सोली डियो ग्लोरिया : केवल परमेश्वर की महिमा हो- लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़
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सोली डियो ग्लोरिया : केवल परमेश्वर की महिमा हो

सोली डियो ग्लोरिया  वह नारा है जो प्रोटेस्टेन्ट धर्म सुधार से आया और योहान सेबैस्टियन बाख द्वारा प्रत्येक गीत रचना में उपयोग किया गया। उसने प्रत्येक हस्तलेख के निचले भाग में प्रथमाक्षर एस.डी.जी. को लिखा इस विचार का संचार करने के लिए कि परमेश्वर और केवल परमेश्वर ही को महिमा मिलनी चाहिए उसके द्वारा किए गए अद्भुत सृष्टि और छुटकारे के कार्यों के लिए। सोलहवीं शताब्दी के उद्धार के विषय में विवाद के केन्द्र में अनुग्रह का विषय था।

प्रश्न मनुष्य का अनुग्रह की आवश्यकता के विषय में नहीं था। प्रश्न उस आवश्यकता की सीमा के विषय में था। कलीसिया ने पहले ही पेलेजियस को दोषी ठहरा दिया था, जिसने सिखाया था कि अनुग्रह उद्धार को आगे बढ़ाता है पर यह अनिवार्य रीति से उसके लिए आवश्यक नहीं है। अर्ध-पेलेजियसवाद ने उस समय के बाद से सदैव यही शिक्षा दी कि बिना अनुग्रह के उद्धार नहीं है। परन्तु उद्धार के सभी अर्ध-पेलेजियसवाद और अर्मिनियसवाद सिद्धान्त में जो अनुग्रह माना जाता है, वह प्रभावशाली अनुग्रह नहीं है। यह ऐसा अनुग्रह है जो उद्धार को सम्भव करता है, परन्तु ऐसा अनुग्रह नहीं जो उद्धार को निश्चित करता है।

बीज बोने वाले के दृष्टान्त में हम देखते हैं कि उद्धार के सम्बन्ध में, परमेश्वर है जो पहल करता है उद्धार को करने के लिए। वह बोने वाला है। जो बीज बोया जाता है, वह उसका बीज है, जो उसके वचन के अनुसार होता है, और परिणामस्वरूप जो फसल है वह उसकी फसल है। वह उस फसल को काटता है जिसे उसने तब काटने की योजना बनाई थी जब उसने पूरी प्रक्रिया को आरम्भ किया। परमेश्वर फसल के परिणाम को काँटों के अनिश्चितताओं और मार्ग में पत्थरों पर नहीं छोड़ता है। यह परमेश्वर और परमेश्वर ही है जो यह निश्चित करता है कि उसके वचन का एक भाग अच्छी भूमि पर गिरता है। इस दृष्टान्त की व्याख्या करने में यह सोचना एक विकट त्रुटि होगी कि अच्छी भूमि पतित पापियों का अच्छा झुकाव है, वे पापी जो सही चुनाव करते हैं, जो परमेश्वर के द्वारा पहले से दिए गए अनुग्रह के प्रति सकारात्मक प्रतिक्रिया देते हैं। अच्छी भूमि के विषय में पारम्परिक सुधारात्मक समझ है कि यदि भूमि उस बीज को अपनाता है जिसे परमेश्वर द्वारा बोया जाता है, केवल परमेश्वर ही भूमि को तैयार करता है बीज के अंकुरण के लिए ।

किसी भी अर्ध-पेलेजियसवादी या अर्मिनियसवादी के लिए व्यवहारिक स्तर पर सबसे बड़ा प्रश्न है: मैंने सुसमाचार पर विश्वास करने और अपना जीवन ख्रीष्ट के लिए क्यों चुना जबकि मेरे पड़ोसी ने जिसने उसी सुसमाचार को सुना, उसे अस्वीकार कर दिया? उस प्रश्न का उत्तर दिया गया है कई रीतियों से। हम अनुमान लगा सकते हैं कि इस कारण से एक व्यक्ति सुसमाचार और ख्रीष्ट के प्रति सकारात्मक प्रतिउत्तर देने का चुनाव करता है, जबकि दूसरा नहीं चुनता है, क्योंकि सकारात्मक प्रतिक्रिया देने वाला व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से अधिक समझदार था। यदि ऐसा होता, तो परमेश्वर फिर भी उद्धार का वास्तविक स्रोत होता, क्योंकि समझदारी उसका दान है, और इसको समझाया जा सकता है कि परमेश्वर ने उस पड़ोसी को वही समझदारी नहीं दी जिसने सुसमाचार को अस्वीकार किया। परन्तु यह स्पष्टीकरण स्पष्ट रूप से निरर्थक है।

ध्यान देने वाली दूसरी सम्भावना है: कि इस कारण से एक व्यक्ति सुसमाचार को सकारात्मक रूप से प्रतिउत्तर देता है और उसका पड़ोसी ऐसा नहीं करता है, क्योंकि प्रतिउत्तर देने वाला उत्तम व्यक्ति था। अर्थात्, सही चुनाव किया और अच्छा चुनाव करने वाले व्यक्ति ने ऐसा किया क्योंकि वह अपने पड़ोसी से अधिक धर्मी था। इस स्थिति में, शरीर न केवल कुछ प्राप्त किया, उसने सब कुछ प्राप्त किया। इसी दृष्टिकोण को अधिकतर इवैंजेलिकल ख्रीष्टीय लोग मानते हैं, अर्थात् इस कारण से वे बचाए गए हैं और अन्य लोग नहीं है क्योंकि उन्होंने परमेश्वर के अनुग्रह का सही प्रतिउत्तर किया जबकि अन्य ने गलत प्रतिउत्तर किया।

हम यहां केवल गलत प्रतिक्रिया के विपरीत सही प्रतिक्रिया के बारे में ही नहीं बात कर सकते हैं, परन्तु हम एक बुरी प्रतिक्रिया के विपरीत एक अच्छी प्रतिक्रिया के सन्दर्भ में बात कर सकते हैं। यदि मैं परमेश्वर के राज्य में हूँ क्योंकि मैंने बुरी प्रतिक्रिया के स्थान पर अच्छी प्रतिक्रिया दी है, तो मेरे पास घमण्ड करने के लिए कुछ है, अर्थात् वह अच्छाई जिसके द्वारा मैंने परमेश्वर के अनुग्रह का प्रतिउत्तर दिया। मैं कभी भी किसी ऐसे अर्मिनियसवादी से नहीं मिला, जो मेरे द्वारा पूछे गए प्रश्न का उत्तर यह कहकर देगा, “ओह, मैं इस कारण से विश्वासी हूँ क्योंकि मैं अपने पड़ोसी से अच्छा हूँ।” वे ऐसे कहने से हिचकिचाएंगे। फिर भी, यद्यपि वे इस परिणाम को अस्वीकार करते हैं, अर्ध-पेलेजियसवादी के तर्क को इस निष्कर्ष को अनिवार्य करता है। यदि वास्तव में अन्तिम विश्लेषण में इस कारण से मैं एक ख्रीष्टीय हूँ और एक अन्य व्यक्ति नहीं है क्योंकि मैंने परमेश्वर के उद्धार के प्रस्ताव को सही प्रतिक्रिया दी जबकि किसी और ने उसे अस्वीकार किया, तो अविरोधी तर्क से मैंने अच्छी प्रतिक्रिया की, और मेरे पड़ोसी ने बुरी प्रतिक्रिया की।धर्म-सुधारवादी ईश्वरविज्ञान शिक्षा देता है कि यह सच है कि विश्वासी सही प्रतिक्रिया करता है और गैर-विश्वासी गलत प्रतिक्रिया करता है। परन्तु एसइस कारण से विश्वासी अच्छी प्रतिक्रिया करता है क्योंकि परमेश्वर ने अपने सम्प्रभुता के चुनाव में चुने हुए लोगों के हृदय के झुकाव को बदलता है कि वह एक अच्छी प्रतिक्रिया दे। मैं ख्रीष्ट के लिए अपनी प्रतिक्रिया के लिए कोई भी श्रेय नहीं ले सकता हूँ। परमेश्वर ने न केवल मेरे उद्धार का आरम्भ किया, उसने न केवल बीज बोया, परन्तु उसने यह सुनिश्चित किया कि वह बीज मेरे हृदय में अंकुरित हो पवित्र आत्मा की सामर्थ्य के द्वारा मुझे पुन: जीवित करने के द्वारा। वह पुनर्जन्म एक आवश्यक मांग है उस बीज को जड़ पकड़ने और फलवन्त होने के लिए। यही कारण है कि धर्म-सुधारवादी ईश्वरविज्ञान के हृदय में यह सिद्धान्त प्रतिध्वनित होता है, अर्थात्, पुनर्जन्म विश्वास से पहले आता है। यह वह सूत्र है, यह उद्धार का क्रम है, जिसे सभी अर्ध-पेलेजियसवादी अस्वीकार करते हैं। वे इस विचार को थामे रहते हैं कि आत्मिक मृत्यु की अपनी पतित स्थिति में वे विश्वास करते हैं, और फिर पुन: जन्म लेते हैं। उनकी दृष्टि में, वे सुसमाचार के प्रति प्रतिक्रिया करते हैं इससे पहले की आत्मा ने उन्हें विश्वास में लाने के लिए उनके प्राण की स्थिति को बदला। जब ऐसा होता है, तो परमेश्वर की महिमा को बांट दिया जाता है। कोई भी अर्ध-पेलेजियसवादी कभी भी सच्चाई के साथ नहीं कह सकता: “केवल परमेश्वर की महिमा हो।” अर्ध-पेलेजियसवादी के लिए, परमेश्वर अनुग्रहमयी हो सकता है, परन्तु परमेश्वर के अनुग्रह के अतिरिक्त, मेरी प्रतिक्रिया का कार्य अनिवार्य है। यहाँ अनुग्रह प्रभावशाली नहीं है, और ऐसा अनुग्रह, अन्तिम विश्लेषण में, वास्तव में बचाने वाला अनुग्रह नहीं है। वास्तव में, उद्धार आरम्भ से अन्त तक प्रभु का है। हाँ, मुझे अवश्य विश्वास करना चाहिए। हाँ, मुझे प्रतिउत्तर देना चाहिए। हाँ, मुझे ख्रीष्ट को ग्रहण करना चाहिए। परन्तु मुझे उन बातों में से किसी के लिए “हाँ” कहने के लिए, मेरे हृदय को पहले परिवर्तित होना चाहिए परमेश्वर पवित्र आत्मा की सार्वभौमिक, प्रभावशाली सामर्थ्य के द्वारा। सोली डियो ग्लोरिया।

यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।
आर.सी. स्प्रोल
आर.सी. स्प्रोल
डॉ. आर.सी. स्प्रोल, लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ के संस्थापक थे, जो सैनफोर्ड, फ्लोरिडा में सेंट एंड्रयू चैपल के पास्टर और रिफॉर्मेशन बाइबल कॉलेज के पहले अध्यक्ष थे। वह सौ से अधिक पुस्तकों के लेखक थे, जिसमें द होलिनेस ऑफ गॉड सम्मिलित है।