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परमेश्वर कौन है?

सम्पादक की टिप्पणी: यह टेबलटॉक पत्रिका श्रंखला का दूसरा अध्याय है: सुसमाचार का मुख्य केन्द्र

मूसा ने प्रभु से कहा, “मैं तुझ से विनती करता हूँ, मुझे अपना तेज दिखा!” (निर्गमन 33:18)। वास्तव में, उसने पूछा कि, “परमेश्वर, तू कौन है?” परमेश्वर ने इन शब्दों के साथ उत्तर दिया: “मैं स्वयं अपनी सारी भलाई तेरे समक्ष प्रकट करूँगा, और तेरे समक्ष यहोवा के नाम का प्रचार करूँगा; और जिस पर अनुग्रह करना चाहूँ उस पर अनुग्रह करूँगा, और जिस पर दया करना चाहूँ  उस पर दया करूँगा” (पद 19)। उसने स्वयं को प्रकट करने का वचन दिया।

परन्तु कोई भी मनुष्य परमेश्वर को देखकर जीवित नहीं रह सकता है। यह किसी भी मनुष्य के लिए बहुत अधिक है—विशेष रीति से पापी मनुष्य के लिए। परमेश्वर ने उससे कहा एक चट्टान पर खडे़ हो और यह कहा, “जब तक मेरा तेज तेरे सामने होकर चलता रहे, तब तक मैं तुझे चट्टान की दरार में रखूँगा और जब तक मैं तेरे सामने से होकर निकल न जाऊं तब तक अपने हाथ से तुझे ढांपे रहूँगा। फिर मैं अपना हाथ उठा लूँगा, तब तू मेरी पीठ को तो देख पाएगा, परन्तु मेरा मुख नहीं देख पाएगा” (पद 22-23)। मूसा ने परमेश्वर से यह पूछने में अच्छा किया कि वह कौन है बजाए इसके कि वह परमेश्वर को बताता कि उसे वह किस प्रकार का होते हुए देखना चाहता है। इसलिए, परमेश्वर स्वयं को मूसा पर आंशिक रूप से प्रकट करने जा रहा था। वह उसके सामने से होकर जाने वाला, अपने स्वयं के हाथों से उसकी रक्षा तथा अपने नाम की उद्घोषणा करने वाला था। इसका अर्थ मूसा के सुनने में याहवे नाम का उच्चारण करने से कहीं अधिक था—हमारे हिन्दी अनुवादों में “यहोवा”। वह अपने स्वभाव को प्रकट करने जा रहा था:

उस समय यहोवा उसके आगे आगे यह प्रचार करता हुआ चला: “यहोवा, यहोवा परमेश्वर, दयालु और अनुग्रहकारी, कोप करने में धीमा, और करुणा तथा सत्य से भरपूर; हज़ारों पर करुणा करनेवाला; अधर्म, अपराध और पाप क्षमा करनेवाला; फिर भी दोषी को वह किसी भी प्रकार दण्ड दिए बिना नहीं छोड़ेगा। वह तो पूर्वजों के अधर्म का दण्ड उनके बेटों और पोतों वरन् पर-पोतों को भी देने वाला है।” (34: 6-7)

“यहोवा, यहोवा”—यहां परमेश्वर ने स्वयं को मूसा पर अपने व्यक्तिगत नाम यहोवा से प्रकट किया है। वह महान “मैं हूँ” है। वह स्वयं अस्तित्व में है, न बदलने वाला परमेश्वर जिसके द्वारा सभी वस्तुऐं अस्तित्व में हैं, और वह दयालु, अनुग्रहकारी, सहनशील, भलाई और सच्चाई से भरा हुआ है।

क्षमा अत्यधिक महत्वपूर्ण है कि इसे तीन समान शब्दावलियों के उपयोग के द्वारा व्यक्त किया गया है: “अधर्म और अपराध तथा पाप को क्षमा किया जाना।” परमेश्वर क्षमा और दया से अत्यन्त भरपूर है। परन्तु हमारा परमेश्वर, उसके स्वयं के प्रकाशन के अनुसार न्यायी भी है। हमारे खण्ड में स्पष्ट वर्णन है कि वह दोषी को किसी भी प्रकार से दण्ड दिए बिना नहीं छोड़ेगा। पाप को सरलता से अनदेखा करना उसके स्वभाव के विपरीत है। परमेश्वर जो है उसके कारण न्याय का होना आवश्यक है। हमारा परमेश्वर को अपने अस्तित्व के प्रति सच्चा होना चाहिए। परन्तु एक ही समय में वह दयालु और न्यायी कैसे हो सकता है? वह इन दोनों विशेषताओं के अनुरूप कैसे कार्य कर सकता है? यदि वह केवल दया दिखाए तो न्याय तिरिस्कृत होगा। यदि केवल न्याय किया जाए, तो फिर कोई दया नहीं है।

इसका उत्तर देहधारण तथा क्रूस है। क्योंकि पिता दयालु और न्यायी दोनो ही है, उसने अपने पुत्र को उन सभी का प्रतिनिधित्व करने के लिए भेजा, जिन्हें पिता ने उसे प्रदान किया था (यूहन्ना 17:18-23; इफि 5:25-32)। परमेश्वरत्व को त्यागे बिना, पुत्र ने मानवीय स्वभाव को धारण कर लिया, और पवित्र आत्मा के द्वारा गर्भधारण किया और कुंवारी मरियम से जन्म लिया, उसने परमेश्वर की व्यवस्था के अधीन सिद्ध जीवन जीया, उसने व्यवस्था का पालन किया जिसको आदम ने तोड़ दिया था। वह स्वेच्छा से क्रूस पर चढ़ गया, प्रमुख प्रतिनिधि के रूप में अपने चुने हुओं को लेते हुए, ताकि हम उसके साथ एक हो सकें, अपने पाप सहित। फिर उसने पिता के प्रकोप को सह लिया, और उस ऋण को चुकाया जिसे हम नहीं चुका सकते हैं।

पौलुस 2 कुरिन्थियों 5:21 में कहता है, “जो पाप से अनजान था, उसी को उसने हमारे लिए पाप ठहराया कि हम उसमें परमेश्वर की धार्मिकता बन जाएं।” हमें यीशु के साथ एक बनाकर ही, पिता अपने क्रोध को पुत्र पर डाल सकता था। इस प्रकार न्याय किया गया, और हमारा दोष हटा दिया गया। यीशु के क्रूस पर, हम परमेश्वर की अद्भुत दया और सिद्ध न्याय दोनों ही को पूर्ण प्रदर्शित होते देखते हैं।

आइए मूसा के पास वापस चलते हैं। वह जानता था कि कोई भी मनुष्य परमेश्वर को देखने के पश्चात जीवित नहीं रह सकता है, लेकिन परमेश्वर ने कहा कि जब तक उसकी महिमा उसके सामने से होकर चली न जाए , वह मूसा को चट्टान की दरार में रखेगा और नबीको अपने हाथ से ढांपे रहेगा। दाऊद इस चित्रण को अच्छी तरह से जानता था, इसलिए उसने ऐसा कहा, “यहोवा मेरी चट्टान, मेरा गढ़ और मेरा छुड़ाने वाला है, मेरा परमेश्वर, मेरी चट्टान, जिसमें मैं शरण लेता हूँ, वह मेरी ढाल, मेरे उद्धार का सींग और मेरा दृढ़ गढ़ है” (भजन 18:2)। और पौलुस यह स्पष्ट करता है कि हमारे उद्धार की चट्टान यीशु है (1 कुरिं.10:1-4)। हमारा परमेश्वर उन लोगों के लिए जो ख्रीष्ट पर विश्वास करते हैं वह सब करता है जो उसने मूसा के लिए किया था। वह हमें चट्टान की दरार में छिपा देता है। वह हमें यीशु में छिपाता है। उसी में, हमारे पाप क्षमा किए जाते हैं। उसी में, हम परमेश्वर के प्रकोप से बचते हैं। उसी में, हम न्याय और दया दोनों को जानते हैं।

यह लेख मूलतः टेबलटॉक पत्रिका में प्रकाशित किया गया।
डेविड केन्यन
डेविड केन्यन
रेव. डेविड केन्यन, लिग्निएर,पेंसिल्वेनिया में पायनियर प्रेस्बिटेरियन चर्च के वरिष्ठ पास्टर हैं। वह भी टम्पलाइन मिनिस्ट्रीज़ में एक कर्मचारी के रूप में सेवा करते हैं।