
न्यायियों से सीखना
18 दिसम्बर 2025
एक प्रभु
25 दिसम्बर 2025यीशु की प्रार्थनाओं की सान्त्वना
एक सेवक के रूप में, मुझे अनेक लोगों के साथ मिलकर पवित्रशास्त्र को खोलने और यह दिखाने का अवसर मिला है कि विभिन्न विषयों पर परमेश्वर क्या कहता है। इन वर्षों में, मुझसे सबसे अधिक पूछा जाने वाला एक प्रश्न यह रहा है कि विश्वासियों के उद्धार की सुरक्षा के लिए ख्रीष्ट के कार्य का अर्थ क्या है। नया नियम हमें कई श्रेणियाँ देता है जिनसे हम समझते हैं कि सच्चा उद्धार पाए हुए लोग अन्त तक बने रहेंगे। एक श्रेणी धर्मीकरण है, जो हमें बताती है कि केवल ख्रीष्ट पर विश्वास के द्वारा हमें उसकी धार्मिकता का आरोपण मिला है और हम परमेश्वर के साथ मेल में हैं—यह कोई अस्थायी युद्धविराम हो जो किसी भी छोटे उकसावे पर टूट जाए, वरन् यह स्थायी मेल है जहाँ प्रभु फिर कभी हमारे विरुद्ध हथियार नहीं उठाते (रोमियों 5:1)। दूसरी श्रेणी है पवित्रीकरण, जो कहती है कि परमेश्वर आरम्भ किए गए उद्धार के कार्य को सर्वदा पूरा करता है: “जिसने तुम में भला कार्य आरम्भ किया है, वह उसे ख्रीष्ट यीशु के दिन तक पूर्ण भी करेगा” (फिलिप्पियों 1:6)।
फिलिप्पियों के इस खण्ड में हम सामान्यतः यह समझते हैं कि पवित्र आत्मा के द्वारा परमेश्वर ही हमारे भीतर उद्धार का कार्य कर रहा है, और हमें ख्रीष्ट की समानता में ढाल रहा है। यह निस्सन्देह सत्य है, परन्तु हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यीशु भी कार्यरत हैं। हमारी अटलता के विषय में हमारी सबसे बड़ी सान्त्वना नए नियम में पाए जाने वाले ख्रीष्ट के वर्तमान कार्य से सम्बन्धित प्रकाशन से मिलता है। हम प्रायः “ख्रीष्ट के पूरे किए हुए कार्य” की बात करते हैं, जो यह बताने का एक संक्षिप्त वाक्यांश है कि ख्रीष्ट का प्रायश्चित का कार्य पूरा हो चुका है—उद्धार के मूल्य का अन्तिम भुगतान, और हमारे लिए परमेश्वर का श्राप अपने ऊपर लेना। परन्तु ख्रीष्ट का उद्धारकारी कार्य यहीं समाप्त नहीं हुआ। क्रूस के बाद भी उसे और कार्य करना था। वह हमारी धर्मिकरण के लिये जिलाया गया, और फिर स्वर्ग पर चढ़ा, जहाँ वह परमेश्वर के दाहिने हाथ पर विराजमान है—जहाँ वह राजाओं के राजा और प्रभुओं के प्रभु के रूप में राज्य करता है, तथा सारी सृष्टि को संचालित करता है और अपनी कलीसिया पर शासन करता है (प्रेरितों के काम 2:33; रोमियों 4:23–25; 1 कुरिन्थियों 15:25)।
परन्तु यह उसके कार्य का अन्त नहीं है। नए नियम के अनुसार, ख्रीष्ट के वर्तमान कार्य का एक प्रमुख केन्द्रबिन्दु उसकी मध्यस्थता है। ख्रीष्ट का याजकीय कार्य क्रूस पर समाप्त नहीं हुआ। प्रतिदिन, पिता परमेश्वर की उपस्थिति में, ख्रीष्ट अपने लोगों के लिए मध्यस्थता करता है। यदि, जैसा कि याकूब कहता है, धर्मी व्यक्ति की उत्साही प्रार्थना से “बहुत कुछ हो सकता है” (याकूब 5:16), तो यीशु की प्रार्थनाएँ अपने लोगों के लिए कितनी अधिक प्रभावशाली होंगी?
विश्वासी की ओर से ख्रीष्ट की मध्यस्थता के विषय में एक महत्वपूर्ण सान्त्वना का स्रोत यीशु की महायाजकीय प्रार्थना में मिलती है, जो स्वयं एक गहन मध्यस्थता की प्रार्थना है। आश्चर्य की बात यह है कि इस महान् मध्यस्थता की प्रार्थना में हमारा भी उल्लेख है। यूहन्ना 17:1–9 में हम पढ़ते हैं:
हे पिता, अब तू अपने साथ मेरी महिमा उस महिमा से कर जो जगत की उत्पत्ति से पहले, तेरे साथ मेरी थी। मैंने तेरा नाम उन मनुष्यों पर प्रकट किया है जिन्हें तू ने जगत में से मुझे दिया है। वे तेरे थे, और तू ने उन्हें मुझे दिया, और उन्होंने तेरे वचन को मान लिया है। . . . क्योंकि वे वचन जो तू ने मुझे दिए, मैंने उन तक पहुँचा दिए हैं। उन्होंने उन वचनों को ग्रहण किया और वास्तव में जान लिया है कि मैं तुझ से निकला हूँ, और उन्होंने विश्वास किया है कि तू ने ही मुझे भेजा है। मैं उनके लिए विनती करता हूँ−संसार के लिए विनती नहीं करता, परन्तु उनके लिए जिन्हें तूने मुझे दिया है, क्योंकि वे तेरे है।
पद 9 को फिर से देखिए: “मैं उनके लिये प्रार्थना करता हूँ। मैं उनके लिए विनती करता हूँ−संसार के लिए विनती नहीं करता, परन्तु उनके लिए जिन्हें तूने मुझे दिया है, क्योंकि वे तेरे है” (यूहन्ना 17:9)। यही इस बात का सार है। यीशु उन सबके लिये प्रार्थना कर रहा है जो परमेश्वर के हैं, न कि पृथ्वी पर हर एक जन के लिये। पिता ने अपने लिये एक प्रजा चुनी है—और वही लोग ख्रीष्ट के भी हैं। उनमें से कोई नष्ट नहीं होता, ‘विनाश के पुत्र’—यहूदा—को छोड़, जो विनाश का पुत्र होने के कारण आरम्भ से ही परमेश्वर का सन्तान नहीं था। यीशु उनके लिये प्रार्थना करता है जिन्हें परमेश्वर ने चुन लिया है, और उनमें से कोई खोया नहीं जाता (यूहन्ना 17:10–19)। इसमें केवल ऊपरी कक्ष में बैठे वे चेले ही सम्मिलित नहीं हैं जिन्होंने यीशु की प्रार्थना सुनी, वरन् हम भी जो आज उस पर विश्वास करते हैं। मैंने कहा कि हम यीशु की इस प्रार्थना में उल्लेखित हैं, और यही वह स्थान है: “मैं केवल इन्हीं के लिए विनती नहीं करता, परन्तु उनके लिए भी जो इनके वचन के द्वारा मुझ पर विश्वास करेंगे” (यूहन्ना 17:20)। हम प्रेरितों के वचनों के द्वारा विश्वास में आए, इसलिए यीशु हमारे लिये भी प्रार्थना करता है। यही ख्रीष्ट की प्रार्थना है। हम इसलिए अटल रहते हैं क्योंकि हम अपने महायाजक की मध्यस्थता के द्वारा सुरक्षित रखे गए हैं।
यदि हम किसी मित्र या किसी पास्टर की मध्यस्थतापूर्ण प्रार्थना में अत्यन्त सान्त्वना पाते हैं, तो इस पूर्ण आश्वासन से हमें कितनी अधिक सान्त्वना मिलनी चाहिए कि स्वयं यीशु हमारे लिये प्रार्थना कर रहा है? हम जानते हैं कि यीशु की प्रार्थनाएँ कभी असफल नहीं होतीं। वह परमेश्वर के मन को पूर्ण रीति से जानता है। वह यह भी जानता है कि हमें अन्त तक अटल रहने के लिये क्या उसे माँगना चाहिए। इसके अतिरिक्त, यीशु कहता है कि पिता हमें वह सब देगा जो हम उसके नाम में माँगेंगे (यूहन्ना 16:23)। यदि यह सत्य है, तो निश्चित ही पिता अपने प्रिय पुत्र को वह देने में कभी असफल नहीं होगा जो वह माँगता है—और वह हमारी अटलता के लिये प्रार्थना करता है।
यीशु की प्रार्थना के प्रभाव का सबसे बड़ा उदाहरण पतरस है। यहूदा के जैसे पतरस भी बुरी रीति से गिरा। परन्तु यहूदा के विपरीत, पतरस पुनःस्थापित किया गया और विश्वास में बना रहा। दोनों ने यीशु का इनकार किया, परन्तु केवल पतरस ने पश्चाताप किया। क्यों? इस प्रश्न का उत्तर लूका 22:31–32 देता है। शैतान ने पतरस को स्थायी रूप से फँसाने की माँग की थी, परन्तु यीशु ने पतरस के लिये प्रार्थना की, और उसी ने यह सुनिश्चित किया कि पतरस पश्चाताप तक पहुँचे। यीशु ने यहूदा के लिये प्रार्थना नहीं की, परन्तु उसने पतरस के लिये प्रार्थना की—इसलिये पतरस विश्वास और पश्चाताप में बना रहा। यह हम सभी के लिये बड़ा आश्वासन है। जिन लोगों के लिये यीशु प्रार्थना करता है, वे लम्बे समय तक विश्वास में बने रहते हैं। यदि हम ख्रीष्ट पर विश्वास करते हैं, तो वह प्रतिदिन हमारे लिये प्रार्थना कर रहा है।
यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

