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मनुष्य क्या है?

सम्पादक की टिप्पणी: यह टेबलटॉक पत्रिका श्रंखला का तीसरा अध्याय है: सुसमाचार का मुख्य केन्द्र

मैं प्रत्येक संध्या को कार्य के बाद, दिन भर के समाचार को जानने के लिए कुछ समय देता हूँ। यद्यपि मेरे शरीर और मस्तिष्क के लिए ये कुछ मिनट विश्रामदायक होते हैं, मुझे यह स्वीकार करना पड़ेगा कि उन क्षणों मेंं मैं अपने हृदय के लिए बहुत विश्राम नहीं पाता हूँ। ऐसा इसलिए है, क्योंकि जो कुछ मैं मुख्य समाचारों में देखता हूँ, वह मुझे एक गहरी वास्तविकता का स्मरण दिलाती है: हमारे संसार के साथ कुछ गड़बड़ है और यहां तक कि हम मनुष्यों के साथ भी। किन्तु क्या है यह?

लोगों ने उस प्रश्न के भिन्न-भिन्न उत्तर दिए हैं। कुछ कहते हैं कि यह समस्या मुख्य तौर पर आर्थिक है, अन्य कहते हैं कि वह सामाजिक है, और अभी भी अन्य लोग कहते हैं कि वह मानसिक है। निश्चित रूप से, ये उत्तर हमारे कष्टदायी परिश्रम के कुछ लक्षणों के विषय में कुछ अन्तर्दृष्टि दे सकते हैं, किन्तु बाइबल सिखाती है कि यह रोग अत्यधिक गहरा और बहुत गम्भीर है। एक शब्द में, समस्या “पाप” है—उस सृष्टिकर्ता परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह जिसने हमें रचा है।

उत्पत्ति की पुस्तक यह बताती है कि कैसे परमेश्वर ने केवल अपनी आज्ञा की सामर्थ्य के द्वारा संसार की सृष्टि की, और उत्पत्ति 1:26-28 के अनुसार, परमेश्वर का सर्वश्रेष्ठ कार्य मनुष्य की सृष्टि करना था। संसार के सभी प्राणियों में सबसे अद्भुत, मनुष्य “उसके स्वरूप में” बनाए गए हैं। परमेश्वर के स्वरूप में बनाए जाने के कई अर्थ हैं। हम मनुष्य अपनी तर्क-शक्ति में, रचनात्मकता में और यहां तक कि परमेश्वर और एक दूसरे से सम्बन्ध जोड़ने की हमारी क्षमता में परमेश्वर के चरित्र और स्वभाव को प्रदर्शित करते हैं। लेकिन परमेश्वर का स्वरूप केवल इस बात की ओर संकेत करना नहीं कि हम क्या हैं; यह इस बात की ओर भी संकेत करना है कि परमेश्वर ने हमें क्या करने के लिए बनाया है।

परमेश्वर के साथ संगति में रहने के साथ, आदम और हव्वा को परमेश्वर के उप-शासकों के रूप में उसकी सृष्टि पर प्रभुता करने और उसकी देखभाल करने का कार्य दिया गया था। तथा परमेश्वर ने उनसे कहा कि वे पृथ्वी को अपने “वश में” करें और “अधिकार रखें”—शोषण करके और क्रूरता के साथ नहीं, किन्तु “बाग़वानी और देखभाल” करने के द्वारा (उत्पत्ति 2:15)। ऐसा करने के द्वारा, वे सारी सृष्टि में सृष्टिकर्ता के प्रेम, सामर्थ्य, और भलाई को प्रदर्शित करेंगे। सम्भवतः सबसे आधारभूत रूप में, संसार में परमेश्वर के स्वरूप में होने का यही अर्थ है: जैसे प्राचीन निकट पूर्व में एक राजा अपने लोगों को यह स्मरण दिलाने के लिए कि सिंहासन पर वह विराजमान है, पहाड़ पर अपनी प्रतिमा या “स्वरूप” को स्थापित करता था, इसी प्रकार आदम, परमेश्वर के अधिकार को उस संसार में प्रतिनिधित्व करता था, जिस पर उसे प्रभुता दी गयी थी।

हालांकि, सृष्टि पर आदम का अधिकार पूर्ण अधिकार नहीं था। यह तो परमेश्वर से प्राप्त था, और उसके द्वारा ही सीमित किया गया था। लोग प्रायः सोचते हैं, परमेश्वर ने बगीचे में भले और बुरे के ज्ञान के वृक्ष को क्यों लगाया। इसका कारण यह है कि वृक्ष आदम और हव्वा को याद दिलाता था कि पृथ्वी पर उनका शासन और उसे वश में करने का अधिकार पूर्ण रीति से उनका नहीं था। इसलिए आदम और हव्वा का फल खाना बेहद दु:खद पाप था। फल खाने के द्वारा आदम और हव्वा ठीक वही करने का प्रयास कर रहे थे जो सर्प ने झूठ बोलकर उन्हें बताया था—वे “परमेश्वर के समान” होने का प्रयास कर रहे थे (उत्पत्ति 3:5)। जितना परमेश्वर ने उनको दिया था, उससे अधिक वे सामर्थ्य और अधिकार का लालच कर रहे थे, और इस प्रकार से ऊँचे सिंहासन को हड़पना चाहते थे।

आदम के पाप का परिणाम महाविनाश से कम नहीं था। परमेश्वर ने प्रतिज्ञा की थी कि यदि मनुष्य ने मना किए गए पेड़ से खाया, तो वे निश्चित रूप से मर जाएंगे। उसका अर्थ केवल शारीरिक मृत्यु नहीं था, किन्तु इसके साथ ही साथ—अत्यन्त ही भयंकर—आत्मिक मृत्यु भी थी। यह एक उचित और सही दण्ड था। न केवल पूर्ण रूप से पवित्र और धर्मी परमेश्वर इस तरह के पाप को अपनी उपस्थिति में कभी भी सहन नहीं कर सकता था, बल्कि परमेश्वर से स्वतंत्रता की घोषणा करने के द्वारा, आदम और हव्वा ने स्वयं को जीवन के स्रोत से अलग कर दिया था। परमेश्वर के विरुद्ध अपने विद्रोह के कारण वे उसके क्रोध के योग्य थे, और उनके पाप की मज़दूरी अनन्त मृत्यु, न्याय तथा नरक से कुछ भी कम नहीं थी।

इससे भी निकृष्ट बात यह है कि जब आदम ने पाप किया, तो उसने सम्पूर्ण मनुष्य जाति के प्रतिनिधि के रूप में पाप किया। इसलिए पौलुस ने रोमियों को लिखा, “एक मनुष्य के अपराध के कारण अनेक मर गए” (रोमियों 5:15)। यही कारण है कि हम में से प्रत्येक बार-बार अपने पाप के द्वारा परमेश्वर के विरुद्ध आदम के विद्रोह की अभिपुष्टि करते हैं। हम भी परमेश्वर के अधिकार और शासन से मुक्त होने की लालसा करते हैं, और इसलिए हम सृजी गई वस्तुओं में खुशी और आनन्द की खोज में स्वयं को दे देते हैं, मानो वे सर्वोत्तम लक्ष्य हैं। इस प्रक्रिया में, हम घोषणा करते हैं कि परमेश्वर हमारी आराधना के योग्य नहीं है, और इस प्रकार हम स्वयं को आत्मिक मृत्यु के श्राप के योग्य प्रमाणित करते हैं जिसकी घोषणा परमेश्वर ने आरम्भ में की थी।

यदि बाइबल की कहानी वहीं पर समाप्त हो जाती—एक ऐसी परिस्थिति में जिसमें मनुष्य परमेश्वर के क्रोध के अधीन था, जिससे बचने की सम्भावना नहीं थी—हम एक आशाहीन वास्तविकता में जीते। परन्तु परमेश्वर की स्तुति हो, कि कहानी वहीं पर समाप्त नहीं होती है। बजाय हमें हमारे पाप में मरने के लिए छोड़ने के, परमेश्वर हमें बचाने के लिए कार्य करता है। वह अपने पुत्र यीशु के देहधारण, मृत्यु और पुनरुत्थान के द्वारा, अपने लोगों को उनके पाप से बचाता है और वह एक बार में और सदा के लिए सब कुछ को ठीक करता है।

यह लेख मूलतः टेबलटॉक पत्रिका में प्रकाशित किया गया।
ग्रेग गिल्बर्ट
ग्रेग गिल्बर्ट
डॉ. ग्रेग डी गिल्बर्ट लूइविल, केन्टकी में थर्ड ऐवेन्यू बैपटिस्ट चर्च के वरिष्ठ पास्टर हैं। वह व्हाट् इज़ द् गॉस्पल? और आगामी पुस्तक हू् इज जीज़स? के लेखक हैं।