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19 अगस्त 2025मुझे कलीसिया क्यों जाना चाहिए?
–पॉल लीवाय
1. क्योंकि बाइबल इसकी आज्ञा देती है।
इस प्रश्न का सबसे सरल और मूल उत्तर यह है: क्योंकि बाइबल हमें ऐसा करने के लिए कहती है! इब्रानियों 10 में, लेखक अपने पाठकों को उस महान् सौभाग्य के विषय में बताता है जो उनके पास है। ख्रीष्ट के कार्य के कारण, उनके—और हमारे पास—पवित्र स्थान में प्रवेश करने का अद्भुत सौभाग्य है। वह पुराने नियम की बात कर रहा है, जहाँ केवल महायाजक को परमेश्वर के मन्दिर में महापवित्र स्थान में प्रवेश करने की अनुमति थी—वह भी केवल वर्ष में एक ही बार। यह अकल्पनीय सत्य है कि हम, जो ख्रीष्ट में विश्वास करते हैं, यीशु की मृत्यु के कारण पवित्र परमेश्वर के पास आ सकते हैं। वह पर्दा फाड़ दिया गया है, और हमारे महान् महायाजक ने हमारे लिए उसके पास जाने के मार्ग खोल दिया है।
इब्रानियों का लेखक इसके पश्चात् तीन लागूकरण देता है, जो सभी “आओ हम” से आरम्भ होते हैं। ध्यान दें कि ये आज्ञाएँ परमेश्वर के लोगों के लिए सामूहिक रूप से दी गईं हैं:
- “आओ हम समीप आएँ” (इब्रानियों 10:22)। आएँ और ख्रीष्ट के द्वारा शुद्ध हों और क्षमा प्राप्त करें।
- “आओ हम अपनी आशा के अंगीकार को अचल होकर दृढ़ता से थामे रहें” (इब्रानियों 10:23)। दृढ़ बने रहें, हार न मानें, इस आशा के सन्देश पर विश्वास बनाए रखें।
- “आओ हम एक-दूसरे को प्रेम और भले कार्यों के लिए उत्साहित करने पर ध्यान दें” (इब्रानियों 10:24)। आप ख्रीष्टीय जीवन न अकेले जीते हैं और न ही जी सकते हैं। जब आप कलीसिया में आते हैं, तो दूसरों के प्रति केन्द्रित रहें।
इसके पश्चात् लेखक आज्ञा देता है: “एक दूसरे के साथ इकट्ठा होना न छोड़ो, जैसा कि कितनों की रीति है, वरन् एक दूसरे को प्रोत्साहित करते रहो, और उस दिन को निकट आते देख कर और भी अधिक इन बातों को किया करो” (इब्रानियों 10:25)।
इब्रानियों का लेखक हमें कलीसिया जाने की आवश्यकता को ख्रीष्टीय जीवन के अभ्यास के रूप में प्रस्तुत करता है—ख्रीष्टीय लोग यही करते हैं। हम कलीसिया इसलिए जाते हैं क्योंकि इसमें हमारे और दूसरों के लिए भलाई है। एक साथ मिलना ही वह रीति है जिससे हम इस सरलता से निराश करने वाले संसार में ख्रीष्टीय विश्वास में स्थिर रहते हैं। इब्रानियों के समय के लोगों और हमारे लिए खतरा यह है कि हम ख्रीष्ट की देह के साथ अपनी पहचान जोड़ने और उसके साथ सहभागी होने की उपेक्षा कर सकते हैं। नए नियम में यह अकल्पनीय था कि कोई ख्रीष्टीय जन कलीसिया न जाए।
2. क्योंकि हम परमेश्वर की आराधना के लिए रचे गये हैं।
इसके साथ, कलीसिया जाने का एक और भी गहरा कारण है, केवल यह नहीं कि बाइबल हमें ऐसा करने के लिए कहती है। हम परमेश्वर के स्वभाव के कारण कलीसिया जाते हैं। वह आराधना के योग्य हैं। हमारे अस्तित्व का कारण ही यह है कि हम “उसकी महिमा करें और उसमें आनन्दित हों।” परमेश्वर हमारा सृष्टिकर्ता, पालनहार और छुड़ाने वाला है।
वेस्टमिंस्टर लघु प्रश्नोत्तरी के शब्दों में, परमेश्वर “अपने अस्तित्व, बुद्धि, सामर्थ्य, पवित्रता, न्याय, भलाई, और सत्य में असीमित, अनन्त, और अपरिवर्तनीय हैं” (प्रश्न और उत्तर 4)। जो लोग इस परमेश्वर के साथ सम्बन्ध में लाए गए हैं, वे अनिवार्य रूप से दूसरों के साथ मिलकर उसकी स्तुति करना चाहेंगे। हम उसकी आराधना करने के लिए बनाए गए हैं।
हम परमेश्वर के अस्तित्व और स्वभाव के कारण कलीसिया जाते हैं, और साथ में हमारे लिए उसके किए गए कार्यों के कारण भी। प्रेरित पतरस कहता है, “एक समय तुम तो प्रजा न थे पर अब परमेश्वर की प्रजा हो। उस समय तुम पर दया न हुई थी, पर अब दया हुई है” (1 पतरस 2:10)। प्रभु अपने लिए एक लोगों को बुला रहे हैं, “प्रत्येक जाति, समस्त कुल, लोग और भाषा में से लोगों की एक विशाल भीड़” को (प्रकाशितवाक्य 7:9)। यह परमेश्वर के लोगों की पहचान रही है कि वे उसके नाम को पुकारने और सामूहिक आराधना के लिए एकत्र होते हैं। हमें पहली बार यह बात उत्पत्ति 4 के अन्त में दिखाई देती है: “उसी समय से लोग यहोवा का नाम लेकर प्रार्थना करने लगे” (उत्पत्ति 4:26)। बाइबल के अन्त में हम देखते हैं कि परमेश्वर के लोग एकत्रित होकर उसकी आराधना कर रहे हैं। प्रकाशितवाक्य 21 हमें एक दुल्हन-समान नगर का चित्रण देता है, जिसके चारों दिशाओं में फाटक हैं। यह आश्चर्यजनक चित्रण हमें दिखाता है कि सभी स्थानों से, सभी युगों से परमेश्वर के सभी लोग उस परमेश्वर की आराधना करने के लिए एकत्रित हो रहे हैं जो अपने लोगों के मध्य निवास करता है।
जब हम प्रभु के दिन अपने भाई-बहनों के साथ मिलते हैं, तो यह उस महान् दिन का पूर्वाभास होता है। हमें इस वास्तविकता को पहचानना चाहिए कि जब हम अपनी स्थानीय कलीसिया में एकत्र होते हैं, तो हम न केवल पृथ्वी पर वरन् स्वर्ग में विजयी कलीसिया और स्वर्गदूतों के साथ भी जुड़ रहे होते हैं।
हमारे पृथ्वी पर रविवारीय मिलन का एक उद्देश्य है अनन्त विश्राम के लिए लालसा को उत्पन्न करना। पुराने नियम में सब्त का दिन विशेष रूप से विश्राम से चिह्नित था। प्रभु के दिन का यह आयाम अभी भी बना हुआ है और हमें उस अनन्त विश्राम की अपेक्षा करने के लिए कहा गया है। परन्तु नए नियम में, प्रभु के दिन में एक बड़ा परिवर्तन यह है कि यह अब अधिक से अधिक आराधना से चिह्नित है।
3. क्योंकि यह एक अनोखा सौभाग्य और आशीष है।
मैं आपको यह मनाने का प्रयास कर रहा हूँ कि कलीसिया के रूप में एकत्रित होना हमारे लिए एक सौभाग्य है। परमेश्वर के लोगों के साथ आराधना करने से अधिक किसी अन्य बात को प्राथमिकता देना पागलपन है। यदि आप प्रभु के लोगों के साथ एकत्रित नहीं होंगे, तो आप चौथी आज्ञा का पालन कैसे करेंगे? यह कलीसिया जाने की बाध्यता की बात नहीं है, वरन् अद्भुत सच्चाई यह है कि हमें कलीसिया जाने का अवसर दिया गया है।
आप अपनी सारे दोषभाव, भय, और चिन्ताओं के साथ भी कलीसिया में आ सकते हैं और एकत्रित हो सकते हैं। अपने बोझ और अपनी समस्याओं के साथ आएँ। शैतान प्रायः लोगों को कलीसिया से दूर रखने के लिए इन्हीं बातों का उपयोग करता है, परन्तु वास्तव में यह वही स्थान है जहाँ आपको होना चाहिए। यीशु अपनी कलीसिया में पापियों का स्वागत करता है, हमें विश्राम का स्थान प्रदान करता है, और हमें अपने वचन की शिक्षा और कलीसियाई विधियों के माध्यम से मन को हरा-भरा कर देता है। वह हमें बुलाता है: “हे सब थके और बोझ से दबे लोगो, मेरे पास आओ: मैं तुम्हें विश्राम दूँगा। मेरा जुआ अपने ऊपर उठा लो और मुझ से सीखो, क्योंक मैं नम्र और मन में दीन हूँ, और तुम अपने मन में विश्राम पाओगे” (मत्ती 11:28-30)।
परमेश्वर की आराधना के लिए उसकी बुलाहट को सुनें। उसकी स्तुति गाएँ। अपने पापों को अंगीकार करें और ख्रीष्ट से पापों की क्षमा का आश्वासन को सुनें। अपने भाइयों और बहनों के साथ प्रार्थना करें। सभी युगों के सन्तों के साथ अपने विश्वास का अंगीकार करें। सुसमाचार का प्रचार सुनें और बपतिस्मा और प्रभु भोज की विधियों में सुसमाचार को देखें। आप इन सब कार्यों को अकेले नहीं कर सकते। परमेश्वर के लोगों को एकत्रित होने के लिए बनाया गया है। वे सदैव ऐसा करते आए हैं और सर्वदा करते रहेंगे। जब आप कलीसिया में आते हैं, तो आप प्रभु से उन आशीषों को प्राप्त करते हैं जो कहीं और नहीं मिल सकती।
परमेश्वर ने प्रतिज्ञा की है कि जब उसकी कलीसिया एक साथ एकत्रित होती है, तो वह उन्हें एक विशेष रूप से आशीष प्रदान करता है, जो अकेले होने पर नहीं प्राप्त होती है। यीशु प्रतिज्ञा करता है कि जहाँ दो या तीन लोग उनके नाम में एकत्रित होते हैं, वहाँ वह उनके बीच में है (मत्ती 18:19–20)। प्रेरित पौलुस, बाहरी व्यक्ति के आराधना में आने की बात करते हुए कहता है कि हमारी प्रार्थना होनी चाहिए कि वह इस सच्चाई को पहचाने: “सचमुच परमेश्वर तुम्हारे मध्य है” (1 कुरिन्थियों 14:25)। प्रकाशितवाक्य की पुस्तक में, यीशु हमें बताता है कि वह दीपदानों के मध्य चलता-फिरता है, जो कि उसकी कलीसियाएँ हैं (प्रकाशितवाक्य 2:1)। वह आज भी प्रत्येक रविवार को ऐसा ही करता है जब उसकी कलीसिया एकत्रित होती है।
ख्रीष्ट की कलीसिया का भाग बनने से अधिक अद्भुत इस संसार में कुछ भी नहीं है।
यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

