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इतिहास के कुछ विशेष काल मुझे समस्त मानव-इतिहास की दिशा को समझने के लिए विशेष रूप से शिक्षाप्रद प्रतीत होते हैं। अर्थात् कभी-कभी हम अतीत के किसी एक विशिष्ट अवधि पर ध्यान केन्द्रित कर सकते हैं, देख सकते हैं कि कैसे सम्पूर्ण मानव-इतिहास उस काल की पुनरावृत्त करता है, और फिर उसी काल से सीख सकते हैं कि हमे आज क्या करना चाहिए। ऐसे ही शिक्षाप्रद कालों में से एक है इस्राएल के न्यायियों का युग। यह काल, जो लगभग 350 वर्षों का है और जिसका वर्णन हमें न्यायियों, रूत, और पहला शमूएल की प्रारम्भिक अध्यायों में मिलता है। यदि आप यह समझना चाहते हैं कि यह समय का यह विस्तार कितना लम्बा है, तो भारत के उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य काल की ओर दृष्टि कीजिए। सोचिए कि प्रथम स्वतन्त्रा संग्राम से लगभग 200 वर्ष पूर्व से लेकर आज तक कितनी ऐतिहासिक घटनाएँ घटी हैं। लगभग वही समय-अवधि न्यायियों के युग की भी है।
लगभग साढ़े तीन शताब्दियों तक की इस अवधि में इस्राएल में कोई राजा नहीं था, राष्ट्र का कोई एकमात्र अगुवा नहीं था। इस्राएल कनान देश में एक गोत्र-संघ के रूप में रह रहा था, और संकट के समय परमेश्वर विभिन्न व्यक्तियों को उठाकर नेतृत्व देता था तथा उन्हें विशेष कार्यों के लिए सामर्थ्य प्रदान करता था। पवित्र आत्मा के सामर्थ से शिमशोन ने पलिश्तियों के विरुद्ध असाधारण शारीरिक बल का प्रयोग किया। देबोरा और बाराक को दुष्ट राजा याबीन को पराजित करने के लिए अभिषेक मिला। और ऐसी ही अन्य घटनाएँ भी।
अब, मैं यह क्यों मानता हूँ कि न्यायियों का काल सम्पूर्ण इतिहास की धारा के लिए अत्यन्त शिक्षाप्रद है? इसका कारण वह विशिष्ट ढाँचा है जो हम इन 350 वर्षों के दौरान बार-बार देखते हैं। बार-बार न्यायियों की पुस्तक बताती है कि इस्राएली एक ऐसे चक्र में गिरते थे जिसका आरम्भ इस प्रकार होता था: “इस्राएलियों ने यहोवा की दृष्टि में बुरा किया।” जब-जब हम न्यायियों की पुस्तक में हम यह वाक्य पढ़ते हैं, हम देखते हैं कि परमेश्वर इस्राएल के शत्रुओं—मिद्यानी, पलिश्ती, मोआबी और अन्य जातियों—को अपने लोगों को ताड़ना देने के साधन के रूप में खड़ा करता था। वे अन्यजाति राष्ट्र इस्राएलियों को दबाते थे; तब इस्राएली छुटकारे के लिये पुकारते और अपने पापों से मन फिराते थे। तब परमेश्वर किसी न्यायी को उठाता, जो पवित्र आत्मा के सामर्थ से इस्राएल के शत्रुओं को पराजित करता और उन्हें उद्धार देता। एक विद्वान ने इस चक्र को “पतन, दण्ड, पश्चाताप और उद्धार” का चक्र कहा है। न्यायियों की पुस्तक में उल्लिखित प्रत्येक गम्भीर पतन के पीछे परमेश्वर का प्रतिशोधात्मक न्याय आता है, जिसके द्वारा वह अपने ही लोगों पर अपना न्याय और क्रोध उँडेलता है। उसी प्रतिशोधात्मक न्याय के भार के नीचे लोग पश्चाताप में झुकते हैं, अपनी दुर्दशा पर विलाप करते हैं और परमेश्वर से उद्धार की प्रतीक्षा करते हैं—जो अन्ततः उन्हें छुड़ाता है।
न्यायियों के काल में इस्राएल के पापों का जो उदास इतिहास सामने आता है, वह उन प्रतिज्ञाओं के विरूद्ध है जो उन लोगों ने की थी। यहोशू ने अपनी मृत्यु से ठीक पहले जब लोगों को प्रभु के साथ वाचा का नवीकरण करने के लिए एकत्र किया, तब इस्राएलियों ने दो प्रतिज्ञाएँ की थीं—एक सकारात्मक और एक नकारात्मक। सकारात्मक रूप से, उन्होंने प्रतिज्ञा की कि वे परमेश्वर की आज्ञा मानेंगे। नकारात्मक रूप से, उन्होंने यह वचन दिया कि वे मूर्तियों के लिये उसे न छोड़ेंगे।
और यह बात पूर्वजो से बार-बार की गई परमेश्वर की प्रतिज्ञा के संदर्भ में अत्यन्त महत्वपूर्ण है। जब परमेश्वर ने याकूब से वाचा बाँधा, तो उसने कहा, “मैं तुझे नहीं छोड़ूँगा” (उत्पत्ति 28:15)। परमेश्वर का यह वाचाई-वचन—कि जो उससे जुड़े हैं, उन्हें वह नहीं त्यागेगा—पवित्रशास्त्र का एक मुख्य विषय है। न्यायियों की पुस्तक में यही सत्य प्रमाणित होता है: कि यद्यपि परमेश्वर ने अपने लोगों को ताड़ना दी, पर वह अपने प्रिय संतानों को ही ताड़ना दे रहा था। और यद्यपि वे कुछ समय तक अपने को त्यागा हुआ समझते थे, फिर भी परमेश्वर ने उन्हें पूर्णतः नहीं छोड़ा।
किन्तु यह तो अभिलिखित है कि लोगों ने उसे छोड़ दिया। यही मुख्य अन्तर है इस्राएल के परमेश्वर-वाचा का परमेश्वर-और उसके लोगों के मध्य। परमेश्वर हमें नहीं छोड़ता, पर हम उसे छोड़ देने की प्रवृत्ति रखते हैं। न्यायियों के काल में परमेश्वर को त्यागने का प्रधान कारण था इस्राएलियों की यह तीव्र इच्छा कि वे अपने पड़ोसियों के समान बन जाएँ। परमेश्वर ने उन्हें भिन्नता के लिए बुलाया था। उसने उन्हें पवित्र जाति बनने के लिए बुलाया था। उसने उन्हें ईश्वरभक्ति की ओर बुलाया था और मूर्तिपूजा से भागने का आदेश दिया था। परन्तु उस समय यह सब अलोकप्रिय था। कलीसियाई इतिहास में भी यह अनेक बार अलोकप्रिय रहा है। और निस्संदेह, आज भी यह अलोकप्रिय है।
परमेश्वर के लोगों ने इस पतन-दण्ड-पश्चात्ताप-और उद्धार के चक्र को सम्पूर्ण बाइबलीय इतिहास में बार-बार दोहराया है। और यह कहने में कोई हिचक नहीं कि पिछले दो हज़ार वर्षों में कलीसिया ने भी इसी तरह का चक्र अनेक बार दोबारा जिया है। पर हममें एक प्रवृत्ति है कि हम सोचते हैं—ऐसी बातें आज कलीसिया के जीवन में नहीं हो सकतीं। हम परमेश्वर के कार्यों के इस दोहराते क्रम पर ध्यान नहीं देना चाहते; हम मान लेते हैं कि परमेश्वर उन लोगों पर विपत्ति नहीं लाएगा जो उसे त्याग देते हैं। परन्तु इस्राएल का परमेश्वर ऐसा परमेश्वर है जो आशीष भी देता है और शाप भी; समृद्धि भी और विपत्ति भी। इसलिए जब कलीसिया सांसारिक हो जाती है, जब प्रभु के प्रति अविश्वासी हो जाती है—तो उसके लिए कठिनाई आना कोई आश्चर्य की बात नहीं। निश्चित ही, कभी-कभी,, कलीसिया अपनी विश्वासयोग्यता के कारण भी कष्ट सहती है, क्योंकि अन्धकार की शक्तियाँ सुसमाचार के परिवर्तन से शत्रुता करती हैं। परन्तु अन्य समयों में कलीसिया अपने व्यापक और सतत अविश्वास के कारण भी कष्ट सहती है। यह बात न्यायियों के युग में हुई थी और आज भी हो सकती है।
फिर भी, हम न्यायियों की पुस्तक में पढ़ते हैं कि जब इस्राएली पश्चात्ताप करते थे, तो परमेश्वर उन्हें छुड़ाता था। चाहे परमेश्वर की वाचा के लोग कितनी भी बुरी तरह असफल क्यों न हों, जब कलीसिया पश्चात्ताप करती है, तो हमारा प्रभु उसे शीघ्रता से बचा लेता है। उसके लोग उसे त्याग देते हैं, पर वह अपने लोगों को कभी नहीं त्यागता।
न्याय का प्रारम्भ परमेश्वर के घर से होता है (1 पतरस 4:17), पर वह न्याय विनाशकारी नहीं, अनुशासनात्मक होता है—जिसका उद्देश्य हमें पश्चात्ताप और विश्वासयोग्यता की ओर लौटाना है। और न्यायियों का युग हमें यह दिखाता है कि जब उसकी कलीसिया पश्चात्ताप करती है और उससे पुकारती है, तो प्रभु न तो उसे बचाने में असफल होता है और न ही उसे सुरक्षित रखने में विफल होता है।
यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

