र” और “मनुष्यों की पुत्रियाँ” जैसे वर्णनात्मक शब्द हमें यह मानने की अनुमति नहीं देते कि स्वर्गीय प्राणी और सांसारिक प्राणी आपस में सम्बन्ध रखते थे। जब हम इस प्रकार के किसी कठिन स्थल को देखते हैं, तो हमें यह अत्यन्त सावधानी से देखना चाहिए कि पवित्रशास्त्र के व्यापक सन्दर्भ में उस भाषा का प्रयोग कैसे किया गया है। यह एक अत्यन्त महत्वपूर्ण सिद्धान्त है कि पवित्रशास्त्र की व्याख्या पवित्रशास्त्र द्वारा ही की जानी चाहिए।

 यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

आर.सी. स्प्रोल
आर.सी. स्प्रोल
डॉ. आर.सी. स्प्रोल लिग्नेएर मिनिस्ट्रीज़ के संस्थापक, सैनफर्ड फ्लॉरिडा में सेंट ऐन्ड्रूज़ चैपल के पहले प्रचार और शिक्षण के सेवक, तथा रेफर्मेशन बाइबल कॉलेज के पहले कुलाधिपति थे। वह सौ से अधिक पुस्तकों के लेखक थे, जिसमें द होलीनेस ऑफ गॉड भी सम्मिलित है।